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Prabhat Khabar EXCLUSIVE : चावल भंडारण के मामले में आत्मनिर्भर होगा बिहार, एफसीआइ से चावल नहीं लेगी सरकार, राशन दुकानों में मिलेगा अब बिहार का चावल

Updated at : 31 Dec 2020 7:51 AM (IST)
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Prabhat Khabar EXCLUSIVE : चावल भंडारण के मामले में आत्मनिर्भर होगा बिहार, एफसीआइ से चावल नहीं लेगी सरकार, राशन दुकानों में मिलेगा अब बिहार का चावल

राज्य सरकार जन वितरण प्रणाली प्रणाली के जरिये अपने 8. 71 करोड़ उपभोक्ताओं के चावल की जरूरत की पूर्ति समर्थन मूल्य से खरीदे धान से करना चाहती है. इसके लिए उसने एक ब्लू प्रिंट तैयार किया है.

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राजदेव पांडेय, पटना. राज्य सरकार जन वितरण प्रणाली प्रणाली के जरिये अपने 8. 71 करोड़ उपभोक्ताओं के चावल की जरूरत की पूर्ति समर्थन मूल्य से खरीदे धान से करना चाहती है. इसके लिए उसने एक ब्लू प्रिंट तैयार किया है.

अगर धान खरीद के लक्ष्य के मुताबिक बिहार ने धान खरीद कर ली, तो वह इस साल से जन वितरण प्रणाली की जरूरत का चावल फूड कॉरपारेशन ऑफ इंडिया से नहीं लेगा.

इससे दो फायदे होंगे, एक तो अपने टेस्ट का चावल हम खा सकेंगे. दूसरे हम लाखों किसान को न्यूनतम समर्थन मूल्य दे सकेंगे.

एक आकलन के मुताबिक किसानों की प्रति व्यक्ति आय में भी 30-40 फीसदी तक अच्छा- खासा इजाफा हो सकता है. वर्तमान में बिहार के प्रति किसान की मासिक आय तीन हजार रुपये के आसपास है.

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक जन वितरण प्रणाली के जरिये राशन बांटने के लिए 92 लाख टन गेहूं और चावल की जरूरत होती है.

प्रदेश में 8. 71 करोड़ उपभोक्ताओं को साल में 36 लाख टन चावल की जरूरत होती है. इसकी पूर्ति के लिए बिहार दशकों से चावल के लिए पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ पर निर्भर करता है.

पिछले खरीफ सीजन में बिहार ने पूरी ताकत लगाकर अपनी खरीद से मिले 13.41 लाख टन चावल को जन वितरण प्रणाली के जरिये बांटा है . हालांकि, यह उसकी कुल जरूरत का 30 से 35 फीसदी के आसपास ही है.

फिलहाल इस साल 45 लाख टन धान खरीद से करीब 30 लाख टन चावल मिल सकेगा. केवल नाममात्र के लिए खरीद की जरूरत पड़ेगी.

अपनी संस्थाओं की तरफ से हासिल गेहूं की 56 लाख टन की जरूरत के लिए, तो वह पूरी तरह दूसरे राज्यों पर ही निर्भर है.

हालांकि, पिछले चार दशकों के इतिहास में जन वितरण प्रणाली के लिए राशन की उपलब्धता के लिहाजा से बिहार दूसरे राज्यों पर ही निर्भर रहा है. लिहाजा खाद्य विभाग ने कठिन टास्क अपने हाथ में लिया है.

विशेष तथ्य

  • प्रदेश में समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीद न के बराबर रही है. वर्ष 2010-11, 2011-12, 2012-13 रबी सीजन में गेहूं की खरीद 1.52,5.02 और 5.41 लाख टन हुई. इसके बाद 2013-14 से अब तक समर्थन मूल्य पर गेहूं की खरीद शून्य या न के बराबर ही रही है.

  • प्रदेश में प्रतिमाह 4.60 लाख टन खाद्यान्न राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत बांटा जाता है. इसके अलावा अंत्योदय योजना एवं एमडीएम के तहत आपूर्ति होती है.

  • बिहार में समर्थन मूल्य पर खरीद 1996 से हो रही है

  • 2013-14 से डी सेंट्रलाइज सिस्टम के जरिये राज्य सरकार खरीद करवा रही है.

  • उससे पहले एफसीआइ और केंद्रीय एजेंसियां खरीद करती थीं.

  • समर्थन मूल्य की खरीद का पूरा पैसा केंद्र देता है.

Posted by Ashish Jha

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यह प्रभात खबर का न्यूज डेस्क है। इसमें बिहार-झारखंड-ओडिशा-दिल्‍ली समेत प्रभात खबर के विशाल ग्राउंड नेटवर्क के रिपोर्ट्स के जरिए भेजी खबरों का प्रकाशन होता है।

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