नालंदा में बाल श्रम पर नहीं लग रही लगाम, आज भी दुकानों और होटलों में काम कर रहे बाल श्रमिक

प्रतीकात्मक तस्वीर
Bihar Sharif News : नालंदा जिले में वर्ष 2014-15 से अब तक 434 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया है, लेकिन 356 बच्चों को आवश्यक दस्तावेज और बैंक खाता नहीं होने के कारण मुख्यमंत्री राहत कोष की सहायता राशि नहीं मिल सकी. श्रम विभाग अब पुराने मामलों की दोबारा जांच कर रहा है.
बिहारशरीफ से कंचन कुमार की रिपोर्ट
Bihar Sharif News : नालंदा जिले में बाल श्रम उन्मूलन अभियान की जमीनी हकीकत चिंताजनक तस्वीर पेश कर रही है. जिला मुख्यालय से लेकर प्रखंडों के बाजारों तक आज भी बड़ी संख्या में बच्चे चाय-नाश्ते की दुकानों, होटलों, गैराज, वाहन मरम्मत केंद्रों और कचरा चुनने जैसे कार्यों में लगे दिखाई देते हैं. श्रम विभाग की ओर से समय-समय पर अभियान चलाकर बाल श्रमिकों को मुक्त तो कराया जा रहा है, लेकिन उनके पुनर्वास और सरकारी योजनाओं से जोड़ने की प्रक्रिया बेहद धीमी है. इसका खामियाजा बाल श्रम से मुक्त कराए गए सैकड़ों बच्चों को भुगतना पड़ रहा है.
434 में से सिर्फ 78 बच्चों को ही मिला आगे बढ़ने का मौका
श्रम विभाग के चिल्ड्रेन लेबर ट्रैकिंग सिस्टम (सीएलटीएस) पोर्टल के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2014-15 से अब तक जिले में 434 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया गया है. इनमें से 202 बच्चों को जिले के धावा दल ने विभिन्न प्रतिष्ठानों से मुक्त कराया, जबकि 232 बच्चों को राजस्थान, दिल्ली, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश सहित अन्य राज्यों में चाइल्ड लाइन एवं संबंधित एजेंसियों द्वारा रेस्क्यू किया गया. 356 बच्चों का नहीं खुल सका बैंक खाता. मुख्यमंत्री राहत राशि अटकी सबसे गंभीर तथ्य यह है कि बाल श्रम से मुक्त कराए गए 434 बच्चों में से 356 बच्चों का बैंक खाता अथवा आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें मुख्यमंत्री राहत कोष की सहायता राशि का लाभ नहीं मिल सका.
गरीब परिवारों के बच्चों को योजना से जोड़ने में प्रशासन की भूमिका पर सवाल
श्रम विभाग ने इन बच्चों को योजना के लिए अयोग्य मान लिया, जबकि अधिकांश बच्चों के परिवार अत्यंत गरीब एवं अशिक्षित हैं. ऐसे परिवारों के लिए बैंक खाता खुलवाना, आधार कार्ड, जन्म प्रमाण पत्र तथा अन्य कागजात तैयार करना आसान नहीं होता. विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी स्थिति में प्रशासनिक तंत्र की जिम्मेदारी बनती है कि वह बच्चों को योजनाओं से जोड़ने में सक्रिय भूमिका निभाए. मुक्त बालकों के लिए है आर्थिक सहायता का प्रावधान सरकार की योजना के अनुसार किसी भी नियोजक से मुक्त कराए गए बाल श्रमिक को तत्काल तीन हजार रुपये की सहायता दी जाती है, ताकि उसके लिए नए कपड़े खरीदे जा सकें और विद्यालय में नामांकन कराया जा सके.
