कौन हैं बिबेक देबराॅय, जिन्होंने की थी नए संविधान की मांग, झारखंड से भी रहा है गहरा नाता

Published by : Rajneesh Anand Updated At : 01 Nov 2024 6:56 PM

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Bibek Debroy : प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष बिबेक देबराॅय का परिवार बांग्लादेश से पलायन कर भारत आया था. अपनी प्रतिभा के दम पर उन्होंने देश के प्रतिष्ठित संस्थानों में काम किया. हालांकि नए संविधान की मांग करके वे विवादों में आ गए थे. लेकिन रेलवे की स्थिति सुधारने के लिए उन्होंने प्राइवेटाइजेशन की सिफारिश की थी, जिसे काफी हद तक लागू भी किया गया. पढ़िए उनके जीवन से जुड़ी खास बातें.

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Bibek Debroy : प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार और देश के प्रसिद्ध अर्थशास्त्री बिबेक देबराॅय का एक नवंबर 2024 को निधन हो गया है. वे 69 वर्ष के थे और साल 2017 से प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष थे. बिबेक देबराॅय ने देश के नीति निर्माण में अहम भूमिका निभाई है, उनके निधन पर प्रधानमंत्री ने दुख जताया है और सोशल मीडिया पर पोस्ट लिखा है कि डॉ बिबेक देबरॉय महान विद्वान थे. अर्थशास्त्र के साथ ही वे इतिहास, संस्कृति, राजनीति और अध्यात्म के भी ज्ञाता थे. उन्होंने प्राचीन ग्रंथों पर भी काफी काम किया था. डाॅ बिबेक देबराॅय को एक ओर जहां उनके कार्यों के लिए याद किया जाएगा, वहीं उनके विचार भी खासा चर्चा में रहे.

बिबेक देबराॅय ने की थी नए संविधान की मांग

बिबेक देबराॅय ने 2023 में एक आलेख लिखा था जो एक प्रतिष्ठित अखबार में प्रकाशित हुआ था. इस आलेख में बिबेक देबराॅय ने यह लिखा था कि हमें नए संविधान की जरूरत है, क्योंकि हमारा संविधान बहुत पुराना हो चुका है और इसकी ज्यादातर बातें औपनिवेशिक काल से जुड़ी हैं जो अब प्रासंगिक नहीं रही. उन्होंने अपने आलेख में यह लिखा था कि हमारा संविधान 1935 के भारत सरकार अधिनियम पर आधारित है. यही वजह है कि यह हमारे लिए औपनिवेशिक विरासत की तरह है. उनका यह मानना था कि किसी भी लिखित संविधान की अवधि 17 साल की होती है और उसके बाद वह प्रासंगिक नहीं रह जाता है. देबराॅय के इस आलेख पर विवाद हुआ था क्योंकि इसे एक तरह से सरकार का बयान माना जा रहा था, लेकिन आलेख के प्रकाशित होते ही सरकार ने उनके इस आलेख से खुद को अलग कर लिया था और बिबेक देबराॅय ने भी सामने आकर यह कहा था कि यह उनकी राय है, इससे सरकार का कोई संबंध नहीं है.

बिबेक देबराॅय ने रेलवे के निजीकरण की वकालत की

बिबेक देबराॅय का यह मानना था कि भारतीय रेल की स्थिति में तब तक सुधार संभव नहीं है जब तक इसमें ढांचागत परिवर्तन ना किया जाए. यही वजह है कि जब उनकी अध्यक्षता में गठित समित ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंपी तो उसमें निजीकरण की बातों को प्रमुखता से स्थान दिया गया. बिबेक देबराॅय का यह मानना था कि रेलवे का पूरी तरह से निजीकरण करना संभव नहीं है, लेकिन कुछ हद तक किया जा सकता है, ताकि सेवाएं सुधरें. खासकर खान-पान, साफ-सफाई और तकनीक के क्षेत्र में उन्होंने निजीकरण की सिफारिश की थी और उन्हें लागू भी किया गया.

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भारतीय सभ्यता और संस्कृति से था खास जुड़ाव

पीएम मोदी के साथ बिबेक देबराॅय

बिबेक देबराॅय की भारतीय सभ्यता और संस्कृति में खास रुचि थी, यही वजह है कि एक अर्थशास्त्री होने के बाद भी उन्होंने महाभारत, रामायण, भागवत पुराण, मार्कंडेय पुराण और शिव पुराण जैसे ग्रंथों का अंग्रेजी में अनुवाद किया, ताकि इन ग्रंथों को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके. बिबेक देबराॅय ने महाभारत के संपूर्ण खंडों का अनुवाद किया है और यह काम करने वाले वे पहले व्यक्ति भी हैं. उनसे पहले किसारी मोहन गांगुली ने महाभारत का अंग्रेजी में अनुवाद 1883 में किया था.  बिबेक देबराॅय ने 10 खंडों की श्रृंखला बनाकर मन्मथ नाथ दत्त की सहायता से महाभारत का अंग्रेजी में अनुवाद किया था. वे संसद टीवी पर प्रसारित होने एक कार्यक्रम इतिहास की एकरिंग भी की थी, जो भारतीय संस्कृति पर आधारित थे. इस कार्यक्रम में भारत और भारतीय की विशिष्टता बताई जाती थी. सनातन धर्म में उनकी खास रुचि थी.

