बिना स्टेडियम, बिना संसाधन... फिर भी सीठी गांव की बेटियों ने खेल के दम पर बदल दी अपनी तकदीर

खेल खेलती सिठी की लड़कियां - फोटो: Prabhat Khabar
बिहार के सीठी गांव की आदिवासी बेटियों ने खेल के दम पर अपनी दुनिया बदल दी. बिना संसाधनों के, उन्होंने फुटबॉल और एथलेटिक्स में राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई है. खेल ने न सिर्फ मेडल दिलाए, बल्कि शिक्षा और सामाजिक सोच को भी बेहतर बनाया है.
Bettiah News: जिला मुख्यालय से करीब 100 किलोमीटर दूर जंगल और नदी के बीच बसा थारू आदिवासी बहुल सीठी गांव आज खेल की बदौलत नई पहचान बना चुका है. कभी संसाधनों की कमी, सामाजिक बंदिशों और जागरूकता के अभाव से जूझने वाला यह गांव अब राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों की नर्सरी बन गया है. खेल ने यहां सिर्फ मेडल नहीं दिलाए, बल्कि शिक्षा, सामाजिक सोच और पूरे गांव की तस्वीर बदल दी.
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कुछ युवाओं ने शुरू किया बदलाव का सफर
इस बदलाव की शुरुआत गांव के कुछ युवाओं ने सरकारी विद्यालय में बच्चों को फुटबॉल और एथलेटिक्स का प्रशिक्षण देकर की. शुरुआत में केवल लड़के मैदान में उतरते थे, जबकि लड़कियां दूर बैठकर अभ्यास देखती थीं.
कुछ समय बाद लड़कियों ने भी खेलने की इच्छा जताई और नियमित अभ्यास शुरू कर दिया. इसका असर स्कूलों में भी दिखने लगा. बच्चों की उपस्थिति बढ़ी और जो छात्र पहले मध्याह्न भोजन के बाद घर लौट जाते थे, वे अब अंतिम घंटी तक विद्यालय में रुकने लगे.
नदी के टापू को बना दिया खेल का मैदान
जब स्कूल का मैदान छोटा पड़ने लगा तो गांव के युवाओं और महिलाओं ने मिलकर नया रास्ता निकाला. नदी किनारे पड़े ऊबड़-खाबड़ टापू को श्रमदान से समतल किया गया. खरपतवार हटाए गए और जंगल से बांस लाकर गोलपोस्ट बनाया गया.
कुछ ही दिनों में वहां फुटबॉल का मैदान तैयार हो गया. आज यही मैदान सैकड़ों बच्चों के सपनों की उड़ान बन चुका है.
हाफ पैंट पहनने पर हुआ विरोध, फिर बदली सोच
शुरुआत में लड़कियां फ्रॉक पहनकर खेलती थीं. बाद में खेल पोशाक के रूप में हाफ पैंट मिलने पर गांव में विरोध शुरू हो गया. कई तरह की बातें होने लगीं.
लगातार बैठकों, संवाद और जागरूकता अभियानों के बाद लोगों की सोच बदली. परिवारों ने बेटियों का साथ दिया और लड़कियां पूरे आत्मविश्वास के साथ मैदान में लौट आईं.
जंगल, स्कूल और खेल... यही थी दिनचर्या
इन खिलाड़ियों का सफर आसान नहीं था. सुबह जंगल से लकड़ी लाना, बकरियां चराना, स्कूल जाना और शाम को कई घंटे अभ्यास करना उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था.
इसी मेहनत का परिणाम वर्ष 2023 में सामने आया, जब गांव के बच्चों ने प्रखंड और जिला स्तरीय विद्यालय खेल प्रतियोगिताओं में चैंपियन बनकर सबको चौंका दिया.
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अब आसपास के गांवों के बच्चे भी यहीं करते हैं अभ्यास
सीठी की सफलता के बाद बखरी, मंडीहा, पचकाहर, विजयपुर और जगन्नाथपुर सहित आसपास के गांवों के बच्चे भी इसी मैदान में अभ्यास करने आने लगे. इनमें लगभग 80 प्रतिशत खिलाड़ी लड़कियां हैं.
