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मानवाधिकार के बहाने दखल

By Pritish Sahay
Updated Date

अवधेश कुमार, वरिष्ठ पत्रकार

awadheshkum@gmail.com

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद द्वारा नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में हस्तक्षेप याचिका दाखिल को स्वाभाविक ही हैरत से देखा जा रहा है. देश का एक वर्ग सीएए के खिलाफ है और विदेशों में भी इसे मुद्दा बनाने की कोशिश चल रही है. हाल में मानवाधिकार परिषद का तेवर भारत के अनुकूल नहीं रहा है, किंतु यह उम्मीद नहीं थी कि वह उच्चतम न्यायालय तक आ जायेगा.

यह असाधारण कदम है और यह यूं ही नहीं हो सकता. विदेशी मीडिया के माध्यम से यह खबर आ रही थी कि सीएए के विरुद्ध विश्वव्यापी वातावरण बनाने को लेकर दुनियाभर की मानवाधिकार संस्थाओं और संगठनों का दरवाजा खटखटाया जा रहा है. भारत की एक लॉबी की सक्रियता के कारण एमनेस्टी इंटरनेशनल से लेकर ग्रीन पीस जैसे संगठन सरकार का विरोध कर रहे हैं. परिषद का यहां तक आना इसका प्रमाण है कि मानवाधिकार लॉबी ने उसे तैयार करने में सफलता पायी है.

संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार उच्चायुक्त मिशेल बाशेलेट ने 27 फरवरी को जेनेवा में परिषद के 43वें सत्र के दौरान सीएए के बाद के हालात और दिल्ली हिंसा पर बयान देकर अपना रुख स्पष्ट कर दिया था. उनकी पंक्तियां देखें- 'सभी समुदायों के भारतीयों ने बड़ी संख्या में शांतिपूर्ण ढंग से कानून के प्रति विरोध दर्ज कराया है और सेक्युलरवाद की लंबी परंपरा को समर्थन दिया है... मैं कुछ गुटों द्वारा मुस्लिमों के खिलाफ हमले करने के मामलों में पुलिस की निष्क्रियता और शांतिपूर्ण ढंग से प्रदर्शन कर रहे प्रदर्शनकारियों पर पुलिस बल द्वारा अत्यधिक बल प्रयोग की रिपोर्टों से चिंतित हूं.' ये पंक्तियां कितनी एकपक्षीय हैं एवं कैसे मामले को गलत रंग देती हैं, यह बताने की जरूरत नहीं. वे जम्मू-कश्मीर के मसले पर भी अवांछित टिप्पणी कर चुकी हैं.

साफ है कि वे भारत-विरोधी मानवाधिकार लॉबी से प्रभावित होकर ही बयान दे रही थीं. निस्संदेह यह प्रश्न उठेगा कि क्या संयुक्त राष्ट्र के किसी निकाय को संसद द्वारा पारित कानून के खिलाफ उस देश की बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है? देश के अंदर सीएए के खिलाफ 160 से ज्यादा याचिकाएं लंबित हैं. न्यायालय को जो फैसला देना होगा, देगा. साफ है कि मानवाधिकार परिषद ने इसे अंतरराष्ट्रीय मामला बनाने के लक्ष्य से ऐसा किया है. भारत ने इसका कड़ा प्रतिवाद किया है. विदेश मंत्रालय ने कहा कि सीएए भारत का अंदरूनी मामला है और यह संसद के संप्रभुता के अधिकार से संबंधित है .

हर देशवासी को, भले वह सीएए का समर्थक हो या विरोधी, इस पर एकजुट होना चाहिए कि हमारे अंदरूनी मामले में किसी विदेशी संस्था को दखल देने का अधिकार नहीं है. भारतीय नागरिक को पूरा अधिकार है कि वह कानून को न्यायालय में चुनौती दे, लेकिन बाहरी संस्था का हस्तक्षेप आपत्तिजनक है. भले ही गहरे रूप से विभाजित राजनीति तथा वैचारिकता के आधार पर खेमेबंदी का शिकार बौद्धिक वर्ग ऐसा न करे, पर आम लोग तो विरोध कर ही सकते हैं. न्यायालय भी देखेगा कि इस वैश्विक संस्था को याचिका दायर करने का अधिकार है या नहीं.

