जगन्नाथ मंदिर के 4 रहस्यमयी द्वार और 22 सीढ़ियों का अनोखा रहस्य, तीसरी सीढ़ी को लेकर क्या कहती है मान्यता?
जगन्नाथ मंदिर के दरवाजों का रहस्य
जगन्नाथ रथ यात्रा भारत के सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है. वर्ष 2026 में रथ यात्रा 16 जुलाई से शुरू हो चुकी है और लाखों श्रद्धालु भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के दर्शन के लिए पुरी पहुंच रहे हैं. रथ यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं का सबसे बड़ा आकर्षण श्री जगन्नाथ मंदिर होता है, जो अपनी भव्यता, प्राचीन परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए विश्वभर में प्रसिद्ध है.
Jagannath Temple: 16 जुलाई 2026 से शुरू होने वाली है. इस मौके पर जगन्नाथ रथ यात्रा के साथ पुरी में भक्तों की भीड़ को मिल सकता है. भगवान जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की भव्य रथ यात्रा में शामिल होने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु ओडिशा पहुंच रहे हैं. रथ यात्रा के दौरान भक्त न केवल रथों के दर्शन करते हैं, बल्कि विश्व प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में भी पूजा-अर्चना करते हैं. यह मंदिर अपनी प्राचीन परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के कारण विशेष महत्व रखता है.
जगन्नाथ मंदिर के चार दिव्य द्वार
जगन्नाथ मंदिर की बाहरी परिधि में चार प्रमुख प्रवेश द्वार बने हुए हैं. ये चारों दिशाओं में स्थित हैं और क्रमशः सिंहद्वार, व्याघ्र द्वार, हस्ति द्वार तथा अश्व द्वार कहलाते हैं. धार्मिक दृष्टि से इन द्वारों को धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य का प्रतीक माना जाता है. प्रत्येक द्वार की अपनी अलग पहचान और आध्यात्मिक मान्यता है.
सिंहद्वार: मोक्ष का प्रवेश मार्ग
मंदिर का पूर्वी द्वार सिंहद्वार कहलाता है और यही मुख्य प्रवेश द्वार भी है. इसके दोनों ओर झुकी हुई मुद्रा में शेरों की प्रतिमाएं स्थापित हैं. धार्मिक मान्यता है कि इस द्वार से प्रवेश करने वाला भक्त आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होता है. अधिकांश श्रद्धालु इसी मार्ग से मंदिर में प्रवेश करते हैं.
व्याघ्र द्वार: धर्म पालन का संदेश
मंदिर का पश्चिमी द्वार व्याघ्र द्वार के नाम से जाना जाता है. यहां बाघ की प्रतिमा स्थापित है, जो साहस और धर्म के पालन का प्रतीक मानी जाती है. मान्यता है कि यह द्वार मनुष्य को इच्छाओं पर नियंत्रण रखते हुए धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है. कई संत और विशेष साधक इसी द्वार से प्रवेश करना शुभ मानते हैं.
हस्ति द्वार और अश्व द्वार का महत्व
उत्तरी दिशा में स्थित हस्ति द्वार के दोनों ओर हाथियों की प्रतिमाएं हैं. हाथी को देवी लक्ष्मी से जोड़ा जाता है और यह समृद्धि तथा ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. वहीं दक्षिण दिशा में स्थित अश्व द्वार विजय और पराक्रम का प्रतीक है. इस द्वार पर घोड़ों की प्रतिमाएं हैं, जिनकी पीठ पर भगवान जगन्नाथ और बलभद्र युद्ध मुद्रा में विराजमान बताए जाते हैं.
22 सीढ़ियां क्यों कहलाती हैं ‘बैसी पहाचा’?
जगन्नाथ मंदिर की 22 सीढ़ियां ‘बैसी पहाचा’ के नाम से प्रसिद्ध हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार ये सीढ़ियां मानव जीवन की 22 कमजोरियों और दोषों का प्रतीक हैं. भक्त जब इन सीढ़ियों को पार करते हैं तो माना जाता है कि वे अपने भीतर की बुराइयों और नकारात्मक प्रवृत्तियों को पीछे छोड़ते हुए भगवान की शरण में पहुंचते हैं.
तीसरी सीढ़ी को लेकर रहस्यमयी मान्यता
इन 22 सीढ़ियों में तीसरी सीढ़ी को सबसे रहस्यमयी माना जाता है. पौराणिक कथाओं के अनुसार इसे ‘यम शिला’ कहा जाता है. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ के दर्शन कर लौटते समय इस सीढ़ी पर पैर नहीं रखना चाहिए. ऐसा माना जाता है कि यदि कोई व्यक्ति इस सीढ़ी पर पैर रख देता है तो उसके अर्जित पुण्य क्षीण हो सकते हैं. हालांकि यह धार्मिक आस्था और लोकविश्वास का विषय है, लेकिन आज भी लाखों श्रद्धालु इस परंपरा का पालन करते हैं.
आस्था, परंपरा और रहस्य का अद्भुत संगम
जगन्नाथ मंदिर केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, आस्था और परंपराओं का जीवंत प्रतीक है. इसके चारों द्वार और 22 सीढ़ियां सदियों पुरानी मान्यताओं को आज भी जीवित रखे हुए हैं. यही कारण है कि रथ यात्रा के दौरान यहां आने वाले श्रद्धालु केवल दर्शन ही नहीं करते, बल्कि मंदिर से जुड़े इन रहस्यों को भी जानने की उत्सुकता रखते हैं.
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