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बिहार चुनाव 2020: 31 साल से विकास को तरस रहा एशिया का प्रसिद्ध कावर झील, न टाल बना, न पक्षी विहार और न ही चुनावी मुद्दा

Updated at : 21 Oct 2020 11:06 AM (IST)
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बिहार चुनाव 2020: 31 साल से विकास को तरस रहा एशिया का प्रसिद्ध कावर झील, न टाल बना, न पक्षी विहार और न ही चुनावी मुद्दा

बिहार चुनाव 2020: 57 हजार वर्ग हेक्टेयर में चिह्नित वेटलैंडों में प्रमुख मंझौल अनुमंडल स्थित कावर झील उद्धारक की वाट जोह रहा है.

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बेगूसराय : चेरिया बरियारपुर विधानसभा क्षेत्र की चर्चित समस्या कावर झील पक्षी विहार की दुर्दशा अभी खत्म नहीं हुई है. नेताओं के वादे की लंबी फेहरिस्त है, परंतु विकास के लिए कावर की काया लगातार तरस रही है. गंगा नदी के उत्तर मैदानी भाग के 57 हजार वर्ग हेक्टेयर में चिह्नित वेटलैंडों में प्रमुख मंझौल अनुमंडल स्थित कावर झील उद्धारक की वाट जोह रहा है.

यहां की भौगोलिक स्थिति विदेशी पक्षियों को आकर्षित करती रही है. इस वर्ष भी विदेशी मेहमान बड़ी संख्या में पहुंचे, लेकिन जंगल-झाड़ से अटा पड़ा कावर झील अब इनके मुफीद नहीं रह पाया है.

ऐसे में जिले के एक वर्ग ने कावर महोत्सव की चर्चा कर उम्मीद की किरण जगायी है, परंतु कावर टाल बनेगा या फिर पक्षी बिहार इस सोच ने इसके विकास के मार्ग पर प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है. यहां पर पर्यटन की असीम संभावनाओं को देखते हुए 20 जनवरी, 1989 को तत्कालीन डीएम रामसेवक शर्मा के प्रयास से कावर झील को पक्षी आश्रायणी घोषित किया गया था.

वेटलैंड डिवीजन ने राज्य वन विभाग को दिये थे 32 लाख : कावर के विकास के लिए वर्ष 1992 में केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय की वेटलैंड डिवीजन ने राज्य वन विभाग को 32 लाख रुपये दिये, परंतु वेटलैंड डिवीजन का गठन नहीं होने से उक्त राशि का उपयोग नहीं हो सका. राशि ज्यों-की-त्यों पड़ी रही.

दो फरवरी, 2000 को केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने 10 रामसेट साइट में कावर झील के दलदली क्षेत्र को देखते हुए शामिल कर दिया. अक्तूबर-नवंबर, 2007 में नागपुर में आयोजित इंटरनेशनल लेक काॅन्फ्रेंस में जब केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने देश में कुल 25 रामसेर साइट घोषित किया, तो उक्त सूची से कावर का नाम गायब हो गया.

वर्तमान में कावर सिर्फ देश के 94 नोटिफाइड वेटलैंड में से एक बनकर रह गया है. वर्ष 2003-04 में नाबार्ड ने दो करोड़ 82 लाख रुपये कावर चौर की जलनिकासी के लिए नहर निर्माण के लिए दिये. हालांकि इस योजना पर पुरातात्विक महत्व के दृष्टिकोण से इस काम पर सांईं सोसाइटी की पहल पर रोक लग गयी.

सरकार की अदूरदर्शिता का परिणाम

जो क्षेत्र के विकास के लिए उम्मीद लगाये हुए हैं वे सरकार की अदूरदर्शिता भरे फैसले का क्रियान्वयन होने की स्थिति में न केवल सुंदर कावर झील का अस्तित्व मिट जायेगा, बल्कि यहां पर्यटन और मत्स्य पालन समेत सभी संभावनाएं भी खत्म हो जायेंगी .

कावर झील के नहीं होने का दूरगामी परिणाम क्षेत्र की आनेवाली पीढ़ी को भुगतना पड़ेगा. इसके नहीं रहने से भू-गर्भीय जल स्तर भी गिर जायेगा. तभी तो लोगों को पक्षियों का कलरव कम देखने को मिल रहा है. लोगों को सिंचाई के लिए तो छोड़िए, पीने के पानी के लिए भी भटकना पड़ेगा.

Posted by Ashish Jha

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