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लोकतांत्रिक बहस के पक्षधर थे अग्निवेश

Updated at : 14 Sep 2020 11:36 AM (IST)
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लोकतांत्रिक बहस के पक्षधर थे अग्निवेश

स्वामीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बहस अवश्य होनी चाहिए. उन्होंने हमेशा आलोचकों को शास्त्रार्थ के किए ललकारा, मगर उन पर पीछे से ही वार हुए. स्वामी जी के संवैधानिक अधिकारों की हिफाजत नहीं हुई. पुलिस अमूमन तमाशा देखती नजर आती रही.

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बंधुआ मजदूरों की मुक्ति के सिपाही स्वामी अग्निवेश का शुक्रवार को देहावसान हो गया. उन्होंने जीवनभर मानव अधिकारों, सामाजिक न्याय के लिए और धार्मिक उन्माद के विरुद्ध संघर्ष किया. इसलिए वे धर्म के नाम पर राजनीति करने वालों की आंखों में खटकते रहे. बहुतों को उनके आर्य समाजी परिवेश, खास तौर पर भगवावस्त्रों पर आपत्ति थी.

वे हंस कर कहते थे, ये गेरू का नहीं, अग्नि का रंग है. बहरहाल, उनके मित्रों, समर्थकों और चाहने वालों की संख्या दुश्मनों से कई गुना ज्यादा रही. वे विवादों में भी रहे, मगर उनकी आस्था हिंदू धर्म की विविधता का जीवंत उदाहरण है. दो साल पहले झारखंड के पाकुड़ में भीड़ ने हमला किया था.

स्वामीजी पहाड़िया आदिवासी जनजाति समुदाय की एक रैली को संबोधित करने गये थे. स्वामीजी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बहस अवश्य होनी चाहिए. उन्होंने हमेशा आलोचकों को शास्त्रार्थ के किए ललकारा, मगर उनपर पीछे से ही वार हुए. भीड़ ने अफवाह फैलायी कि वे ईसाई धर्म के समर्थक हैं.

शायद इसलिए कि स्वामीजी के मित्रों में कई जाने-माने ईसाई, मुस्लिम, जैन, पारसी आदि धर्मगुरु भी थे. यही वजह थी कि ओड़िशा के मयूरभंज में जब 2003 में कुष्टरोग निवारण केंद्र के संचालक ऑस्ट्रेलियन क्रिस्टियन मिशनरी ग्राहम स्टेंस और उनके दो छोटे बच्चों को भीड़ ने जिंदा जला दिया था, तो स्वामीजी ने वहां सर्वधर्म सभा की थी.

इस विरोध सभा की विराट सफलता बहुतों को आज भी खटकती है. एक तरह से भीड तभी से स्वामी अग्निवेश का पीछा कर रही थी. हमले के बाद भी कभी उन्हे वाइ या जेड सिक्युरिटी के लायक नहीं समझा गया. संविधान साफ तौर पर कहता है कि सत्ता में कोई भी हो, पुलिस भीड़ के साथ भेदभाव नहीं कर सकती.

हमला करना, यातना देना या हत्या कानूनन अपराध है. भीड़ चाहे गाय के नाम पर जमा हुई हो या धर्म परिवर्तन के नाम पर, संविधान किसी को भी कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं देता, मगर स्वामी जी के संवैधानिक अधिकारों की हिफाजत नहीं हुई. पुलिस अमूमन तमाशा देखती नजर आती रही.

बुल्गेरियन मूल के जर्मन साहित्यकार इलिआस केनेती ने एक बेहतरीन पुस्तक क्राउड़स एंड पॉवर लिखी है. उन्हें 1981 में नोबेल पुरस्कार मिला. उन्होंने भीड़ की राजनीतिक सत्ता से सांठ-गांठ पर कहा है कि भीड़ की ताकत नदी की बाढ़ और जंगल की आग की तरह फैलती है और अंततः सत्ता के तथाकथित दुश्मनों के साथ-साथ सत्ता को भी लील जाती है.

