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रचनात्मक राजनीतिज्ञ थे जॉर्ज

Updated at : 03 Jun 2021 8:20 AM (IST)
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रचनात्मक राजनीतिज्ञ थे जॉर्ज

संघर्ष और बहादुरी के चलते आपातकाल के संदर्भ में जेपी के बाद लोग जॉर्ज फर्नांडिस को याद करते हैं. उनकी प्रेरणा से सैकड़ों नक्सली राजनीति की मुख्यधारा में आये.

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शोषण विहीन समाज की स्थापना के लिए लोहिया के तीन सूत्र थे- वोट, फावड़ा और जेल. यह क्रमशः संसदीय लोकतंत्र, रचनात्मक काम और संघर्ष के प्रतीक हैं. जॉर्ज फर्नांडिस इसे प्रभावी ढंग से आचरण में लाने में सफल रहे. रचनात्मक काम- बैंकों से कर्ज लेने में गरीबों को होनेवाली मुश्किलों को दूर करने के लिए जॉर्ज ने ‘बॉम्बे लेबर को-ऑपरेटिव बैंक’ की स्थापना की. साथ ही उन्होंने मुंबई के 50 हजार से अधिक टैक्सी चालकों को ‘टैक्सी-मालिक’ बनने में मदद की. जॉर्ज अंग्रेजी में ‘द अदरसाइड’ और हिंदी में ‘प्रतिपक्ष’ मासिक प्रकाशित करते थे. पूरे भारत के ‘दस्तकारों’ को बाजार उपलब्ध करनेवाले दिल्ली स्थित ‘दिल्ली-हाट’ की स्थापना जॉर्ज की ही प्रेरणा है.

जॉर्ज लोकतंत्र, मानवाधिकार, स्वदेशी के पक्ष में और उपनिवेशवाद, गैरबराबरी, परिवारवाद, भ्रष्टाचार, शोषण तथा अन्याय के विरुद्ध संघर्षों में साढ़े पांच साल जेल में काटे थे. साल 1974 की ऐतिहासिक रेल हड़ताल ने उन्हें विश्व स्तर के मजदूर नेता के रूप में स्थापित कर दिया. म्यांमार में लोकतंत्र, श्रीलंका के ईलम तमिल लोगों के मानवाधिकार, तिब्बत के लिए संघर्ष उनको प्रिय था.

आपातकाल में सोशलिस्ट पार्टी के अध्यक्ष रहते हुए गिरफ्तारी होने तक 11 महीने भूमिगत रहकर उन्होंने क्रांतिकारी संघर्ष किये. आपातकाल के दौरान ‘बरोड़ा डायनामाइट केस’ में राजद्रोह के अभियुक्त जॉर्ज, 1977 का चुनाव मुजफ्फरपुर से जेल से ही लड़कर जीते थे. उनके संघर्ष और बहादुरी के चलते आपातकाल के संदर्भ में जेपी के बाद लोग जॉर्ज को याद करते हैं. उनकी प्रेरणा से सैकड़ों नक्सली राजनीति के मुख्यधारा में आये.

जब केंद्र सरकार ने अमेरिकी कंपनी, कारगिल को गुजरात के कांडला में नमक बनाने के लिए 15 हजार एकड़ जमीन दी, तो जॉर्ज ने 19 मई, 1993 को कांडला में अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू कर दिया, हर रोज गिरफ्तारियां हुईं. इसमें चंद्रशेखर, वीपी सिंह, रबी रे, मधु दंडवते, सुरेंद्र मोहन, मृणाल गोरे आदि शामिल हुए. 27 सितंबर, 1993 को गांधीनगर उच्च न्यायालय में इससे संबंधित, जॉर्ज की जनहित याचिका पर सुनवाई हुई, जिसमें जॉर्ज ने बिना वकील के ही स्वयं बहस की. चार महीने लगातार चले इस सत्याग्रह को ऐतिहासिक विजय मिली.

15 अप्रैल, 1994 को ‘जीएटीटी समझौता’ पर हस्ताक्षर होना था. मार्च में ही जॉर्ज ने संसद के सामने विरोध में अनिश्चितकालीन सत्याग्रह शुरू कर दिया. सत्याग्रही तिहाड़ जेल में भी बंद हुए. इसी सिलसिले में 28 मई 1994 को गांधीवादी सिद्धराज धड्ढा, नक्सल नेता विनोद मिश्रा, समाजवादी नीतीश कुमार, मजदूर नेता शरद राव धनबाद में जॉर्ज के साथ एक मंच पर आये. जॉर्ज, ‘स्वदेशी जागरण मंच’ की सभा में मुरली मनोहर जोशी, दत्तोपंत ठेंगड़ी, गोविंदाचार्य, मुरलीधर राव के साथ और राजीव दीक्षित के स्वदेशी कार्यक्रम में भाग लेते थे. वर्ष 2010 में पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश, बाद में संसदीय स्थायी समिति और सर्वोच्च न्यायालय की समिति ने ‘जैव-परिवर्तित बीज’ पर रोक लगा दी थी.

तब जॉर्ज को अल्जाइमर्स के कारण याददाश्त नहीं थी, जॉर्ज के दल के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में जैव-परिवर्तित बीज और एसइजेड को अनुमति नहीं देने का ऐलान किया. जॉर्ज नौ बार लोकसभा और एक बार राज्यसभा सदस्य रहे. बेरोजगारी के चलते मजदूरों का शहरों की ओर पलायन रोकने के लिए जॉर्ज ने मोरारजी सरकार में उद्योग मंत्री के नाते एक टिकाऊ समाधान रखा था. गांधीजी के स्वदेशी दर्शन और लोहिया की ‘उचित तकनीक’ सिद्धांत का समन्वय बनाकर देहात में रोजगार सृजन करने, देशव्यापी ‘समरूप’ विकास सुनिश्चित करने के लिए ‘1977 की औद्योगिक नीति’ तैयार की गयी.

जिला उद्योग केंद्रों की स्थापना और लघु एवं कुटीर उद्योगों को बढ़ावा दिया गया. इसके लिए विद्युत उत्पादन पर सर्वाधिक ध्यान दिया गया. ट्रॉम्बे स्थित ‘थर्मल प्लांट’ को जॉर्ज ने मंजूरी दी. कांटी-तेनुघाट थर्मल स्टेशन भी उन्हीं की देन है. प्रवासी मजदूरों को अन्य प्रदेशों में शोषण से राहत दिलाने हेतु ‘अंतर राज्य प्रवासी श्रम अधिनियम 1979’ बनवाने में जॉर्ज सफल हुए. देसी उद्यमों को संरक्षण देकर, विदेशी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा देने लायक बनाना, देश को स्वावलंबी और आत्मनिर्भर बनाना उनकी प्राथमिकता थी.

आइबीएम हटने से युवा इंजीनियरों के लिए अवसर खुला. टीसीएस, एचसीएल, पटनी कंप्यूटर्स को फायदा हुआ. आज सॉफ्टवेयर क्षेत्र में देसी कंपनियों ने 40 लाख प्रत्यक्ष और एक करोड़ परोक्ष रोजगार सृजित किया है. आइटी कारोबार में भारत की टीसीएस, इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल दुनिया की शीर्ष कंपनियों में शामिल हैं. रक्षामंत्री रहते हुए जवानों का मनोबल बढ़ाने वे 38 बार सियाचिन गये.

Posted By : Sameer Oraon

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अनिल हेगड़े

लेखक के बारे में

By अनिल हेगड़े

अनिल हेगड़े is a contributor at Prabhat Khabar.

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