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बरकरार रहे मधुमक्खियों की गूंज

By तोमियो शिचिरी
Updated Date

तोमियो शिचिरी

भारत प्रतिनिधि, खाद्य एवं कृषि संगठन (संयुक्त राष्ट्र)

delhi@prabhatkhabar.in

विश्व मधुमक्खी दिवस

पश्चिमी देशों में शहद वाली मधुमक्खियों की चर्चा हो रही है. इस बार यह बीमारी के संदर्भ में नहीं, बल्कि अन्य प्रजाति के हमले की वजह से है. दुनिया के सबसे बड़े बर्रे एशियाई विशालकाय हाड़े (वेस्पा मैनदारिनिया), जो शायद एशियाई देशों के निचले पर्वतीय इलाकों और जंगलों में पाये जाते हैं, वे व्यावसायिक तौर पर महत्वपूर्ण शहद मधुमक्खियों एपिस मेलिफेरा पर जानलेवा हमला कर रहे हैं. एपिस मेलिफेरा यूरोपीय शहद मधुमक्खी की प्रजाति है, जिसे अमेरिका में काफी समय से एकल रूप से वाणिज्यिक परागणकारी के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा है. इसके पास हाड़े से बचाव के लिए कोई रक्षात्मक उपाय नहीं है. जबकि एशियाई मधुमक्खियां, जो हाड़े के साथ ही विकसित होती हैं, वे अपना बचाव तंत्र विकसित कर लेती हैं. यानी इसका विकास हमारी जैव विविधता को समृद्ध अधिक लचीला बनाता है.

इस घटना ने मधुमक्खी पालन में आमतौर पर उपेक्षित पहलू पर ध्यान आकर्षित किया है. देसी मधुमक्खी प्रजातियों की विविधता और हमारे खाद्य उत्पादन एवं स्वस्थ वातावरण में उनकी विशेष भूमिका होती है. मधुमक्खियां पारिस्थितिकीय तंत्र की बेहतरी का संकेत हैं. दुनिया का एक तिहाई फसल उत्पादन परागण पर निर्भर होता है. मधुमक्खियां दुनियाभर में 87 प्रमुख खाद्य फसलों के उत्पादन में बढ़ोतरी में सीधे तौर पर सहायक होती हैं. एपिस मेलिफेरा देसी मधुमक्खियों की प्रजातियों की तुलना में चार से पांच गुना ज्यादा शहद का उत्पादन करती है. देसी मधुमक्खी करीब दो से तीन किलोग्राम शहद का उत्पादन करती हैं, तो एपिस मेलिफेरा 10 से 12 किलो तक उत्पादन कर सकती है. लेकिन, वे एकल पारितंत्र में ही जिंदा रह सकती हैं, जो औद्योगिक खाद्य उत्पादन तंत्र में ही फिट बैठता है. इसके विपरीत, देसी मधुमक्खी बहु-पुष्प और परागण में मददगार होती हैं.

खाद्य एवं कृषि संगठन(एफएओ) के मुताबिक, दुनियाभर में 20,000 से अधिक मधुमक्खियों की प्रजाति पायी जाती है, जिसमें करीब 200 प्रजातियां सामाजिक हैं, जैसेकि वे कॉलोनी में रहती हैं और केवल 12 ही शहद मधुमक्खी होती हैं. हालांकि, भारत में अभी तक 700 से अधिक प्रजातियों की पहचान की गयी है. इसमें 300 स्थानिक हैं, यानी कि वे केवल एक ही देश में पायी जाती हैं. इसमें से मात्र छह प्रजातियां ही शहद वाली हैं. इसमें विदेशी प्रजाति एपिस मेलिफेरा भी शामिल है. भारत में मधुमक्खियों की प्रजाति में विविधता होने के बावजूद, वाणिज्यिक शहद उत्पादन में विदेशी मधुमक्खी एपिस मेलिफेरा की भूमिका अधिक है. विदेशी मधुमक्खी की अधिकता के कारण देसी प्रजातियां संकटग्रस्त हैं. देसी प्रजातियों को एपिस मेलिफेरा के साथ मकरंद और पराग के मामले में अधिक प्रतिस्पर्धा करने की जरूरत है. इससे उनकी संख्या की गतिशीलता प्रभावित होती है. एपिस मेलिफेरा का औद्योगिक शैली में प्रबंधन किया जाता है, जिसमें मकरंद और पराग की खोज में उनके बड़े छत्तों को ट्रक परिवहन द्वारा एक स्थान से दूसरे स्थान पर लाया जाता है. इससे देसी प्रजातियां बीमारी की चपेट में आ जाती हैं, क्योंकि वे ज्यादा यात्रा नहीं कर सकती हैं.

