बेगूसराय में विलुप्त हो रही नागपंचमी पर झाप बनाने की खानदानी कला, रोजी-रोटी के लिए पलायन कर रहा मालाकार समाज

Author Vikash Kumar|Edited by Sakshi Kumari
Updated:
विज्ञापन
बखरी में बना झाप

बखरी में बना झाप

बेगूसराय में नागपंचमी के पावन अवसर पर तैयार होने वाली पारंपरिक झाप बनाने की कला धीरे-धीरे विलुप्त हो रही है. कच्चे माल की कमी और उचित मूल्य न मिलने के कारण मालाकार समाज के लोग रोजी-रोटी की तलाश में महानगरों की ओर पलायन करने को मजबूर हैं.

विज्ञापन

Begusarai Malakar Community Jhaap : बेगूसराय में नागपंचमी के पावन अवसर पर मालाकार समाज द्वारा भगवान शिव और मनसा देवी के लिए विशेष रूप से झाप तैयार किया गया है. हालांकि कभी आजीविका का मुख्य साधन रही झाप बनाने की यह खानदानी कला अब धीरे-धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई है. उचित मूल्य और कच्चा माल नहीं मिलने के कारण इस समाज के लोग अब पलायन को मजबूर हो रहे हैं.

नागपंचमी पर झाप चढ़ाने की है विशेष मान्यता

नागपंचमी के दिन दूध, खीर और लावा के साथ-साथ झाप भी नाग देवता को समर्पित किया जाता है. धार्मिक मान्यता है कि इस मुकुट रूपी चढ़ावे से भगवान शिव और उनकी मानस पुत्री मनसा देवी बेहद प्रसन्न होती हैं. इसके सकारात्मक प्रभाव से हर प्रकार के डर, भय, संकट और अकाल मृत्यु का अंत हो जाता है.

विलुप्त हो रही है झाप बनाने की पुश्तैनी कला

आमतौर पर दुर्गा मंदिर, ब्रह्मस्थान, गहबर और ग्राम देवता के पूजास्थलों पर देवी-देवताओं को यह आकर्षक झाप चढ़ाया जाता है. लेकिन अब इस मंडपनुमा कलाकृति को बनाने वाले कलाकार बहुत कम बचे हैं. मालाकार समाज का यह पुश्तैनी पेशा अब दिनोंदिन खत्म होता जा रहा है.

महानगरों की ओर पलायन को मजबूर हैं कलाकार

अपनी खराब आर्थिक स्थिति और सरकार के उदासीन रवैये को देखकर कलाकार अब खानदानी पेशा छोड़ रहे हैं. ये लोग रोजी-रोटी की तलाश में दिल्ली, पंजाब, मुंबई, हरियाणा और कोलकाता जैसे महानगरों में मजदूरी करने जा रहे हैं. बखरी के वार्ड 12 निवासी जयप्रकाश मालाकार ने इस चिंताजनक स्थिति पर अपनी बात रखी है.

कच्चे माल की कमी से गहरा गया है संकट

जयप्रकाश मालाकार ने बताया कि पहले ग्रामीण इलाकों के चौर और तालाब से पानी में तैरकर झाप बनाने के लिए कोढ़िला लाया जाता था. सोनई की खेती होती थी जिसके संठी और कोढ़िला से यह आकर्षक झाप तैयार होता था. लेकिन अब चौर सूखने से उपज कम हो गई है और लागत के अनुपात में सही मूल्य भी नहीं मिल पाता है.

बदल गया है क्षेत्र का सामाजिक परिवेश

बखरी प्रखंड के संतोषी टोला, सलौना, मक्खाचक और अन्य गांवों में लोग मजदूरी करके अपना जीवन यापन कर रहे हैं. राजेश मालाकार ने बताया कि पहले महिलाएं घर-घर जाकर पूजा के लिए फूल पहुंचाती थीं. लेकिन बदलते सामाजिक परिवेश और आपराधिक घटनाओं के कारण अब महिलाओं ने फूल पहुंचाना लगभग बंद कर दिया है.

अनुसूचित जाति में शामिल करने की उठी बड़ी मांग

पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कर्पूरी ठाकुर ने 1977 में मालाकार जाति को अतिपिछड़ा वर्ग में शामिल किया था जिससे समाज को आगे बढ़ने का मौका मिला. अब यह समाज बच्चों को पढ़ाने और भरण-पोषण के लिए खेतीबाड़ी व मवेशी पालन पर निर्भर है. समाज के लोगों ने सीएम सम्राट चौधरी से मालाकार जाति को अनुसूचित जाति कोटि में शामिल करने की प्रमुख मांग की है.

Also Read : बेगूसराय में शराब तस्करों पर पुलिस का एक्शन, 15 लीटर देसी शराब और बाइक जब्त, दो गिरफ्तार


विज्ञापन
Vikash Kumar

लेखक के बारे में

By Vikash Kumar

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन