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तब का प्लेग, आज का कोरोना

By संपादकीय
Updated Date

अरविंद मोहन, वरिष्ठ पत्रकार

arvindmohan2000@yahoo.com

यह कबूल करने में हर्ज नहीं है कि पत्रकार नगेंद्रनाथ गुप्त का नाम इस लेखक ने नहीं सुना था. िबहार के मोतिहारी में जन्मे तथा आरा, छपरा, भागलपुर और पटना में पले बढ़े स्वर्गीय नगेंद्रनाथ गुप्त उस दौर के पत्रकार थे, जब आजादी की पहली जंग खत्म हुई थी और नयी जंग की तैयारी हो रही थी. उन्होंने छह साल लगाकर विद्यापति की कविताओं का पहला संग्रह किया. उनका सबसे ज्यादा समय ‘ट्रिब्यून’ में बीता, जो तब लाहौर से प्रकाशित होता था और उनके आने के पहले सप्ताह में दो दिन ही निकलता था. स्वामी विवेकानंद के सहपाठी नगेंद्रनाथ ने रामकृष्ण परमहंस की समाधि का पहला ब्यौरा भी लिखा था, जो मॉडर्न रिव्यू में छपा.

कोरोना काल के अध्ययन में उनकी किताब ‘रिफ्लेक्शंस ऐंड रिमीनिसेंशेज’ पढ़ते समय करीब सवा सौ साल पहले आये प्लेग पर उनका विवरण दिखा. आश्चर्यजनक ढंग से चीजें कोरोना से मेल खाती दिखीं, इसलिए उसका संपादित व अनुदित अंश देने का लोभ हुआ. पाठक भी अपने अनुभव से तुलना करके देखें.

‘भारत में 1895 में आये प्लेग के समय प्रशासनिक नालायकी और अधिकारियों की भारी भूलों से हालत एकदम खराब हो गयी. प्लेग सबसे पहले बंबई में दिखा और यह निष्कर्ष निकाला गया कि यह चीन से आया है. इसके बाद यह कराची पहुंचा और फिर देहात मेँ फैल गया. ब्लैक या ब्यूबोनिक प्लेग के डरावने इतिहास को देखते हुए यह बात जरा भी अटपटी नहीं लगती कि लोग और अधिकारी प्लेग के नाम से बुरी तरह डर गये थे. लेकिन इस महामारी को थामने के नाम पर जो कदम उठाये गये, उसका कोई बचाव नहीं किया जा सकता था. इनसे बीमारी रोकने में तो मदद नहीं मिली, लेकिन लोगों की परेशानियां काफी बढ़ गयीं और उनमें नाराजगी भी फैली.

‘नगरपालिकाओं के स्वास्थ्य विभाग का जिम्मा अंगरेज फौजियों को सौंप दिया गया, जो काम से ज्यादा परेशानी कर रहे थे. उनके बूट पहनकर पूजा के कमरे में घुसने से लोग खासे नाराज थे. एंग्लो इंडियन प्रेस गुणगान किये जा रहा था कि अब तो फौज ने मोर्चा संभाल लिया है और प्लेग बच नहीं सकता, मानो प्लेग से लड़ने में गोलाबारी करनी हो. पुणे में दो सैनिकों की हत्या कर दी गयी. लोगों के लिए प्लेग से भी ज्यादा मुश्किल प्लेग से जुड़े कायदे-कानून से होने लगी. कलकत्ता में अफवाह फैली कि और कड़ाई होने जा रही है, तो काफी लोग शहर छोड़कर भागने लगे.

‘भारत के विभिन्न स्टेशनों पर क्वारंटाइन सेंटर बनाये गये थे. रेलगाडियों को क्वारंटाइन कैंप के पास ही लाया जाता था और फिर सबको उसमें जाने को कहा जाता था. एक डाॅक्टर जल्दी-जल्दी सबकी जांच करता था. अगर नब्ज या तापमान में जरा भी गड़बड़ मिली, तो सीधे आइसोलेशन वार्ड में भेज दिया जाता था. बुखार का हर मामला प्लेग से जुड़ा हो, यह जरूरी न था, लेकिन यह काम सावधानी के नाम पर किया जा रहा था.

कैंप भी कामचलाऊ ढंग के थे और उनमें सुविधाओं का घोर अकाल था और सर्दी का समय होने से इस बात का खतरा था कि कोई ज्यादा समय रह गया, तो प्लेग हो न हो, निमोनिया या प्लुरेसी जैसी बीमारियां जरूर जकड़ लेंगी. और ये कदम चाहे जितने दमनकारी, निष्प्रभावी और हैरान करने वाले हों, उनको लंबा चलाया गया. और उसके पीछे जो राजनीतिक खेल हुए, उस पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.

‘पंजाब के होशियारपुर जिले के दूर-दराज के गांव गढ़शंकर में प्लेग फूटा. गांव को फौजी जवानों ने घेरा बनाकर अलग-थलग किया. खबर बाहर न जाये, इसकी भी कोशिश की गयी. हुआ यह कि गांव के लोग कुछ आयोजन करना चाहते थे, जिसके लिए उनको गांव से बाहर निकलने की जरूरत थी. सही स्थिति क्या थी, यह कभी पक्के तौर पर नहीं कही जा सकती क्योंकि कोई भी बात बाहर नहीं आयी.

लेकिन यह पक्का था कि गांव को घेरनेवाली फौज ने गोलियां भी चलायीं और लोग मारे गये. फायरिंग का आदेश देनेवाले मजिस्ट्रेट वहां मौजूद थे या नहीं या स्थितियां गोली चलानेवाली थीं, इस बारे में कभी कोई जांच नहीं हुई. कुछ समय बाद गांव के कुछ लोग फौज की नजरों से बचते हुए बाहर निकले और लाहौर में मेरे पास आये. बाद में फौजी सख्ती कम हुई और फौज वापस ले ली गयी.

‘मैंने खूब सावधानी से हर किसी से बात की, तथ्यों का मिलान किया, नोट्स बनाये और ‘ट्रिब्यून’ मेें एक लेखमाला लिखी और जांच का सुझाव दिया. उस समय सर मैकवर्थ यंग लेफ्टिनेंट गवर्नर थे और जहां तक मुझे मालूम है, उन्होंने इस बारे में कोई कदम नहीं उठाया. ना कोई आधिकारिक बयान आया, न इस हादसे का कोई सरकारी ब्यौरा दिया गया.

मैंने अखबार के वे अंक सर विलियम वेड्डरबर्न को भेजे, जिनमें इस शृंखला के लेख थे. वे तब सांसद थे. उन्होंने मुझे पत्र लिखा कि वे इस सवाल को सदन में उठाने की जगह गृह मंत्री के पास पत्र लिखकर उठायेंगे, जिन्होंने पूरी जांच का वायदा किया है. पर कभी जांच की बात सुनायी नहीं दी. सर डेनिस फिट्जपैट्रिक अब लेफ्टिनेंट गवर्नर नहीं रहे और ‘ट्रिब्यून’ की आवाज नक्करखाने की तूती बनकर रह गयी थी.’

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