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उन्नाव और अरावली

Updated at : 31 Dec 2025 6:40 AM (IST)
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Supreme Court

उन्नाव और अरावली

Supreme Court: Supreme Court: बलात्कार के दोषी कुलदीप सेंगर की जमानत रद्द करने और अरावली से संबंधित अपना पिछला आदेश पलटने वाले सुप्रीम कोर्ट के फैसले न सिर्फ जनभावनाओं के अनुरूप हैं, बल्कि इनसे न्याय और कानून के राज का संदेश भी स्पष्ट होता है.

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Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को दो ऐसे फैसले दिये, जो जनभावनाओं के अनुरूप हैं, और इसीलिए स्वागतयोग्य हैं. एक फैसले में शीर्ष अदालत ने नाबालिग लड़की से बलात्कार के दोषी और उम्रकैद की सजा काट रहे कुलदीप सेंगर को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दी गयी जमानत पर रोक लगा दी. दूसरे मामले में उसने 20 नवंबर के अपने ही फैसले में दिये गये निर्देशों को स्थगित कर दिया, जिसमें पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की एक समिति द्वारा अनुशंसित अरावली पहाड़ियों और पर्वत शृंखलाओं की एक समान परिभाषाओं को स्वीकार किया गया था.

सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली से संबंधित 20 नवंबर के फैसले के विरोध में न सिर्फ पर्यावरणविद और पर्यावरण कार्यकर्ता, बल्कि आम लोग भी सड़कों पर उतर गये थे, क्योंकि उनको लगता था कि इससे देश की जीवनरेखा समझी जाने वाली अरावली पर्वतमाला में खनन को प्रोत्साहन मिलेगा. यह फैसला ऐसे समय में आया है, जब आम नागरिकों, पर्यावरण कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों का विरोध तेज ही हो रहा था और यह मानने का कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने उन विरोध प्रदर्शनों का संज्ञान लिया. उन्नाव बलात्कार मामले के दोषी कुलदीप सेंगर को दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा दी गयी जमानत को पलट कर भी सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सार्थक संदेश दिया है कि बलात्कारियों की जगह जेल में है.

पिछले दिनों दिल्ली उच्च न्यायालय से सेंगर को जब जमानत मिली, तो उसके विरोध में पीड़िता अपनी मां के साथ इंडिया गेट पर धरने पर बैठ गयी थी. जंतर-मंतर पर बड़ा विरोध प्रदर्शन हुआ था, जहां महिला अधिकार कार्यकर्ताओं, वामपंथी छात्र संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पीड़िता के लिए न्याय की मांग की थी. दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले की जो आलोचना हो रही थी, उसकी झलक सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान भी दिखी.

दरअसल लोकसेवक की परिभाषा के संदर्भ में सीबीआइ की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह कहा कि यदि कोई व्यक्ति पीड़ित की तुलना में प्रभुत्वशाली स्थिति में है, जैसे कि कांस्टेबल या सेनाधिकारी, तो ऐसा कृत्य गंभीर माना जायेगा. इस पर प्रधान न्यायाधीश ने बेहद महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया कि यह अजीब स्थिति होगी, जब पॉस्को के तहत एक कांस्टेबल को तो लोक सेवक माना जायेगा, लेकिन एक विधायक को नहीं. सुप्रीम कोर्ट के ये दोनों फैसले न सिर्फ जनभावनाओं के अनुरूप हैं, बल्कि इनसे न्याय और कानून के राज का संदेश भी स्पष्ट होता है.

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