'सीठी एक्सप्रेस' बनी गांव की पहचान
भुवनेश्वर में आयोजित प्रथम जनजातीय खेल महोत्सव में सीठी की 28 लड़कियों और 10 लड़कों ने हिस्सा लिया.
गांव की धाविका प्रीति कुमारी, जिन्हें अब लोग "सीठी एक्सप्रेस" के नाम से जानते हैं, ने 100 मीटर दौड़ में पूरे देश में चौथा स्थान हासिल किया. पदक भले नहीं मिला, लेकिन इस प्रदर्शन ने पूरे गांव का आत्मविश्वास बढ़ा दिया.
खेल ने बदली पूरे गांव की सोच
राष्ट्रीय प्रतियोगिता से लौटने पर खिलाड़ियों का पूरे गांव ने भव्य स्वागत किया.
इसके बाद गांव के नाई ने खिलाड़ियों के बाल जीवनभर मुफ्त में काटने का संकल्प लिया, जबकि एक टेंपो चालक खिलाड़ियों के लिए निशुल्क फल लाने लगा. यह बदलाव खेल के सामाजिक प्रभाव की मिसाल बन गया.
लगातार मिल रही राष्ट्रीय स्तर पर सफलता
इसके बाद गांव की खिलाड़ियों ने कई उपलब्धियां हासिल कीं.
- रानी कुमारी का राष्ट्रीय फुटबॉल प्रतियोगिता के लिए चयन हुआ.
- अंडर-14 एथलेटिक्स टीम ओवरऑल चैंपियन बनी.
- नंगे पैर फुटबॉल खेलकर बच्चियों ने जिला चैंपियनशिप जीती.
- वर्ष 2024 में प्रीति, बिंदिया, दीपिका और रितिका का चयन राष्ट्रीय एथलेटिक्स प्रतियोगिता के लिए हुआ.
- प्रियंका, रानी, दामिनी और गीता ने बिहार फुटबॉल टीम में जगह बनाई.
- खेलो इंडिया नेशनल गेम्स में 14 वर्ष की उम्र में खिलाड़ियों ने बिहार का प्रतिनिधित्व किया.
छात्रवृत्ति से मिला नया हौसला
वर्ष 2025 में पश्चिम चंपारण जिला मशाल प्रतियोगिता में बिहार ओवरऑल चैंपियन बना.
इसके बाद प्रीति, दीपिका, बिंदिया, दामिनी, किरणदीप और सूरज का चयन प्रेरणा छात्रवृत्ति योजना के लिए हुआ. इस योजना के तहत उन्हें बिहार सरकार की ओर से प्रतिवर्ष 5 लाख रुपये की खेल छात्रवृत्ति मिलेगी.
वर्ष 2026 के खेलो इंडिया राष्ट्रीय ट्रायल में बिहार टीम के लिए एथलेटिक्स में 14 और फुटबॉल में 12 खिलाड़ियों का चयन हुआ, जिनमें आधे से अधिक खिलाड़ी इसी क्षेत्र के थे.
पढ़ाई में भी बनाया नया रिकॉर्ड
खेल का सकारात्मक असर शिक्षा पर भी दिखाई दिया. बिहार बोर्ड मैट्रिक परीक्षा में रानी, प्रियंका, प्रीति, शीतल, खुशबू, गुड़िया, अनुप्रिया और किरणदीप ने प्रथम श्रेणी में शानदार अंक हासिल किए.
इन विद्यार्थियों ने यह धारणा भी बदल दी कि खिलाड़ी पढ़ाई में कमजोर होते हैं.
आज सपनों की नई उड़ान भर रहा है सीठी
आज सीठी और आसपास के गांवों के 31 लड़कियां और 10 लड़के राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं. वहीं 200 से अधिक बच्चे रोज नदी के टापू पर बने इसी मैदान में अभ्यास कर अपने भविष्य को नई दिशा देने में जुटे हैं.
जंगल और नदी के बीच बसे इस छोटे से गांव ने साबित कर दिया है कि संसाधनों से बड़ी ताकत संकल्प, मेहनत और सामूहिक प्रयास होते हैं.
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