झरना मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

Published at :15 Jan 2016 6:42 PM (IST)
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झरना मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

झरना मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ – पीर मांगन शाह की मजार पर भी लगा मेला फोटो 14 बांका 4, 5 : पवित्र झरना में स्नान करते श्रद्धालु एवं मांगन शाह की मजार पर चादरपोशी करते जायरीन अमरपुर : महर्षि अष्टावक्र से जुड़ी झरना पहाड़ी और इसी के नीचे गर्म जल के कुंड में […]

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झरना मेले में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़ – पीर मांगन शाह की मजार पर भी लगा मेला फोटो 14 बांका 4, 5 : पवित्र झरना में स्नान करते श्रद्धालु एवं मांगन शाह की मजार पर चादरपोशी करते जायरीन अमरपुर : महर्षि अष्टावक्र से जुड़ी झरना पहाड़ी और इसी के नीचे गर्म जल के कुंड में मकर संक्रांति को लेकर श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी. हजारों की संख्या में पहुंचे लोगों ने कुंड में स्नान कर पहाड़ी पर बने शिवालय एवं वनदेवी के मंदिर में पूजा-अर्चना की. बड़ी संख्या में लोगों ने पास ही के एक पहाड़ की चोटी पर स्थित सूफी संत पीर मांगन शाह की मजार पर भी चादरपोशी व इबादत की. उल्लेख है कि झरना पहाड़ी को सनातन एवं इसलाम समुदाय के संयुक्त धार्मिक केंद्र का दर्जा प्राप्त है. यहां हर वर्ष मकर संक्रांति एवं पहली जनवरी को भव्य मेला लगता है. पिछले दो वर्षों से संक्रांति की तिथि आगे सरक जाने की वजह से 14 जनवरी को यहां आगंतुकों की भारी भीड़ उमड़ती है. यह इस इलाके खास कर आदिवासी समुदाय के लिए लोक मेला है. जहां बौंसी मेले की तरह घरेलू एवं कृषि उत्पादों का बड़ा बाजार सजता है. बड़े पैमाने पर खरीदारी होती है. मेला दो दिनों तक चलता है. मान्यता है कि झरना पहाड़ी महर्षि अष्टावक्र की तपो भूमि है. यहीं वन देवी मंदिर के समीप उनका आश्रम रहा है जो अब जमीनदोज हो चुका है. सरकार एवं पर्यटन विभाग ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया. जिससे यहां की विरासत और परंपराएं क्षेत्र के लोगों के ऊपर निर्भर रह गया. पहाड़ के एक हिस्से में भीम अखाड़ा भी है. जबकि दूसरे हिस्से में मांगन शाह की मजार. दोनों समुदायों के लोग इस पहाड़ी को अपना पवित्र धार्मिक केंद्र मानते है. मकर संक्रांति दोनों समुदायों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है. यही वजह है कि इस दिन यहां भारी भीड़ लगती है. प्रशासनिक उपेक्षा का आलम यह है कि यहां लगने वाला संक्रांति मेला महज कुछ आरक्षियों और चौकीदारों के हवाले रहता है. जबकि यह संपूर्ण जंगली और दुर्गम क्षेत्र है. सुरक्षा के अभाव में लोग असहज महसूस करते है. भले ही मेला दो दिनों का हो, लेकिन शाम के बाद लोग वापस घरों में लौट जाना चाहते है.

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