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ललित नारायण मिश्र हत्याकांड में चार दोषियों को उम्रकैद

Updated at : 18 Dec 2014 3:30 PM (IST)
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ललित नारायण मिश्र हत्याकांड में चार दोषियों को उम्रकैद

नयी दिल्ली : पूर्व रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के मामले में दोषी करार दिये गये चारों आरोपियों को आज कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनायी है. यह फैसला दिल्लीकेकड़कड़डूमा कोर्ट ने सुनाया. इससे पहले आठ दिसंबर को इन चारों आरोपियों को दोषी करार दिया गया था. सभी चार अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता […]

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नयी दिल्ली : पूर्व रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या के मामले में दोषी करार दिये गये चारों आरोपियों को आज कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनायी है. यह फैसला दिल्लीकेकड़कड़डूमा कोर्ट ने सुनाया. इससे पहले आठ दिसंबर को इन चारों आरोपियों को दोषी करार दिया गया था.

सभी चार अभियुक्तों को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 के तहत हत्या का दोषी करार दिया गया था.अदालत ने चारों दोषियों को हिरासत में लेने का आदेश दिया है. इन चारों आरोपियों की सजा पर 15 दिसंबर को बहस लेकिन सजा का ऐलान 18 दिसंबर तक के लिए टाल दिया गया था. आज कोर्ट ने चारों आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनायी.

बिहार के समस्तीपुर रेलवे स्टेशन पर दो जनवरी, 1975 को तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र की हत्या कर दी गयी थी.जिला न्यायाधीश विनोद गोयल ने 12 सितंबर को इस हत्याकांड में सीबीआइ और इस हत्याकांड के चारों अभियुक्तों के वकीलों की दलीलें सुनने की कार्यवाही पूरी की थी. अदालत ने कहा था कि इस मामले में 12 नवंबर को फैसला सुनाया जायेगा, लेकिन बाद में इसे आठ दिसंबर के लिए स्थगित कर दिया गया था, क्योंकि निर्णय तैयार नहीं हो सका था. यह मामला दो जनवरी, 1975 को तत्कालीन रेलमंत्री ललित नारायण मिश्र इस समारोह में शामिल होने आये थे. विस्फोट में जख्मी मिश्र की अगले दिन मृत्यु हो गयी थी.

इस हत्याकांड के मुकदमे की सुनवाई के दौरान 200 से अधिक गवाहों से पूछताछ हुई. इसमें अभियोजन पक्ष के 161 और बचाव पक्ष के 40 से अधिक गवाह शामिल थे. हत्याकांड में आरोपी वकील रंजन द्विवेदी को 24 साल की उम्र में आनंद मार्ग समूह के चार सदस्यों के साथ आरोपी बनाया गया था. द्विवेदी के अलावा मामले में संतोषानंद अवधूत, सुदेवानंद अवधूत व गोपालजी अभियुक्त हैं.

एक अभियुक्त की मुकदमे की सुनवाई के दौरान ही मृत्यु हो गयी थी. इससे पूर्व अभियुक्तों ने मुकदमे का निबटारा होने में अधिक विलंब के आधार पर सारी कार्यवाही निरस्त करने के लिए शीर्ष अदालत गये थे. शीर्ष अदालत ने ही 17 अगस्त, 2012 को इनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि 37 साल से मुकदमे की सुनवाई पूरी नहीं हाने के आधार पर कार्यवाही निरस्त नहीं की जा सकती है.

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