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Tokyo Paralympics: एक किताब ने बदल दी ‘गोल्डन गर्ल’ अवनि लेखरा की जिंदगी, हादसे के बाद भी नहीं मानी हार

भारतीय निशानेबाज अवनि लखेड़ा ने तोक्यो पैरालिंपिक में निशानेबाजी में गोल्ड मेडल जीता. यह इस पैरालिंपिक में भारत का पहला गोल्ड मेडल है.

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
अवनि लेखरा
अवनि लेखरा
प्रभात खबर

Tokyo Paralympics 2020 : तोक्यो पैरालिंपिक में भारतीय एथलीटों के धमाकेदार प्रदर्शन ने सोमवार का दिन गोल्डन कर दिया. भारत की ओर से पैरा निशानेबाज अवनि लेखरा ने महिलाओं की आर-2 10 मीटर एयर राइफल स्टैंडिंग एसएच1 में भारत के लिए गोल्ड जीता. फिर योगेश कथुनिया ने चक्का फेंक में रजत पदक जीत कर भारत के मेडलों की संख्या चार तक पहुंचायी. इस खुशी में भारतीय प्रशंसक झूम ही रहे थे कि शाम को सुमित ने 68.55 मीटर दूर भाला फेंककर गोल्ड मेडल अपने नाम कर जश्न को दोगुना कर दिया. भारत का इसके साथ ही मेडलों की संख्या सात पहुंच गयी है, जो पैरालिंपिक खेलों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन है.

पैरालिंपिक में स्वर्ण जीतने वाली पहली भारतीय महिला

भारत की अवनि लेखरा ने सोमवार को यहां तोक्यो पैरालिंपिक खेलों की निशानेबाजी प्रतियोगिता में महिलाओं के आर-210 मीटर एयर राइफल के क्लास एसएच1 में स्वर्ण पदक जीतकर भारतीय खेलों में नया इतिहास रचा. जयपुर की रहनेवाली यह 19 वर्षीय निशानेबाज पैरालिंपिक में स्वर्ण पदक जीतनेवाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गयी हैं. उनकी रीढ़ की हड्डी में 2012 में कार दुर्घटना में चोट लग गयी थी. उन्होंने 249.6 अंक बनाकर विश्व रिकॉर्ड की बराबरी की. यह पैरालिंपिक खेलों का नया रिकॉर्ड है.

कभी हार नहीं मानी ‘गोल्डन गर्ल’ अवनि ने

अवनि से पहले भारत की तरफ से पैरालिंपिक खेलों में मुरलीकांत पेटकर (पुरुष तैराकी, 1972), देवेंद्र झाझरिया (पुरुष भाला फेंक, 2004 और 2016) तथा मरियप्पन थंगावेलु (पुरुष ऊंची कूद, 2016) ने स्वर्ण पदक जीते थे. अवनि ने कहा कि मैं अपनी भावनाओं को व्यक्त नहीं कर सकती. अवनि लेखरा को 2012 में हुई एक कार दुर्घटना के बाद व्हीलचेयर का सहारा लेना पड़ा, क्योंकि उनके पैर हिल-डुल नहीं पाते थे, लेकिन यह हादसा उनके और उनके परिवार के इरादों को जरा भी नहीं डिगा सका और उन्होंने सभी तरह की परिस्थितियों का डट कर सामना किया.

इस किताब ने बदली जिंदगी

इस दुर्घटना में अवनि की रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट लगी थी. उनके पिता के जोर देने पर उन्होंने निशानेबाजी करना शुरू किया. पूर्व ओलिंपिक निशानेबाज सुमा शिरूर की देखरेख में वह ट्रेनिंग करने लगी. वह फुल-टाइम निशानेबाज नहीं बनना चाहती थीं, लेकिन अभिनव बिंद्रा (भारत के पहले ओलिंपिक व्यक्तिगत स्वर्ण पदक विजेता निशानेबाज) की आत्मकथा ‘ए शॉट एट ग्लोरी’ पढ़ने के बाद वह इतनी प्रेरित हुईं कि उन्होंने अपने पहले ही पैरालिंपिक में इतिहास रच दिया.

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