अभिलेख के पन्नों में इतिहास बन गये लिपि के जानकार
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :28 Feb 2018 5:19 AM (IST)
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कैथी अभिलेख पढ़ने वाला जिले में एक भी लिपिक नहीं 1905 में तैयार दस्तावेज गठरी में कैद बांका : आधुनिक युग में नीति व क्रियान्वयन सभी हाइटेक हो रहे हैं. पुरानी कार्यप्रणाली अब धीरे-धीरे मृत अवस्था में पहुंच रही है. मौजूदा समय में कैथी लिपि भी एक तरह से इतिहास के पन्नों में दफन सा […]
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कैथी अभिलेख पढ़ने वाला जिले में एक भी लिपिक नहीं
1905 में तैयार दस्तावेज गठरी में कैद
बांका : आधुनिक युग में नीति व क्रियान्वयन सभी हाइटेक हो रहे हैं. पुरानी कार्यप्रणाली अब धीरे-धीरे मृत अवस्था में पहुंच रही है. मौजूदा समय में कैथी लिपि भी एक तरह से इतिहास के पन्नों में दफन सा होने लगा है. आज ढूंढ़ने पर भी कैथी भाषा को समझने व पढ़ने वाला जानकार नहीं मिल रहा है. जिसके कारण आम जनता के साथ-साथ जिला प्रशासन भी इस समस्या से जूझ रही है. पुरानी जमीन के अधिकतर कागजात कैथी लिपि में ही हैं. लेकिन भाषा की जानकारी न होने के कारण जिले में कई ऐसे मामले पड़े हुए हैं जिनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही है. जिसके कारण आज के समय में भी निबंधन व कोर्ट के अलावा जिला प्रशासन को कैथी लिपिक की प्रबल आवश्यकता होती है. जानकारी के मुताबिक समाहरणालय के जिला अभिलेखागार में 1905 का जमीन सर्वे रिपोर्ट व दस्तावेज गठरी में बंधा पड़ा हुआ है.
जमीन संबंधित सभी कागजात केवल कैथी लिपि में ही अंकित हैं. कैथी लिपि अब किसी भी अधिकारी व कर्मी को समझ में नहीं आ रहा है. नतीजतन, जमीन संबंधित कई तरह के मामलों का यहां निष्पादन नहीं हो रहा है. घरेलू विवादों सहित अन्य विवादों के लिए पक्षकारों के द्वारा जमीन के कागजात के नकल के लिए समाहरणालय के अभिलेखागार में रोज आवेदन पड़ रहे हैं. लेकिन इन आवेदनों में नकल के लिए कैथी का जानकार होना जरूरी है जो नहीं रहने से आवेदकों को नकल प्राप्त नहीं हो रहा है.
अंग्रेज शासन काल से ही कैथी लिपि
का रहा है प्रचलन
कैथी भाषा की उत्पत्ति कायस्थ शब्द से हुआ है. जानकारों की मानें तो अंग्रेजी हुकूमत के दौरान इस भाषा का प्रचलन सर्वाधिक था. 1905 व 1954 में में लिखे गये दस्तावेज कैथी लिपि में ही है. इसका अबतक रूपांतर नहीं हो पाया है. पूर्व में कुछ गिने-चुने इस भाषा के जानकार थे. परंतु सेवानिवृत्ति व उम्र सीमा पार करने के बाद सेवानिवृत्त व स्वर्ग सिधार गये है. आलम यह है कि नयी पीढ़ी को इस विषय की जानकारी देने वाला कोई नहीं मिल रहा है. बताया जाता है कि आज भी कैथी लिपि से तैयार दस्तावेज के आधार भी ही ज्यादातर जमीन बंटवारा हुआ है. जमीन विवाद होने पर जब कैथी दस्तावेज को प्रस्तुत किया जाता है, तो उसे पढ़कर समझने वाला कोई नहीं मिल रहा है.
वर्तमान में कैथी भाषा को पढ़ने व समझने वाला लिपिक नहीं है. जिससे परेशानी हो रही है. राज्य से इसकी मांग की गयी है. ताकि विभिन्न वादों का आसानी से निबटारा हो सके व अभिलेखों का नकल दिया जा सके. परंतु विभाग के द्वारा इस मामले में किसी कैथी जानकार की प्रतिनियुक्ति नहीं की गयी है.
आदित्य कुमार झा, प्रभारी अभिलेखागार पदाधिकारी, बांका
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