वीटीआर के जंगलों में पके कुसुम के रसीले फल, वन्यजीवों के पौष्टिक आहार के साथ लोक संस्कृति का प्रतीक

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वीटीआर में पक कर तैयार कुसुम का फल। | Prabhat Khabar Network

वाल्मीकिनगर टाइगर रिजर्व (वीटीआर) के जंगलों में मानसून की पहली बारिश के साथ ही कुसुम के रसीले फल पकने लगे हैं. यह खट्टा-मीठा फल बच्चों के लिए आकर्षण का केंद्र बना हुआ है और वन्यजीवों के लिए पौष्टिक आहार का स्रोत भी है.

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VTR Monsoon Nature:  मानसून की पहली बारिश के दस्तक देते ही वाल्मीकिनगर टाइगर रिजर्व (वीटीआर) के घने जंगल इन दिनों कुसुम (कोसम) के रसीले फलों की भीनी-भीनी खुशबू से महक उठे हैं. पीले और मनमोहक नारंगी रंग में पकने वाला यह अनोखा जंगली फल अपने लाजवाब खट्टे-मीठे स्वाद के कारण स्थानीय बच्चों की पहली पसंद बना हुआ है. सुबह की पहली किरण के साथ ही जंगलों के किनारे बसे गांवों के बच्चे इन पेड़ों के नीचे फल गिरने का बेसब्री से इंतजार करते दिखते हैं, जबकि कई साहसी बच्चे पेड़ों की ऊंची टहनियों पर चढ़कर भी कुसुम तोड़ते नजर आते हैं. जंगलों के पास बच्चों की यह उछल-कूद पूरे इलाके में बचपन की पुरानी यादों को जीवंत कर रही है.

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प्रकृति की अनमोल सौगात और लोक संस्कृति का हिस्सा

कुसुम का फल बाहर से देखने में काफी सख्त होता है, लेकिन इसके भीतर का हिस्सा बेहद रसीला, गूदेदार और सुगंधित होता है. स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि मानसून के मौसम में बेहद सीमित समय के लिए मिलने वाला यह स्वादिष्ट फल प्रकृति की एक अनमोल सौगात है, जिसका इंतजार हर साल ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी बेसब्री से किया जाता है. वीटीआर सहित बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और मध्य प्रदेश के वन क्षेत्रों में कुसुम के वृक्ष प्राकृतिक रूप से प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. यह वृक्ष जंगलों की समृद्ध जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

आर्थिक महत्व के साथ वन्यजीवों का पौष्टिक आहार

कुसुम का पेड़ केवल अपनी स्वाद ग्रंथि के लिए ही नहीं, बल्कि आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी आदिवासियों और ग्रामीणों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. इसके पोषक बीजों से पारंपरिक तरीके से कुसुम तेल निकाला जाता है, जिसका विभिन्न उपयोग होता है. इसके अलावा ग्रामीण इलाकों में बच्चे आज भी इन बीजों को पिरोकर सुंदर बालियां, माला और छोटे-छोटे खिलौने बनाते हैं, जिससे उनकी पारंपरिक लोक संस्कृति आज भी जीवित है. कृषि वैज्ञानिक विनय कुमार सिंह बताते हैं कि कुसुम मुख्य रूप से सोपबेरी परिवार का वृक्ष है और वीटीआर के जंगलों में इसकी काफी अच्छी संख्या मौजूद है. इसके कोमल पत्ते चीतल, हिरण और बंदर सहित कई शाकाहारी वन्यजीवों के लिए एक बेहद पौष्टिक भोजन का मुख्य स्रोत हैं. यही मुख्य कारण है कि कुसुम केवल मानवीय स्वाद का ही माध्यम नहीं है, बल्कि यह जंगल, वन्यजीवों और स्थानीय लोक संस्कृति के अनूठे संरक्षण का भी एक बड़ा और महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है.


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