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Sunday, February 25, 2024

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वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका

ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया आदि देश मिलकर काम करें, तो वे चीन, रूस और अमेरिका को कुछ अनुशासित कर सकते हैं.

वर्ष 1960 में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से मिलने के बाद फ्रांस के राष्ट्रपति चार्ल्स डी गॉल ने घोषणा की थी, ‘दक्षिण एशिया में शांति एवं स्थायित्व के लिए भारत की शक्ति एवं स्थिरता आवश्यक है.’ उस समय में जब अमेरिका पाकिस्तान से मित्रता में व्यस्त था, जर्मनी के चांसलर कोनराड एडेनाएर ने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान की स्थापना में सहयोग का निर्णय लिया था, जो अब एक विश्व प्रसिद्ध संस्था है.

इन महादेशीय यूरोपीय शक्तियों से भारत के संबंधों की जड़ें गहरी हैं, हालांकि उनका निर्धारण शीत युद्ध के द्वारा हुआ है. इसलिए, यह आश्चर्यजनक नहीं है कि यूरोपीय संघ के साथ भारत के संबंधों पर पूर्व एवं पश्चिम के बीच पुराने तनावों के उभार का साया पड़ रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा दोनों पक्षों को एक-दूसरे की सुरक्षा चिंताओं के बारे में बेहतर समझ बनाने में मददगार हो सकती है. यह देखना बाकी है कि क्या इससे समीकरणों में मूलभूत बदलाव हो सकता है. ‘मध्यवर्ती शक्तियों’ के रूप में फ्रांस, जर्मनी और भारत जैसे देशों को अपने लिए एक नीतिगत स्थान की तलाश करनी चाहिए तथा इन्हें अपना पक्ष निर्धारित करने के लिए अमेरिका, चीन एवं रूस जैसी बड़ी शक्तियों के दबाव में नहीं आना चाहिए.

यूरोप में रूस की आक्रामकता से पैदा हुई यूरोपीय संघ की चिंताओं को समझा जा सकता है. भारत भी एशिया में चीन की आक्रामकता को लेकर चिंतित है. क्या ये साझा चिंताएं भारत एवं यूरोपीय संघ के बीच नये समीकरण का आधार हो सकती हैं? क्या यूरोपीय नेता डी गॉल की समझ को विस्तार देने और उस वाक्य से ‘दक्षिण’ को हटाने के लिए तैयार हैं?

यूरोप में शीत युद्ध के बाद की सुरक्षा संरचना को छिन्न-भिन्न करने के रूसी प्रयासों के बाद भी भारत ने रूस एवं यूरोपीय संघ के साथ अपने समीकरणों को बरकरार रखा है. दोनों पक्ष भले भारत से असंतुष्ट हों, पर उत्तर-औपनिवेशिक काल में भारत का यही रूख रहा है. भारत किसी को प्रसन्न करने का प्रयास नहीं कर रहा है, बल्कि उसकी चाहत एक ऐसे वैश्विक वातावरण की रही है, जो उसके आर्थिक विकास के अनुकूल हो तथा जो मानवता के प्रति उसके सभ्यतागत योगदान का संज्ञान ले.

हालांकि यूक्रेन पर रूस के हमले के संदर्भ में मोदी की यूरोप यात्रा और यूरोपीय संघ के प्रमुख की भारत यात्रा हुई है, यह तथ्य है कि यूरोपीय देशों के साथ द्विपक्षीय बैठकों का एजेंडा यूरोपीय संघ की पसंद से बहुत अलग था. जहां विभिन्न देशों, विशेष कर जर्मनी एवं फ्रांस, ने रक्षा साजो-सामान की बिक्री समेत अपने रणनीतिक और व्यापारिक हितों पर ध्यान केंद्रित किया, वहीं यूरोपीय संघ की प्राथमिकता व्यापार व निवेश नियमों पर सहमति बनाने पर रही.

राष्ट्रीय और सामूहिक एजेंडे में इस विभाजन ने भारत के लिए अक्सर समस्या पैदा की है, क्योंकि अलग-अलग देश रक्षा सौदों के बदले बाजार तक द्विपक्षीय पहुंच प्रस्तावित नहीं कर सकते हैं. इसीलिए जब चांसलर शुल्ज और राष्ट्रपति मैकरां भारत के द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा कर रहे थे, तो भारत में हॉलैंड के राजदूत ने याद दिलाया कि यूरोपीय संघ केवल शुल्क आधारित व्यापार समझौते पर सहमत नहीं हो सकता है, क्योंकि इसमें श्रम, पर्यावरण और सामाजिक मुद्दों जैसे संघ द्वारा जोर दिये जा रहे बिंदु शामिल नहीं होंगे.