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिसंबर में कहा था कि सीएए पर संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में जनमत संग्रह हो. इसे ठुकराते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा था कि यह संस्था इस मामले में सिर्फ राष्ट्रीय सरकार के अनुरोध पर ही जुड़ती है. हालांकि, बयान देते हुए गुटेरेस के प्रवक्ता स्टीफन डुजैरिक ने सीएए पर हो रहे प्रदर्शन और हिंसा पर चिंता जतायी थी. इसका एक मतलब हुआ कि संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की नजर इस मसले पर लगातार बनी हुई है. भारतीय कूटनीति भी लगातार सक्रिय है और जवाब भी दे रही है. उसके बाद से संयुक्त राष्ट्र का कोई बयान नहीं आया.

प्रश्न यह भी है कि क्या मानवाधिकार परिषद के कार्यक्षेत्र में यह आता है? इसकी स्थापना 15 मार्च, 2006 को महासभा द्वारा पारित प्रस्ताव के तहत हुई थी. संयुक्त राष्ट्र ने मानवाधिकार आयोग की स्थापना 1946-47 में आर्थिक एवं सामाजिक परिषद की एक कार्यात्मक समिति के रूप में की थी. परिषद की स्थापना के बाद आयोग को समाप्त कर दिया गया था. इसके 47 सदस्य हैं, जिनका चुनाव तीन वर्ष के लिए महासभा द्वारा होता है. यह किसी भी देश में मानवाधिकारों के उल्लंघन का विश्लेषण कर सकता है.

इसका कार्य सार्वभौमीकरण, निष्पक्षता, वस्तुनिष्ठता एवं सृजनात्मक अंतरराष्ट्रीय संवाद के सिद्धांतों के अंतर्गत निर्देशित होता है. यह समय-समय पर सभी एजेंसियों एवं निकायों को अपनी रिपोर्ट देता है, ताकि मानवाधिकार उल्लंघन को रोका जा सके. इसके कार्य एवं अधिकार में कहीं उल्लेख नहीं है कि किसी देश की संसद के खिलाफ वह उस देश के न्यायालय में जा सकता है. पहले भी इस परिषद के साथ भारत का आमना-सामना हो चुका है. जुलाई, 2018 में तो भारत ने कहा था कि परिषद की पुनर्रचना होनी चाहिए. भारत ने नया ढांचा बनाने के लिए अन्य देशों से संवाद भी शुरू किया था.

परिषद के तत्कालीन उच्चायुक्त जैद अल हुसैन के नेतृत्व में कश्मीर को लेकर एकपक्षीय रिपोर्ट जारी हुई थी, जिसमें पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की स्थिति को नजरअंदाज किया गया था. उच्चायुक्त ने नक्सलियों से संपर्क के कारण जेल में बंद एक प्रोफेसर तक की पैरवी कर भारत के प्रति अपने पूर्वाग्रह को जाहिर किया था. वे कश्मीर पर भारत विरोधी बयान देते थे, पर आतंकवाद पर नहीं बोलते थे. भारत के अभियान के कारण उनके कार्यकाल को विस्तार नहीं मिला, किंतु लड़ाई समाप्त नहीं हुई. पुनर्रचना का कार्य शेष है. इस घटना ने बता दिया है कि या तो भारत पुनर्रचना के लिए काम करे या फिर परिषद से अलग हो जाये.

जब भारत पुनर्रचना की बात कर रहा था, तभी जून, 2018 में अमेरिका ने इससे बाहर होने की घोषणा कर दी थी. अमेरिका ने कहा था कि परिषद लगातार उन देशों को बलि का बकरा बनाता है, जिनका रिकॉर्ड बेहतर है. अक्तूबर, 2018 में महासभा के 193 सदस्यों में से 188 के समर्थन से भारत एशिया-प्रशांत कोटे से सदस्य निर्वाचित हुआ था और जनवरी, 2019 से इसका कार्यकाल आरंभ हुआ. या तो परिषद अपना कदम खींचे या हम उससे बाहर आयें. यह संस्था अपरिहार्य नहीं.

(ये लेखक के निजी िवचार है़ं)

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