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डिजिटल उपनिवेशवाद का साया

Updated at : 31 May 2021 7:50 AM (IST)
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डिजिटल उपनिवेशवाद का साया

सरकार अपने सभी सरकारी अधिकारियों को स्वदेशी डिजिटल प्लेटफॉर्म दे, तो विदेशी कंपनियों की धमकियों और नागपाश से भारत को मुक्ति मिलेगी.

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व्हाट्सएप, फेसबुक और इंस्टाग्राम तीनों एक ही मालिक की अमेरिकी कंपनियां हैं. भारत में व्हाट्सएप के 53 करोड़, फेसबुक के 41 करोड़ और इंस्टाग्राम के 21 करोड़ यूजर हैं. पिछले पांच वर्षों से ये तीनों भारत के यूजर्स डाटा को व्यावसायिक लाभ के लिए आपस में शेयर करने के साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी नीलाम कर रही हैं. करोड़ों भारतीयों को फंसाने के बाद एकतरफा प्राइवेसी पॉलिसी को लागू करते हुए व्हाट्सएप ने कह दिया कि जो लोग नहीं मानेंगे, उन्हें व्हॉट्सएप से हटा दिया जायेगा.

इन कंपनियों से लंबे विचार-विमर्श के बाद आइटी नियमों को घोषित किया गया था, जिन्हें तीन महीने के भीतर सभी देसी-विदेशी कंपनियों को लागू करना था. वेबसाइट और एप, जिन्हें कानूनी भाषा में इंटरमीडियरी कहा जाता है, को भारत में अपने शिकायत अधिकारी, नोडल अधिकारी और कंप्लायंस अधिकारी को नियुक्त करना है. इससे पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों को जांच में मदद मिलने के साथ यूजर्स की शिकायतों के समाधान में आसानी होगी.साथ ही फेसबुक, गूगल और व्हाट्सएप जैसी कंपनियों के भारतीय अधिकारियों का पूरा विवरण, वेबसाइट और एप में प्रकाशित होने के साथ मैसेज और इ-मेल के माध्यम से भारतीय यूजर्स तक भेजे जाने की जरूरत है.

नियमों का पालन न करने पर ट्विटर जैसी कंपनियों से इंटरमीडियरी की कानूनी सुरक्षा चक्र को खत्म करने की पहल हो, तो कानून के शासन का इकबाल बुलंद होगा. विदेशी डिजिटल कंपनियां भारत के ऑफिस को मार्केटिंग ऑफिस कहते हुए हेड ऑफिस को चीन, अमेरिका या यूरोप में दिखलाती हैं. ऐसा कर इन कंपनियों ने खरबों डाॅलर की टैक्स चोरी की है.

इन कंपनियों के औपनिवेशिक मंसूबों को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक केएन गोविंदाचार्य ने एक दशक पहले ही भांप लिया था. उन्होंने इस संबंध में जून, 2012 में दिल्ली हाइकोर्ट में याचिका दायर की थी. उस मामले में हाइकोर्ट ने अनेक महत्वपूर्ण आदेश पारित किये, जिनके पांच बिंदुओं के अनुसार नये आइटी नियमों पर केंद्र सरकार दृढ़ता से अमल करे, तो भारत को डिजिटल उपनिवेशवाद के कुचक्र से मुक्ति मिल जायेगी.

पहला, नये आइटी नियमों से पहले इंटरमीडियरी कंपनियों के लिए यूपीए सरकार ने 2011 में नियम बनाये थे. गोविंदाचार्य की याचिका के बाद इन्हें लागू करने की पहल हुई. अगस्त, 2013 में हाइकोर्ट के आदेश के बाद ये कंपनियां पहली बार भारतीय कानून के दायरे में आयीं और इन्हें शिकायत अधिकारी की नियुक्ति करनी पड़ी, लेकिन इन लोगों ने भारतीय कानून की मनमानी व्याख्या करते हुए शिकायत अधिकारियों को अमेरिका और यूरोप में नियुक्त कर दिया. तत्कालीन यूपीए सरकार ने भी इन कंपनियों के पक्ष में हलफनामा देते हुए इसे स्वीकार कर लिया.

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एनडीए सरकार को नये नियम बनाने पड़े, जिसके तहत सभी कंपनियों को अब भारत में ही शिकायत अधिकारी नियुक्त करना है. दूसरा, पब्लिक रिकॉर्ड्स कानून के अनुसार सरकारी डाटा और फाइलों को विदेश भेजनेवाले सरकारी अधिकारियों को तीन साल तक की सजा हो सकती है. कोर्ट के आदेश के बावजूद करोड़ों अधिकारी फेसबुक, व्हाट्सएप, जीमेल जैसी विदेशी कंपनियों की सेवाओं का धड़ल्ले से गैर कानूनी इस्तेमाल कर रहे हैं.

सरकार अपने सभी अधिकारियों को स्वदेशी डिजिटल विकल्प दे, तो विदेशी कंपनियों की धमकियों और नागपाश से भारत को मुक्ति मिलेगी. तीसरा, सोशल मीडिया कंपनियों के नियम और भारत के कानून के अनुसार अश्लीलता, ड्रग्स, पॉर्नोग्राफी, बाल यौन शोषण आदि के आपत्तिजनक वीडियो और कंटेंट को हटाने के लिए ये कंपनियां कानूनी तौर पर बाध्य हैं, लेकिन सरकार की रुचि टूलकिट जैसे सियासी मामलों में पुलिस कार्रवाई की ज्यादा है. सोशल मीडिया में सियासी लड़ाई की वजह से बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के साथ कानून का रसूख भी कमजोर होना संवैधानिक व्यवस्था के लिए बड़ी त्रासदी है, जिसे ठीक करने की जरूरत है.

चौथा, गोविंदाचार्य मामले में सरकार द्वारा दिये गये वचन के अनुसार भारत का डाटा भारत में रहे, तो इससे राष्ट्रीय सुरक्षा के साथ बड़े पैमाने पर आर्थिक विकास और रोजगार सृजन हो सकता है, लेकिन पिछले सात वर्षों में डाटा स्थानीयकरण के बारे में सरकार ने ठोस कदम नहीं उठाया. भारत सरकार ने एक झटके में पबजी जैसे अनेक चीनी एप्स पर प्रतिबंध लगा दिये. मुख्य कारण यह बताया गया कि ये कंपनियां डाटा अनधिकृत तौर पर विदेश ले जाती हैं. अब फेसबुक, गूगल, अमेजन, नेटफ्लिक्स जैसी कंपनियों पर भी कानून का चाबुक चले, तो फिजूल के विवाद खत्म होने के साथ सरकारी खजाना भी भरेगा.

पांचवा, गोविंदाचार्य की याचिका में गूगल इंडिया की भारत से 4.29 लाख करोड़ की सालाना आमदनी के प्रमाण दिये गये थे. उसके बाद केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को दिये गये प्रतिवेदन में विदेशी डिजिटल कंपनियों की भारत से 20 लाख करोड़ के सालाना कारोबार का विस्तार से विवरण दिया गया था. टैक्स चोरी के इस बड़े डिजिटल नेटवर्क की वजह से भारत में गरीबी और असमानता का दुष्चक्र बढ़ रहा है. दिल्ली हाइ कोर्ट के सामने केंद्र सरकार ने सोशल मीडिया कंपनियों पर भारत का कानून लागू करने और उनसे टैक्स वसूली का जो शपथपत्र दिया था, उसे अब देशहित में पूरा करने का समय आ गया है.

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