भीड़ का कोई चेहरा नहीं है. भीड़ एक साथ सब कोई है और साथ ही सब गुमनाम हैं. इसका एक नमूना देश 1984 , 2002 और उसके बाद के दंगों में देख चुका है. दिल्ली के हाल ही के दंगों में भीड़ और उसके संयोजकों ने निर्णय किया कि जिन्होंने भड़काऊ भाषण दिये वे निर्दोष हैं और जिन्होंने शांतिपूर्ण आन्दोलों में भाग लिया, वे दोषी हैं. भीड़ घर और बस्तियां जला चुकी है.

बाकी काम अब पुलिस कर रही है. चार्ज शीट, छापे, गहन पूछताछ. हर दिन आरोपियों में नये-नये बुद्धिजीवी, अर्थशास्त्री और डाक्यूमेंट्री फिल्म बनानेवाले शामिल हो रहे हैं. जो भक्त नहीं हैं, वे देशद्रोही हैं. भीड़ का शासन है और भीड़ का लोकतंत्र है, मगर पुलिस व शासन कहां है? कहां है लोकतंत्र की आत्मा, और विधि का विधान? कॉमन कौस तथा सीएसडीएस ने एक देशव्यापी सर्वे में पाया कि 37% पुलिसकर्मियों का मानना है कि मामूली जुर्म में कोर्ट कचहरी जाने की बजाए पुलिस द्वारा थाने में ही सजा दे दी जानी चाहिए.

लगभग 100 में बीस पुलिसकर्मियों का मानना है कि ‘संगीन जुर्म’ में तो मुजरिमों को मार ही देना ठीक है, यानि कोर्ट कचहरी का झंझट ही समाप्त. 83 प्रतिशत यानि 5 में से 4 कहते हैं कि अभयुक्तों को मारना, पीटना और यातना देना जायज है. 35% मानते हैं कि गऊ वध के संदिग्ध लोगों को भीड़ द्वारा पीट-पीट कर मार डालना एक स्वाभाविक-सी बात है. अन्य 40% कहते हैं कि अपहरण, बलात्कार, और सड़क दुर्घटनाओं में भीड़ द्वारा मार डालना भी स्वाभाविक है.

तफतीश की जरूरत ही नहीं, शक की बुनियाद ही काफी है. भीड़ मौके पर तय करेगी आपकी संलिप्तता. यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो स्वामी अग्निवेश पर हमला भी स्वाभाविक ही लगता है. लगता है कि यह तो देर सबेर होना ही था.

पुलिस की मनोदृष्टि की एक झलक स्वामीजी की मृत्यु के तुरंत बाद जारी एक पूर्व आइपीएस अधिकारी के ट्वीट में परिलक्षित हैं. सीबीआइ में एक विवादास्पद समय में अचानक इंचार्ज बनाये गये इस अधिकारी ने अपने ट्वीट में स्वामी अग्निवेश की मृत्यु के बारे में कहा, अच्छा छुटकारा मिला, ये पहले ही होना चाहिए था, और उन्हे शर्म आती है कि उनका (स्वामीजी का) जन्म एक तेलुगु ब्राहमण के रूप में हुआ.

इस ट्वीट मे जातिवाद, संकीर्णतावाद और कई मनोवैज्ञानिक संकेत छिपे हैं. मेरे एक दोस्त, जो एक दक्षिणी राज्य में पुलिस महानिदेशक रह चुके है, का कहना है कि यह ट्वीट नहीं, एक जॉब एप्लीकेशन है कि उनके जैसे भक्त को रिटायरमेंट के बाद अब किसी अच्छे पद पर पुनर्वासित किया जाना चाहिए. हमें पता है कि उनका भविष्य उज्ज्वल है. भीड़ तुम आगे बढ़ो, वर्दी वाले तुम्हारे साथ हैं.

posted by : sameer oraon

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विपुल मुदगल

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By विपुल मुदगल

विपुल मुदगल is a contributor at Prabhat Khabar.

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