Bihar News: बिहार में कामकाजी मांओं के बच्चे अब ऑफिस में रहेंगे सुरक्षित, 33 नए पालना घर जल्द, जानें सुविधाएं

Children of working mothers will now be safe in the office
Bihar News: ऑफिस में काम और गोद में बच्चा, इस दोहरी जिम्मेदारी के बीच जूझती महिलाओं के लिए बिहार में पालना घर उम्मीद की जगह बन रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत कई सवाल भी खड़े कर रही है.
Bihar News: कामकाजी महिलाओं के छोटे बच्चों की देखभाल को लेकर बिहार सरकार की मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना एक अहम सहारा बनकर उभरी है. इस योजना के तहत राज्य में फिलहाल 155 पालना घर संचालित हो रहे हैं, जहां पांच वर्ष तक के बच्चों की देखभाल की व्यवस्था की गई है. इनमें 77 पालना घर सरकारी कार्यालयों में स्थित हैं. इसके अलावा 33 नए पालना घरों को शुरू करने की प्रक्रिया जारी है.
सरकार ने कुल 100 नए पालना घरों के निर्माण का लक्ष्य तय किया है, ताकि महिलाओं को काम और मातृत्व के बीच किसी एक को चुनने की मजबूरी न झेलनी पड़े.
सचिवालय से जेल तक, कई जगहों पर पालना घर
राज्य सचिवालय और उससे जुड़े कई अहम विभागों में पालना घर बनाए गए हैं. समाज कल्याण विभाग, पंचायती राज विभाग, श्रम एवं नियोजन विभाग, गृह विभाग और पुलिस मुख्यालय जैसे कार्यालयों में यह सुविधा उपलब्ध है.
इसके साथ ही बिहार विधानसभा और विधान परिषद परिसर में भी पालना घर संचालित हो रहे हैं. इतना ही नहीं, पटना, भागलपुर, गया, बक्सर और पूर्णिया की केंद्रीय काराओं तथा अररिया, समस्तीपुर और गोपालगंज की मंडल काराओं में भी क्रेच की व्यवस्था की गई है.
जिलों में स्थिति, ज्यादातर जगह सुविधा मौजूद
राज्य के 38 जिलों में मुंगेर को छोड़कर 37 जिला समाहरणालयों में पालना घर चल रहे हैं. इसके अलावा 24 पुलिस लाइनों में भी यह सुविधा उपलब्ध है.
मुंगेर जिला समाहरणालय और 16 पुलिस लाइनों में पालना घर निर्माण की स्वीकृति दी जा चुकी है, जिससे आने वाले समय में यह दायरा और बढ़ने की उम्मीद है.
योजना के तहत आर्थिक मदद और संचालन
पालना घर खोलने के लिए मुख्यमंत्री नारी शक्ति योजना के अंतर्गत 5.36 लाख रुपये की एकमुश्त राशि दी जाती है, जिससे आधारभूत व्यवस्था तैयार की जाती है. संचालन के लिए वर्कर और सहायिका की तैनाती संविदा पर होती है, जिनका मानदेय महिला विकास निगम द्वारा दिया जाता है. इसके लिए प्रति केंद्र 3.16 लाख रुपये का प्रावधान है.
कागजों पर तस्वीर मजबूत दिखती है, लेकिन जमीनी हालात कई जगह चिंताजनक हैं. पुलिस मुख्यालय, पटेल भवन स्थित पालना घर में सीमित जगह, गद्दों पर चादर की कमी और बच्चों के लिए असुविधाजनक माहौल सामने आया है. इससे साफ है कि संख्या बढ़ाने के साथ-साथ गुणवत्ता और मानकों की निगरानी भी उतनी ही जरूरी है.
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लेखक के बारे में
By Pratyush Prashant
महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में एम.ए. तथा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से मीडिया और जेंडर में एमफिल-पीएचडी के दौरान जेंडर संवेदनशीलता पर निरंतर लेखन. जेंडर विषयक लेखन के लिए लगातार तीन वर्षों तक लाडली मीडिया अवार्ड से सम्मानित रहे. The Credible History वेबसाइट और यूट्यूब चैनल के लिए कंटेंट राइटर और रिसर्चर के रूप में तीन वर्षों का अनुभव. वर्तमान में प्रभात खबर डिजिटल, बिहार में राजनीति और समसामयिक मुद्दों पर लेखन कर रहे हैं. किताबें पढ़ने, वायलिन बजाने और कला-साहित्य में गहरी रुचि रखते हैं तथा बिहार को सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक दृष्टि से समझने में विशेष दिलचस्पी.
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