झारखंड के विकास के लिए भी बनाया खाका

बिबेक देबराॅय देश में कई सम्मानित पदों पर भी रहे. वे झारखंड के मुख्यमंत्री द्वारा गठित उस समिति के अध्यक्ष थी रहे थे जो राज्य के लिए विकास योजनाओं की सिफारिश करती थी. वे नीति आयोग के अध्यक्ष भी रहे थे. वे राजीव गांधी समकालीन अध्ययन संस्थान के निदेशक भी रहे थे. उन्हें 2015 में पद्मश्री से सम्मानित भी किया गया था.

प्रेसीडेंसी कॉलेज के छात्र थे बिबेक देबराॅय

बिबेक देबराॅय कोलकाता के प्रेसीडेंसी काॅलेज के छात्र थे. उन्होंने स्कूली शिक्षा नरेंद्रदपुर के रामकृष्ण मिशन विद्यालय से प्राप्त की थी. प्रेसीडेंसी काॅलेज के बाद उन्होंने दिल्ली के स्कूल ऑफ इकोनाॅमिक्स में पढ़ाई की थी. बाद में वे कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय भी गए. बिबेक देबराॅय का परिवार बांग्लादेश से पलायन करके मेघालय आया था. उनका जन्म शिलांग, मेघालय में 1955 में हुआ था. 

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लेखक के बारे में

By Rajneesh Anand

रजनीश आनंद प्रभात खबर में सीनियर चीफ कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है.पत्रकारिता के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव रखती हैं. झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली रजनीश ने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा प्राप्त की और वर्ष 2000-01 में पत्रकारिता की शुरुआत की. इन्होंने पहली नौकरी झारखंड जागरण दैनिक अखबार में की. उसके बाद इन्होंने प्रभात खबर, हिंदुस्तान, रांची एक्सप्रेस तथा दैनिक जागरण सहित कई प्रमुख समाचार संस्थानों के लिए रिपोर्टिंग और लेखन किया. प्रिंट मीडिया के दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और सांध्य संस्करणों में काम करने के बाद वे वर्ष 2012 से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. रजनीश आनंद की पहचान तथ्यपरक रिपोर्टिंग, गहन शोध और विश्लेषणात्मक लेखन के लिए है. उनकी रुचि राजनीति, सामाजिक सरोकारों, ग्रामीण विकास, महिला मुद्दों, इतिहास, खेल, जनजातीय समाज और सार्वजनिक नीतियों से जुड़े विषयों में रही है। उन्होंने हमेशा उन मुद्दों को प्राथमिकता दी है जो समाज के हाशिये पर खड़े लोगों के जीवन को प्रभावित करते हैं, लेकिन मुख्यधारा की चर्चा में अपेक्षाकृत कम स्थान पाते हैं. वे कई प्रतिष्ठित पत्रकारिता फेलोशिप से जुड़ी रही हैं. इन्क्लूसिव मीडिया–यूएनडीपी फेलोशिप के तहत उन्होंने झारखंड के पश्चिमी सिंहभूम (चाईबासा) जिले में माहवारी स्वच्छता और किशोरियों एवं महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर विस्तृत अध्ययन और रिपोर्टिंग की. झारखंड सरकार मीडिया फेलोशिप के दौरान उन्होंने महिला सशक्तिकरण, सरकारी योजनाओं के प्रभाव और सामाजिक बदलाव के विभिन्न आयामों पर कार्य किया. इसके अतिरिक्त सेव द चिल्ड्रन फेलोशिप के तहत उन्होंने बच्चों के अधिकार, शिक्षा, सुरक्षा और बाल कल्याण से जुड़े मुद्दों पर गहन रिपोर्टिंग की. आदिवासी समाज, विशेषकर मुंडा जनजाति के इतिहास, संस्कृति और समकालीन चुनौतियों पर उनका काम उल्लेखनीय माना जाता है. उन्होंने भूमि, पहचान, परंपरा, सामाजिक बदलाव और आदिवासी समुदायों के अधिकारों से जुड़े विषयों पर व्यापक फील्ड रिपोर्टिंग की है. हाल के वर्षों में उन्होंने झारखंड में ऊर्जा संक्रमण (Energy Transition) और जस्ट ट्रांजिशन की अवधारणा पर भी काम किया है. विशेष रूप से कोयला आधारित अर्थव्यवस्था वाले क्षेत्रों में भविष्य की चुनौतियों, रोजगार, आजीविका और सामाजिक प्रभावों पर उनकी रिपोर्टिंग ने महत्वपूर्ण प्रश्न उठाए हैं. उनका मानना है कि ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया तभी सफल होगी जब उसमें प्रभावित समुदायों की भागीदारी और हितों को केंद्र में रखा जाए.पत्रकारिता उनके लिए केवल एक पेशा नहीं, बल्कि समाज के प्रति जिम्मेदारी निभाने का माध्यम है. जमीनी रिपोर्टिंग, तथ्यों की पड़ताल और जनसरोकारों को केंद्र में रखकर लिखना उनकी कार्यशैली की विशेषता रही है. इसके अतिरिक्त रजनीश आनंद कहानियां और कविताएं लिखने का शौक भी रखती है.

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