क्या इसका अर्थ यह है कि रणनीतिक साझेदारी के नाम पर फ्रांस राफाल विमान तो बेचेगा, पर वह कोई ऐसा व्यापार व निवेश समझौता प्रस्तावित नहीं कर सकता, जिसकी अनुमति यूरोपीय संघ से न मिली हो? वास्तव में यूरोपीय संघ के एकल बाजार परियोजना की परिकल्पना ही जापान की आक्रामक निर्यात नीति के बरक्स सुरक्षा के तौर पर हुई थी.

आज भले यूरोपीय संघ और जी-सेवन आक्रामक रूप से उभरते चीन से जुड़ाव न खत्म न करें, पर उसके खतरे को कम करने के लिए वे धीरे-धीरे उभरते भारत के संदर्भ में और उसकी मदद के लिए क्या कर सकते हैं, यह अभी देखा जाना है. संक्षेप में, भले यूरोप रूस को लेकर और भारत चीन को लेकर चिंतित हों, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि यूरेशिया तथा हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सहयोग की तमाम चर्चाओं के बावजूद दोनों पक्ष एक-दूसरे के लिए क्या कर सकते हैं.

अगर प्रधानमंत्री मोदी की हालिया बैठकों से इस पर कुछ समझ बनी हो, तभी इस दौरे का उद्देश्य पूरा होगा. अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि चीन के समक्ष खड़े होने या रूस पर निर्भरता कम करने के वादे के अलावा भारत यूरोप को क्या प्रस्तावित कर सकता है. ऐसा कोई प्रस्ताव तब तक अकेले नये रणनीतिक सहयोग का आधार नहीं बन सकता है, जब तक इसके बदले यूरोप डी गॉल के विचार को दक्षिण एशिया से पूरे एशिया तक विस्तृत करने के लिए तैयार न हो. यह तीन मध्यवर्ती शक्तियों के लिए चुनौती है.

क्या ये देश अपनी साझी ‘शक्ति और स्थिरता’ से अपने-अपने पड़ोस में ‘शांति और स्थायित्व’ सुनिश्चित कर सकते हैं? या, फिर वे यही चिंता करते रहेंगे कि बड़ी शक्तियां वैश्विक व्यवस्था को बदलने की कोशिश में हैं? ब्राजील, फ्रांस, जर्मनी, भारत, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण अफ्रीका आदि जैसी मध्यवर्ती शक्तियां अगर मिल कर काम करें, तो वे तीन बड़ी शक्तियों- चीन, रूस और अमेरिका- को कुछ अनुशासित कर सकते हैं.

अपने गैरजिम्मेदाराना व्यवहार से तीनों बड़ी शक्तियों ने मध्यवर्ती शक्तियों द्वारा कुछ करने की इच्छा के लिए मौका पैदा किया है. पर मध्यवर्ती देश तभी कुछ कर सकते हैं, जब उनके पास कल्पनाशक्ति और इच्छाशक्ति होगी. क्या मैकरां, मोदी और शुल्ज ने इस संभावना पर विचार भी किया है या वे फिर पुराने ढर्रे पर ही चलते हुए बड़ी शक्तियों को लापरवाही से एकतरफा एजेंडा तय करने देते रहेंगे?

अंत में, मीडिया में बहुत से लोगों ने कर्तव्यपरायणता दिखाते हुए जर्मनी में होनेवाले जी-सेवन की बैठक के लिए शुल्ज द्वारा मोदी को आमंत्रित करने को एक विशिष्ट संकेत माना है. तथ्य यह है कि भारत को इंडोनेशिया और सेनेगल समेत चार अन्य देशों के साथ आमंत्रित किया गया है.

ऐसे आमंत्रण 2003 से ही आ रहे हैं, जब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका के नेताओं के साथ इस सम्मेलन में भाग लेनेवाले पहले प्रधानमंत्री थे. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने न केवल अनेक जी-सेवन बैठकों में हिस्सा लिया था, बल्कि एक बार जर्मनी में ऐसी बैठक के बहिष्कार की धमकी भी दे दी थी, जब चांसलर एंगेला मर्केल ने अतिथि नेताओं के साथ समूह की बैठक का समय घटाने का प्रयास किया था.

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