दही-जोरन समीकरण के तर्ज पर तैयार होगा जैविक खाद

Published at :13 May 2018 8:06 AM (IST)
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दही-जोरन समीकरण के तर्ज पर तैयार होगा जैविक खाद

बांका : रासायनिक खाद की जकड़ से जहां इन दिनों तमाम खेतों की कोख बीमार हो रही है. वहीं धरती की कोख को बचाने के लिए वेस्ट डिकंपोजर जैविक खाद के रूप में एक नया किरण बनकर आया है. जी हां, एक बार वेस्ट डिकंपोजर घर लाने के बाद हमेशा के लिए खाद की किल्लत […]

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बांका : रासायनिक खाद की जकड़ से जहां इन दिनों तमाम खेतों की कोख बीमार हो रही है. वहीं धरती की कोख को बचाने के लिए वेस्ट डिकंपोजर जैविक खाद के रूप में एक नया किरण बनकर आया है. जी हां, एक बार वेस्ट डिकंपोजर घर लाने के बाद हमेशा के लिए खाद की किल्लत से छुटकारा मिल सकता है.
जैसे जोरन से दही का निर्माण करते हैं, इसी पद्धति से वेस्ट डिकंपोजर का निर्माण बारंबार कर सकते हैं.
कृषि प्रौद्योगिक कृषि प्रौद्योगिकी प्रबंध अभिकरण, आत्मा के तत्वावधान में इन दिनों वेस्ट डिकंपोजर प्रत्येक किसान के हाथ में थमाने का अभियान चला हुआ है. जानकारी के मुताबिक वेस्ट डिकंपोजर लिक्विड है. खासियत यह है कि इस लिक्विड से खाद का निर्माण घर बैठे आसानी से कर सकते हैं. राष्ट्रीय जैविक केंद्र, गाजियाबाद से वेस्ट डिकंपोजर तैयार किया गया है. जिसका प्रचार-प्रसार बांका तक पहुंच गया है. बीते दो सप्ताह पूर्व आत्मा कार्यालय में एक बैठक आयोजित कर किसानों की इसकी विस्तृत जानकारी दी गयी. साथ ही वेस्ट डिकंपोजर कल्चर आत्मा से किसानों को दिया जा रहा है. किसान वेस्ट डिकंपोजर एक बोतल लिक्विड लेकर घर में दस-दस लीटर जैविक खाद तैयार कर सकते हैं.
बनाने की विधि
एक लीटर वेस्ट डिकंपोजर में नौ लीटर पानी, एक सौ ग्राम गुड़ मिलाकर एक डब्बे में घोल कर रख दें. चार दिन के अंदर यह तरल खाद बन जायेगा. इसी प्रकार दस लीटर तैयार डिकंपोजर में से एक लीटर बचा कर रख लें और नौ लीटर का उपयोग फसल में कर दें. बचे हुए एक लीटर से पुन: दस लीटर इसी विधि से तैयार कर सकते हैं. इसी प्रकार इसका उपयोग सदैव होता रहेगा. परंतु यह याद रखना आवश्यक है कि तैयार डिकंपोजर में हमेशा एक-दो लीटर बचा कर ही रखना है.
सब्जी सहित अन्य फसलों के लिए लाभदायक
वेस्ट डिकंपोजर पूरी तरह जैविक उर्वरक है, जो लिक्विड के रूप में रहता है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से कद्दू, साग, भिंडी, मिर्ची सहित सभी प्रकार के सब्जियों व अन्य फसलों में कर सकते हैं. वैज्ञानिकों का दावा है कि धान व गेहूं की खेती में भी इसका उपयोग प्रभावशाली है. वहीं दूसरी ओर अड़हुल फूल में भी इसके उपयोग से न केवल पौधे स्वस्थ रहते हैं, बल्कि उसमें लगे हुए सभी कीड़े नीचे गिरकर मर जाते हैं.
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