कौन थे रामचरित्र सिंह? जिनके नेतृत्व में बेगूसराय बना आजादी आंदोलन का केंद्र

Author Vikash Kumar|Edited by Sakshi Kumari
Updated:
विज्ञापन

रामचरित्र सिंह का फाइल फोटो

Ramcharitra Singh : रामचरित्र सिंह, बेगूसराय के महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद् और बिहार के पूर्व मंत्री थे. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर शिक्षा और जनसेवा तक में महत्वपूर्ण योगदान दिया. उनका जीवन आज भी प्रेरणास्रोत है.

विज्ञापन

Ramcharitra Singh : बेगूसराय के महान स्वतंत्रता सेनानी, शिक्षाविद् और बिहार के पूर्व मंत्री रामचरित्र सिंह का नाम राज्य के इतिहास में सम्मान के साथ लिया जाता है. उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर शिक्षा, सिंचाई और जनसेवा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान देकर आधुनिक बिहार के विकास में अहम भूमिका निभाई.

आपके शहर में

विज्ञापन

बीहट से शुरू हुआ संघर्ष और शिक्षा का सफर

रामचरित्र सिंह का जन्म 5 जून 1885 को बेगूसराय के बीहट स्थित मसनदपुर में हुआ था. प्रारंभिक शिक्षा बीहट में प्राप्त करने के बाद उन्होंने बीपी हाई स्कूल, पटना कॉलेजिएट स्कूल और पटना कॉलेज से उच्च शिक्षा हासिल की. विज्ञान में स्नातक और एमएससी की पढ़ाई पूरी करने के साथ उन्होंने कानून की शिक्षा भी प्राप्त की.

सरकारी नौकरी छोड़ स्वतंत्रता आंदोलन में हुए शामिल

शिक्षक के रूप में अपने करियर की शुरुआत करने वाले रामचरित्र सिंह ने महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन से प्रेरित होकर सरकारी सेवा छोड़ दी. इसके बाद उन्होंने समस्तीपुर के राष्ट्रीय विद्यालय, बिहार विद्यापीठ और मुजफ्फरपुर के लंगट सिंह कॉलेज में रसायन विज्ञान के प्राध्यापक के रूप में भी अपनी सेवाएं दीं.

नमक सत्याग्रह से लेकर भारत छोड़ो आंदोलन तक निभाई अहम भूमिका

वर्ष 1930 के नमक सत्याग्रह के दौरान उन्होंने तेघड़ा क्षेत्र के दरगहपुर-गोधना में साथियों के साथ नमक कानून तोड़ा, जिसके बाद उन्हें पहली बार गिरफ्तार किया गया. उनके नेतृत्व में बीहट स्वतंत्रता आंदोलन का प्रमुख केंद्र बना, जिसे उस समय बिहार का बारदोली कहा जाने लगा. वर्ष 1931 के बेगूसराय गोलीकांड के जुलूस का नेतृत्व भी उन्होंने किया. वर्ष 1932 में वे मुंगेर जिला कांग्रेस समिति के अधिनायक बने और बाद में बिहार प्रांतीय कांग्रेस समिति के मंत्री तथा मुंगेर जिला कांग्रेस समिति के अध्यक्ष भी रहे. वर्ष 1940 के व्यक्तिगत सत्याग्रह और 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में भी उन्होंने जेल की यातनाएं झेलीं.

आजादी के बाद मंत्री और विधायक के रूप में निभाई जिम्मेदारी

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद वर्ष 1947 में रामचरित्र सिंह विधानसभा सदस्य चुने गए और बिहार सरकार में बिजली एवं सिंचाई मंत्री बने. वर्ष 1952 में तेघड़ा से विधायक निर्वाचित होकर उन्होंने सिंचाई और ट्यूबवेल योजनाओं को नई दिशा देने का कार्य किया. वर्ष 1957 में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने के बाद भी उन्होंने जनता के समर्थन से चुनाव लड़ा और जीत हासिल कर दोबारा विधानसभा पहुंचे.

शिक्षा और प्रशासनिक क्षेत्र में भी छोड़ी अमिट छाप

रामचरित्र सिंह पटना विश्वविद्यालय के वरिष्ठ निकाय के सदस्य, इंजीनियरिंग कॉलेज की अनुशासन समिति के सदस्य तथा कुछ समय के लिए पटना विश्वविद्यालय के उपकुलपति भी रहे. विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि के रूप में उन्होंने कैंब्रिज विश्वविद्यालय के सम्मेलन में भी भाग लिया. प्रशासनिक कार्यों में उनकी ईमानदारी, अनुशासन और कार्यशैली की व्यापक सराहना होती थी. मंत्री रहते हुए वे विकास योजनाओं का स्वयं निरीक्षण करते थे और अधिकारियों से नियमित जवाबदेही सुनिश्चित करते थे.

1967 में हुआ निधन, लेकिन योगदान आज भी प्रेरणास्रोत

सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने के बाद 17 जून 1967 को रामचरित्र सिंह का निधन हो गया. स्वतंत्रता संग्राम, शिक्षा, सिंचाई विकास और जनसेवा में उनके योगदान के कारण आज भी बेगूसराय और बिहार उन्हें सम्मान और गर्व के साथ याद करता है.

Also Read : बेगूसराय : 12 घंटे की रूक-रूक कर हुई बारिश से स्कूल बना तालाब, रसोई में घुसा पानी, मिड-डे मील ठप


विज्ञापन

Prabhat Khabar App :

देश, एजुकेशन, मनोरंजन, बिजनेस अपडेट, धर्म, क्रिकेट, राशिफल की ताजा खबरें पढ़ें यहां. रोजाना की ब्रेकिंग हिंदी न्यूज और लाइव न्यूज कवरेज के लिए डाउनलोड करिए

Download from Google PlayDownload from App Store
विज्ञापन