बैंक खाता और कागजात नहीं, इसलिए 356 बच्चों को नहीं मिली सरकारी मदद
इसके बाद मुख्यमंत्री राहत कोष से 25 हजार रुपये की सहायता राशि बच्चे के बैंक खाते में जमा की जाती है. यह राशि बालक के 18 वर्ष की आयु पूरी होने पर उसे उपलब्ध कराई जाती है. लेकिन बैंक खाता और अन्य आवश्यक दस्तावेजों के अभाव में अधिकांश बच्चे इस लाभ से वंचित हैं. 417 बच्चों का सत्यापन. मात्र 61 ही पाए गए योजना के योग्य श्रम विभाग द्वारा अब तक 417 मुक्त बाल श्रमिकों का भौतिक सत्यापन किया जा चुका है. जांच के दौरान केवल 61 बच्चों को मुख्यमंत्री राहत कोष की सहायता राशि के लिए योग्य पाया गया, जबकि 356 बच्चों को विभिन्न कारणों से अयोग्य घोषित कर दिया गया. सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि दस्तावेजों के अभाव को आधार बनाकर बच्चों को योजना से बाहर करना उचित नहीं है.
बाल श्रमिकों को योजनाओं से जोड़ने के लिए बना है सीएलटीएस पोर्टल
बल्कि विभाग को स्वयं आगे बढ़कर उनकी दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी करानी चाहिए. बाल श्रम रोकने के लिए बना है सीएलटीएस पोर्टल बिहार सरकार के श्रम संसाधन विभाग द्वारा संचालित चिल्ड्रेन लेबर ट्रैकिंग सिस्टम (सीएलटीएस) पोर्टल का उद्देश्य बाल श्रमिकों की पहचान, मुक्ति, पुनर्वास तथा सरकारी योजनाओं से जोड़ना है. इस पोर्टल के माध्यम से प्रत्येक जिले में बाल श्रमिकों की निगरानी की जाती है. पंचायत प्रतिनिधियों, पुलिस, श्रम विभाग, बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) तथा जिला बाल संरक्षण इकाई (डीसीपीयू) सहित कई विभागों को इसकी लॉगिन आईडी उपलब्ध कराई गई है, ताकि बच्चों को शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा एवं अन्य सरकारी योजनाओं से जोड़ा जा सके.
बाल श्रम कराने वालों पर 50 हजार जुर्माना और 2 साल तक की सजा का प्रावधान
बाल श्रम कराना कानूनन अपराध बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम के तहत 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों से किसी भी प्रकार का रोजगार कराना पूर्णतः प्रतिबंधित है, जबकि 14 से 18 वर्ष के किशोरों से खतरनाक उद्योगों एवं व्यवसायों में काम लेना दंडनीय अपराध है. दोषी नियोजक पर 50 हजार रुपये तक का जुर्माना, दो वर्ष तक की सजा तथा 20 हजार रुपये क्षतिपूर्ति का प्रावधान है. दोबारा दोषी पाए जाने पर तीन वर्ष तक की सजा हो सकती है. वहीं माता-पिता या अभिभावक द्वारा भी बच्चों से मजदूरी कराने पर 10 हजार रुपये तक जुर्माना लगाया जा सकता है.
राहत राशि के लिए आधार, बैंक खाता और उम्र प्रमाण पत्र जरूरी, विभाग ने दी जानकारी
अधिकारी बोले. पुराने मामलों की फिर हो रही जांच श्रम अधीक्षक अश्वनी कुमार ने बताया कि पूर्व में मुक्त कराए गए बच्चों को मुख्यमंत्री राहत कोष का लाभ दिलाने के लिए दोबारा कागजी जांच प्रक्रिया शुरू की गई है. उन्होंने कहा कि सहायता राशि के लिए उम्र प्रमाण पत्र, बैंक खाता, आधार, बाल श्रम मुक्ति से संबंधित प्राथमिकी सहित अन्य दस्तावेज आवश्यक हैं.
शिक्षा, बैंक और श्रम विभाग मिलकर करेंगे बाल श्रमिकों का पुनर्वास
विभाग सीएलटीएस पोर्टल पर दर्ज पुराने मामलों में सुधार कर अधिक से अधिक बच्चों को योजना का लाभ दिलाने का प्रयास कर रहा है. बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि श्रम विभाग, शिक्षा विभाग, बैंकिंग संस्थान और बाल संरक्षण से जुड़े विभाग आपसी समन्वय के साथ कार्य करें, तो बाल श्रम से मुक्त कराए गए सभी बच्चों को शिक्षा और सरकारी सहायता से जोड़ा जा सकता है. इससे न केवल उनका भविष्य सुरक्षित होगा, बल्कि जिले को बाल श्रम मुक्त बनाने की दिशा में भी ठोस सफलता मिलेगी.
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