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बिहार की हरसंभव मदद करे केंद्र

By शैबाल गुप्ता
Updated Date

शैबाल गुप्ता

सदस्य सचिव, एशियन डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट (आद्री), पटना

delhi@prabhatkhabr.in

जैसे-जैसे वैश्वीकरण बढ़ा है, वैसे ही स्थानीय महामारियों के पूरी दुनिया में तेजी से फैलने का रुझान भी बढ़ा है. कोरोना वायरस रोग (कोविड-19) के बारे में भी हम ऐसा ही देख रहे हैं. आम तौर पर सबसे गरीब देशों पर सबसे अधिक मार पड़ती है, लेकिन इस बार सबसे अधिक विकसित देश प्रभावित हुए हैं. जैसाकि शुरू में माना जा रहा था कि भारत में गरीब राज्य सबसे अधिक प्रभावित होंगे, लेकिन वे अधिक प्रभावित नहीं हुए हैं. वायरस का फैलाव बिहार में नगण्य तो नहीं है, लेकिन अपेक्षाकृत कम है. बिहार को समय-समय पर टीबी, कालाजार और एन्सेफलाइटिस जैसे अन्य संक्रामक रोगों की चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है. यह देखते हुए इस महामारी से बिहार को ऐतिहासिक, वित्तीय, अधिसंरचनात्मक, प्रवासी मजदूरों से संबंधित और अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार– इन पांच स्तरों पर निपटना है. ऐतिहासिक रूप से देखें, तो बिहार बंगाल प्रांत का हिस्सा था. अकुशल जमींदारी व्यवस्था के कारण इस क्षेत्र में शासन की गुणवत्ता खराब थी. वर्ष 1930 में तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा साइमन कमीशन के सामने प्रस्तुत स्मारपत्र में इस तथ्य को रेखांकित किया गया था कि बंगाल प्रांत में स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति व्यय बंबई और मद्रास प्रांतों की तुलना में काफी कम था. बंगाल प्रांत में भी बिहार में स्वास्थ्य पर व्यय अन्य क्षेत्रों के मुकाबले कम था. दुर्भाग्यवश, यही रुझान आजादी के बाद भी बरकरार रहा.

बिहार के 2020-21 के बजट में स्वास्थ्य पर कुल सार्वजनिक व्यय 8,788 करोड़ रुपये प्राक्कलित है, जो कुल बजट का 4.1 प्रतिशत है. प्रति व्यक्ति के लिहाज से देखें, तो बिहार में स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय मात्र 690 रुपये है. वहीं, केरल के मामले में यह आंकड़ा 2,092 रुपये है, जो बिहार का तीन गुना है. प्रति 1000 जनसंख्या पर अस्पतालों की शय्याओं की संख्या के लिहाज से देखें, तो बिहार में स्वास्थ्य देखरेख अधिसंरचना राष्ट्रीय औसत के महज पांचवें हिस्से के बराबर है. राज्य में आवश्यक स्वास्थ्य अधिसंरचना के निर्माण के लिए लगभग दो दशकों से कोई बड़ी धनराशि खर्च नहीं की गयी है.

चूंकि, बिहार में निगमित क्षेत्र (कॉरपोरेट सेक्टर) मौजूद नहीं है, इसलिए अधिसंरचना के विकास की जिम्मेदारी मुख्यतः राज्य सरकार की ही है. लेकिन, लंबे समय से अपनी कमजोर वित्तव्यवस्था के कारण राज्य सरकार बहुत कुछ कर भी नहीं सकती है. लॉकडाउन के दौरान बिहार में वस्तुतः कोई भी आर्थिक गतिविधि नहीं हुई है और राज्य सरकार करों से पर्याप्त राजस्व प्राप्त नहीं कर सकी है. साथ ही, राजकोषीय उत्तरदायित्व एवं बजट प्रबंधन (एफआरबीएम) अधिनियम, 2003 में तय सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के तीन प्रतिशत की सीमा के कारण राज्य सरकार के लिए उधार लेने की गुंजाइश भी सीमित है. करों के केंद्रीय कोष में राज्य का हिस्सा नियमित रूप से घटता गया है. यह कमी 2019-20 में 14,796 करोड़ रुपये पहुंच गयी. इतनी गंभीर वित्तीय बाध्यताओं की स्थिति में धन का एकमात्र स्रोत 2008 में बनायी गयी संचित ऋण शोधन निधि (सीएसएफ) है. लॉकडाउन से पैदा हुए वित्तीय दबाव के चलते राज्य सरकार को इस निधि से 1,000 करोड़ रुपये निकालने पड़े हैं. अधिसंरचना को मजबूत करने के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित करने के मामले में राज्य सरकार की वर्तमान वित्तीय क्षमता अत्यंत सीमित है.