बीमारी, कीटनाशकों के दुष्प्रभाव और जलवायु परिवर्तन की वजह से अमेरिका में 2018-19 की अवधि में मधुमक्खियों के छत्तों में से 40 प्रतिशत नष्ट हो गये. बिहार जैसे राज्यों में जहां कृषि महत्वपूर्ण ग्रामीण गतिविधि है, वहां भी 2020 में शहद उत्पादन में 40 प्रतिशत की कमी देखी जा रही है.भारत में स्थानीय स्तर पर एपिस सेरेना इंडिका, एपिस फ्लोरिया, एपिस दोरसता (चट्टान मधुमक्खी), तेत्रागोनुला इरिदिपेन्निस (कंटकरहित शहद मधुमक्खी) और एपिस लेबोरिओसा (हिमालयीय चट्टान मधुमक्खी) पायी जाती है. ये प्रजातियां स्थानीय जैव-विविधता के साथ सामंजस्य बिठा लेती हैं. चट्टान मधुमक्खी को भारत का सर्वोत्तम परागणकारी माना जाता है. मधुमक्खियों के व्यवहारों पर अध्ययन करनेवाले राष्ट्रीय जैविक विज्ञान केंद्र, बेंगलुरु के वैज्ञानिक मानते हैं कि एपिस मेलिफेरा भारत के संदर्भ में परागण में कोई खास भूमिका नहीं निभाती है. इसका प्रमुख कारण है कि पूरे देश में फसलों की विविधता अधिक है. खाद्य एवं कृषि संगठन(एफएओ) ने 2012 की रिपोर्ट में कहा है कि जिन क्षेत्रों में मधुमक्खियों की प्रजाति में विविधता होती है, वहां शहद मधुमक्खियों की बीमारी कम होती है.

यह क्षेत्र विशेषकर विकासशील देशों में हैं, जहां अपेक्षाकृत अभी भी कीटनाशकों का इस्तेमाल कम होता है. ज्यादातर हमारी मधुमक्खियां जंगली परागणकारी होती हैं, जो वनीय पारिस्थितिकीय तंत्र के पुनर्जनन में मदद करती हैं. पुणे स्थित केंद्रीय मधुमक्खी अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान के वैज्ञानिकों के निष्कर्ष के मुताबिक, जंगलों से बड़े पैमाने पर जंगली मधुमक्खियां लुप्त हो रही हैं. इसके पीछे वैश्विक जलवायु परिवर्तन, जंगली आग, वन क्षरण और निवासों स्थानों को नुकसान पहुंचाने जैसे प्रमुख कारण हैं. भारत में नीतिगत पहल की जरूरत है, जिससे कि देसी मधुमक्खियों की विविधता को बरकरार रखा जा सके. विविधता के संरक्षण से 86 प्रतिशत छोटे और मझोले किसानों को फसल उत्पादन बढ़ाने में मदद मिलेगी.

ये किसान अपनी आजीविका के लिए जमीन के छोटे हिस्से में जैव विविधता आधारित कृषि करते हैं. शहद मधुमक्खियों समेत अन्य प्रजातियों के संरक्षण के लिए देश के विभिन्न कृषि पारिस्थितिकीय क्षेत्र में मधुमक्खी पालन केंद्रों की आवश्यकता है. मधुमक्खियों और अन्य परागणकारियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2018 में 20 मई को विश्व मधुमक्खी दिवस के रूप में घोषित किया था. इस तिथि को आधुनिक विधा से मधुमक्खी पालन के अग्रणी रहे एंटोन जेनसा का स्लोनेवेनिया में जन्म हुआ था. शहरी भारत में ऊंची इमारतें चट्टान मधुमक्खियों के लिए वरदान की तरह हैं. ये पर्वत की ऊंची चोटियों की तरह हो सकती हैं, जहां मधुमक्खियां घोंसला बना सकती हैं. लेकिन, निवासियों के डर और अज्ञानता के कारण एवं कीट नियंत्रण उपायों की वजह से मधुमक्खियां इन स्थानों का इस्तेमाल नहीं कर पाती हैं. आगे से ध्यान रखिए, जब आपके आसपास मधुमक्खी छत्ता बनाती है, तो इसे स्वस्थ पर्यावरण के संकेत के तौर पर देखें. उन्हें मारने से बचें और यथासंभव व्यवस्थित रखें.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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