ठंड में थोड़ी गरमी का एहसास है मकर संक्रांति
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :15 Jan 2016 2:42 AM (IST)
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बांका : ठंडी में भी गरमी का अहसास ! जी हां, मकर संक्रांति कुछ इसी आशय की अवधारणा को स्थापित करता है. अंग क्षेत्र में यह लोक पर्व के रूप में मनाया जाता है. इस दिन तिल और गुड़ का खास महत्व है. मान्यता है कि इसी तिथि से दिन तिल – तिल कर बढ़ता […]
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बांका : ठंडी में भी गरमी का अहसास ! जी हां, मकर संक्रांति कुछ इसी आशय की अवधारणा को स्थापित करता है. अंग क्षेत्र में यह लोक पर्व के रूप में मनाया जाता है. इस दिन तिल और गुड़ का खास महत्व है. मान्यता है कि इसी तिथि से दिन तिल – तिल कर बढ़ता है और सूरज की तपिश भी. तिल और गुड़ गर्मी के वासंती स्वरूप के स्वागत का प्रतीक माना जाता है.
वैदिक स्थापनाओं के मुताबिक इसी दिन सूर्य दक्षिणायण से उत्तरायण होकर मकर राशि में प्रवेश करता है. लिहाजा मौसम की उष्णता के साथ – साथ दिन का भी आकार बढ़ने लगता है. यह तिथि मौसम का संक्रमण काल होता है. सर्द मौसम उष्णता ग्रहण करने लगता है. सर्दी का समापन और गर्मी का आगाज हो जाता है. यह सर्दी और गर्मी का संगम पर्व है जो वसंत ऋतु में तब्दील हो जाता है. हालांकि वसंत ऋतु वसंत पंचमी से लगायत होली तक परवान पर होता है. इस दौरान फिजां रंगीन और वातावरण सुरभित हो जाता है.
आम तौर पर मकर संक्रांति के बाद मौसम में क्रमश: आने वाली गरमाहट के कारण लोग एक – एक कर गर्म कपड़े उतारने लगते है. बिस्तर पर रजाई और कंबलों का भी वजन कम होने लगता है. लोग मौसम के इस भाईचारे की वजह से सहज और बेहतर महसूस करने लगते है. इस मौसम में आहलादित लोगों के बीच एक लोकोक्ति भी काफी प्रचलित है…. तिल – तिल करि गेलय जाड़… और इस तरह जाड़े की वास्तव में विदाई होने लगती है.
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