कोविड-19 का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू है- प्रवासी मजदूरों द्वारा झेली जा रही समस्याएं. अनुमान है कि राज्य से लगभग 30 लाख मजदूर दूसरे राज्यों में काम करने के लिए गये हैं. महामारी के कारण वे वहीं फंस गये हैं और न तो उनके पास काम है और न ही वहां से घर लौटने का कोई उपाय. काफी विलंब करने के बाद केंद्र सरकार ने घर पहुंचाने में उनकी मदद के लिए विशेष रेलगाड़ियों की व्यवस्था की है, लेकिन लॉकडाउन के समाप्त होने पर इन प्रवासी मजदूरों को अपने इलाके में या प्रवास वाली पुरानी जगहों पर रोजगार देना-दिलाना राज्य सरकार के लिए एक गंभीर चुनौती होगी. निष्कर्ष रूप में कहें, तो इस वायरस के कारण उत्पन्न चुनौतियों का सामना करने के लिए राज्य सरकार को अपनी अर्थव्यवस्था पुनर्जीवित करनी होगी. हालांकि, हाल के वर्षों में राज्य की अर्थव्यवस्था में लगातार विकास दर्ज हुआ है, लेकिन यह अभी भी कमजोर है. राज्य की अर्थव्यवस्था कमजोर रह जाने का कारण एक ओर निगमित क्षेत्र और औद्योगिक क्षेत्र की अनुपस्थिति है, तो दूसरी ओर निम्न उत्पादकता वाले कृषि क्षेत्र पर अपने बहुसंख्यक श्रमिकों की निर्भरता. अपनी अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने के लिए राज्य सरकार को अग्रणी भूमिका निभानी होगी.

अपने लोगों, खास कर गरीब लोगों को क्रयशक्ति उपलब्ध कराना इसका पहला घटक होगा. महात्मा गांधी ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम (मनरेगा) जैसे श्रमोन्मुख कल्याण कार्यक्रम यहां स्वाभाविक पसंद की चीज हैं, लेकिन ऐसे दूसरे कार्यक्रम भी हो सकते हैं. दूसरे, राज्य में लॉकडाउन के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुए अतिलघु, लघु एवं मध्यम उद्यम क्षेत्र को आवेग प्रदान करने के लिए राज्य सरकार को उन्हें काफी राहत देनी होगी. कर संबंधी छूटों के अलावा ऐसी राहत में लागत सब्सिडी भी शामिल हो सकती है. इसका राज्य की वित्तव्यवस्था पर निश्चित रूप से दबाव पड़ेगा. लेकिन राज्य सरकार को उधार लेने में हिचकिचाना नहीं चाहिए- अगर एफआरबीएम अधिनियम द्वारा सकल राज्य घरेलू उत्पाद के तीन प्रतिशत की तय सीमा का अतिक्रमण करना पड़े तब भी नहीं. गया और बौद्ध धर्म की विरासत के कारण जापान, दक्षिण कोरिया और थाइलैंड जैसे राष्ट्रों के साथ बिहार के साथ साझा सांस्कृतिक संबंध हैं, इसलिए मदद के लिए उनके साथ संपर्क करने को भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए. राज्य की अर्थव्यवस्था अभूतपूर्व स्थिति का सामना कर रही है, इसलिए यह अभूतपूर्व रिस्पांस की भी मांग करती है. बिहार इस चुनौती से पार पा सकता है, लेकिन इसके लिए राज्य को केंद्र सरकार से मिलनेवाले हरसंभव सहयोग की जरूरत होगी.

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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