राजगीऱ नालंदा विश्वविद्यालय में “हिन्दी के संवर्धन और वैश्विक संवाद” विषयक दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन एक सार्थक और महत्वपूर्ण बौद्धिक उपलब्धि के रूप में हुआ है. ऐतिहासिक ज्ञान, विमर्श और संवाद की शिखर भूमि नालंदा में आयोजित यह संगोष्ठी अपने उद्देश्य, विषय-वस्तु और व्यापक सहभागिता तीनों ही दृष्टियों से अत्यंत प्रभावशाली रही है. संगोष्ठी ने हिन्दी को वैश्विक संवाद की एक सशक्त, सक्षम और समकालीन भाषा के रूप में स्थापित करने का स्पष्ट संदेश दिया है. देश-विदेश से आये नामचीन विद्वानों, शिक्षाविदों, साहित्यकारों, कुलपतियों और प्रशासनिक पदाधिकारियों की उपस्थिति ने इस आयोजन को राष्ट्रीय स्तर से आगे ले जाकर वैश्विक स्वरूप प्रदान किया है. समीक्षात्मक दृष्टि से देखा जाय तो संगोष्ठी की सबसे बड़ी विशेषता इसकी विषयवस्तु की समकालीन प्रासंगिकता रही है. वैश्वीकरण और तकनीकी युग में हिन्दी की भूमिका, चुनौतियाँ और संभावनाएँ जिस गहराई और गंभीरता से प्रस्तुत की गईं है, वह विशेष रूप से उल्लेखनीय रही है. विभिन्न सत्रों में वक्ताओं ने हिन्दी को केवल भावनात्मक या साहित्यिक भाषा के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, विज्ञान, शोध, प्रशासन और अंतरराष्ट्रीय संवाद की पूर्णतः सक्षम भाषा के रूप में स्थापित करने के ठोस तर्क प्रस्तुत किए. हिन्दी भाषा की ऐतिहासिक विरासत, औपनिवेशिक काल की चुनौतियां और स्वतंत्र भारत में इसके विकास की यात्रा पर भी सारगर्भित विमर्श हुआ है. वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि हिन्दी की शक्ति उसकी सांस्कृतिक जड़ों के साथ-साथ उसकी आधुनिक अनुकूलन क्षमता में निहित है. संयुक्त राष्ट्र सहित विभिन्न वैश्विक मंचों पर हिन्दी की बढ़ती स्वीकार्यता पर हुई चर्चाओं ने संगोष्ठी को विशेष महत्व प्रदान किया है. हिन्दी में संयुक्त राष्ट्र की कार्यवाहियों, दस्तावेजों और संवाद की संभावनाओं पर विचार करते हुए इसे वैश्विक स्तर पर और अधिक प्रभावी बनाने के उपाय सुझाए गए. संगोष्ठी का अकादमिक स्तर संतुलित, गहन और समृद्ध रहा. शोधपत्रों, पैनल चर्चाओं और व्याख्यानों में विचारों की विविधता स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई है. वरिष्ठ विद्वानों के अनुभव और युवा शोधार्थियों के नए दृष्टिकोण ने विमर्श को जीवंत और बहुआयामी बनाया है. डिजिटल माध्यम, अनुवाद कार्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सोशल मीडिया के संदर्भ में हिन्दी के विस्तार पर हुई चर्चा ने भविष्य की दिशा को स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है. वक्ताओं ने माना कि तकनीक हिन्दी के वैश्वीकरण का सबसे सशक्त माध्यम बन सकती है, बशर्ते उसका योजनाबद्ध और गुणवत्तापूर्ण उपयोग किया जाय. नालंदा विश्वविद्यालय की भूमिका इस आयोजन में केंद्रीय रही है. प्राचीन वैश्विक शिक्षा परंपरा का प्रतीक नालंदा आज भी अंतरराष्ट्रीय बौद्धिक संवाद का प्रभावी मंच बन सकता है, यह संदेश संगोष्ठी के माध्यम से स्पष्ट रूप से उभरा है. कुलपतियों एवं शिक्षाविदों ने उच्च शिक्षा, शोध, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और प्रशासन में हिन्दी के प्रभावी उपयोग पर विशेष बल दिया गया. वक्ताओं ने युवाओं से हिन्दी के प्रति गर्व की भावना विकसित करने, इसे रोजगार, नवाचार और वैश्विक अवसरों से जोड़ने का आह्वान किया गया. समग्र रूप से यह संगोष्ठी हिन्दी के वैश्विक भविष्य पर गंभीर मंथन का सशक्त मंच बनी. कहा जा सकता है कि यह आयोजन हिन्दी के संवर्धन हेतु न केवल वैचारिक प्रेरणा देता है, बल्कि ठोस दिशा भी सुझाता है. हिन्दी को वैश्विक संवाद की सशक्त भाषा बनाने की दिशा में यह संगोष्ठी एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुई है.
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