नोटबंदी से किसी को किसी कष्ट से नहीं मिला छुटकारा

Published at :08 Nov 2017 6:03 AM (IST)
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नोटबंदी से किसी को किसी कष्ट से नहीं मिला छुटकारा

कटोरिया : जब पिछले साल 8 नवंबर की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए नोटबंदी की घोषणा की थी, तो पूरा देश अचंभित होकर चौंका था. सबके मन में आशा बंधी थी कि देश में भारी आर्थिक बदला आयेगा, काला धन घटेगा, सामान्य लोगों को राहत मिलेगी. जब नोटबंदी […]

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कटोरिया : जब पिछले साल 8 नवंबर की रात 8 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश को संबोधित करते हुए नोटबंदी की घोषणा की थी, तो पूरा देश अचंभित होकर चौंका था. सबके मन में आशा बंधी थी कि देश में भारी आर्थिक बदला आयेगा, काला धन घटेगा, सामान्य लोगों को राहत मिलेगी. जब नोटबंदी लागू हो गयी, तो पूरा देश असाध्य कष्ट के सागर में डूब गरीब-अमीर व मध्यवर्गीय लोग समान रूप से बैंकों की पंक्तियों में लग गये. अमीरों के मन में तो कुछ भय था,

लेकिन मध्यवर्गीय लोग बहुत आशा लगा कर बैठे कि कष्ट चाहे क्यों ना हो, इसको हम पार हो जायेंगे, फिर अच्छे सुख का उपभोग करेंगे. नोटबंदी का आज एक वर्ष पूरा हुआ, लेकिन देश में किसी को किसी कष्ट से छुटकारा नहीं मिला. और तो और लोगों के हाथ में अपने कमाये हुए जो पर्याप्त पैसे रहते थे, उस पर भी डिजिटलाइजेशन का ऐसा बंधन लगा कि आम जनजीवन बेहाल हो गया. जब हम विश्लेषण करने बैठते हैं, तो पाते हैं कि जितना काला धन था, सब बैंकों में जाकर सफेद हो गया.

सरकार तो आंकड़ों में बोलती है. सरकार की जुबान पढ़े-लिखे अर्थशास्त्रियों की भाषा बोलती है. जो लोग धनी हैं, उनका तो काम चल जाता है, लेकिन जो आमजन हैं उनको कोई बात समझ में नहीं आती है. जिस चीज के लिये जीएसटी लगाना था, उन पेट्रोलियम पदार्थों पर तो जीएसटी लगा ही नहीं. दो, चार व दस रूपये करके पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें कभी-कभार घटती तो है, लेकिन जब बढ़ती है तो सौ रुपये तक बढ़ जाती है. न कपड़े का दाम घटा, न मोबाइल का दाम कम हुआ, न टीवी का, न कंप्यूटर का और न विद्यार्थियों के टेबलेट का, तो नोटबंदी का प्रभाव किधर देखें, किधर खोजें. किसानों की आत्महत्या वैसे ही हो रही है. रासायनिक खादों व कीटनाशक दवाओं पर नोटबंदी का प्रभाव नहीं पड़ा. सीमेंट व लोहे के दाम नहीं घटे. केवल सरकारी आंकड़ों में कालेधन वाले घट रहे हैं. आज हम हार कर यह कहना चाहते हैं कि जिसे हम आम आदमी कहते हैं, उनमें से मुख्यत: किसान व मजदूर हैं. मजदूर तो बिना पैसे के काम नहीं करेगा, लेकिन किसान क्या करे. उसके उत्पादों का मूल्य निर्धारण करने वाला कोई नहीं है. लेकिन उसका माई-बाप, उसकी दु:ख-व्यथा को समझने वाला, उसके प्रति संवेदना व्यक्त करने वाला सब सिर्फ लंबे कुरते और ऊंची पगड़ी वाले ही हैं. भारत की सरकार किसी एक आम किसान से पूछ ले कि उसके जीवन में नोटबंदी से क्या लाभ हुआ, तो पूरे देश की आर्थिक सुधार के इस कदम और इस पहल का आईना सबके सामने आ जायेगा.

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