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नये समीकरणों का मंत्रिपरिषद

By मनीषा प्रियम
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नये समीकरणों का मंत्रिपरिषद
नये समीकरणों का मंत्रिपरिषद
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मंत्रिपरिषद के इस व्यापक विस्तार में जो सबसे प्रमुख बात सामने आती है, वह यह है कि इसमें सामाजिक एप्रोच लिया गया है और सोशल डिस्ट्रिब्यूशन की कोशिश की गयी है. इस विस्तार में पिछड़ी जातियों के मंत्रियों का बाहुल्य है. विभिन्न सामाजिक वर्गों के जो लोग मंत्री बनाये गये हैं, वे केवल उत्तर भारतीय राज्यों से नहीं हैं, बल्कि दक्षिण का भी उल्लेखनीय प्रतिनिधित्व है.

विभिन्न सामाजिक समूहों को जिस प्रकार से समुचित प्रतिनिधित्व देने का प्रयास किया गया है, वह बहुत महत्वपूर्ण है. मेरी दृष्टि में सोच-विचार के साथ लिया गया निर्णय है. भाजपा नेतृत्व ने यह भी दर्शाया है कि वे राम की राजनीति तो करते हैं, लेकिन मंडल की राजनीति पर भी कुछ पार्टियों, खास कर सोशलिस्ट पार्टियों, का विशेष कॉपीराइट नहीं है.

नब्बे के दशक से आज बिल्कुल भिन्न स्थिति है. उस समय मंडल और कमंडल अलग धड़े हुआ करते थे. अब भाजपा राम मंदिर एजेंडे को पूरा कर चुकी है और मंदिर का निर्माण कार्य चल रहा है. इसके बाद वह सामाजिक समीकरणों की राजनीति को ठोस चुनौती दे रही है. भाजपा ने दिखाया है कि अकेले दम पर आगे बढ़ना हो या गठबंधनों के साथ, दोनों ही स्थितियों में पार्टी पहल कर सकती है. यह इस विस्तार का सबसे बड़ा संदेश है.

इसके साथ यह भी संदेश साफ है कि मंत्रियों के कामकाज के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता है. स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में प्रधानमंत्री मोदी की पैनी निगाह है. चाहे कोई कितना भी बड़ा नेता क्यों न हो, प्रधानमंत्री ने स्पष्ट संकेत दे दिया है कि सबका साथ सबका विकास की भावना के साथ इन दो क्षेत्रों में काम करने की जरूरत है.

उन्होंने इस संबंध में पहलकदमी भी की है. हमें इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिपरिषद का गठन कैसे किया है. यह भी नहीं समझा जाना चाहिए कि जो मंत्री इस्तीफा दे चुके हैं, उनमें से सभी का कामकाज खराब था. यह सही समझ नहीं होगी. यह मंत्रिपरिषद इंगित करता है कि भारत राज्यों का परिसंघ है. यह कैबिनेट देश की सामाजिक विविधता का भी संज्ञान लेता है. इससे यह भी संकेत मिलता है कि बदलाव के इस मोड़ पर आपको सामाजिक पिरामिड के अंतिम भाग को अहमियत देना होगा.

एक हिसाब से देखा जाए, तो नये सिरे से मंत्रिमंडल का गठन हुआ है. पहले बोला जाता था कि ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ होगा, पर वे बातें पुरानी हो चुकी हैं. नयी वास्तविकताओं के अनुकूल निर्णय हो रहे हैं. पश्चिम बंगाल में हार के कारणों को उन्होंने समझने का प्रयास किया है. वहां के मटुआ समुदाय से प्रतिनिधित्व देना या अनुसूचित जनजाति के अल्पसंख्यक को मंत्रिमंडल में जगह देना इसके उदाहरण हैं. इससे पता चलता है कि सरकार व पार्टी के लिए देश का हर भूभाग और हर सामाजिक बिरादरी अहम है.

इसके साथ ही, दूसरी पार्टियों से भाजपा में आये नेताओं का भी पूरा ध्यान रखा गया है और पुरस्कृत किया गया, चाहे वे ज्योतिरादित्य सिंधिया हों या अन्नपूर्णा देवी हों. इस तरह से अब भाजपा के लिए कोई अछूता नहीं है. निश्चित रूप से यह एक नयी कैबिनेट है.

इस बार बड़ी संख्या पहली बार मंत्री बनानेवालों की है. आनेवाले दिनों में देखना होगा कि बहुत सारे वरिष्ठ मंत्रियों को हटाने और नये चेहरों को जिम्मेदारी देने की कवायद जिस उद्देश्य से की गयी है, वह हासिल होता है या नहीं. इस मंत्रिपरिषद में अलग-अलग पृष्ठभूमि से आये लोग हैं. अच्छी संख्या पूर्व नौकरशाहों की है, चाहे वे आरसीपी सिंह हों, आश्विनी वैष्णव हों, आरके सिंह हों या हरदीप पुरी हों. इन सबका लंबा अनुभव रहा है, जो सरकार चलाने में काम आयेगा.

जहां तक इस सरकार के सामने चुनौतियों का सवाल है, सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य और शिक्षा है. प्रधानमंत्री मोदी ने इन मामलों को लेकर अपने मंसूबे दर्शा दिये हैं. इसमें कोई दो राय नहीं है कि उत्तर प्रदेश तथा गुजरात समेत अनेक राज्यों के चुनावों के मद्देनजर भी मंत्रियों का चयन किया गया है. चाय बागान के कामगारों के बीच लंबे समय से काम करनेवाले व्यक्ति को सरकार में लाना उल्लेखनीय है.

ध्यान रहे, चाय बागान के कामगार असम और बंगाल के लिए अहम भूमिका निभा सकते हैं. बंगाल में भले पार्टी नहीं जीत सकी, पर भाजपा के पास चुनाव जीतने की स्पष्ट रणनीति है, जो इस फेर-बदल में दिखाई देती है. यह कैबिनेट नये सिरे से साफ स्लेट के साथ नयी पारी खेलने के लिए तैयार है. यह भी ध्यान देने की बात है कि जो टेक्नोक्रेट और अन्य प्रोफेशनल आये हैं, वे भाजपा की पृष्ठभूमि से हैं. खासकर कर्नाटक के संदर्भ में पार्टी ने आंतरिक असंतोष और खींचतान को प्रभावी ढंग से साधने की कोशिश की है.

उत्तर प्रदेश और बिहार के संदर्भ में जो समीकरण बैठाया गया है, वह किसी मास्टरस्ट्रोक से कम नहीं है. भाजपा ने बिहार में अपनी इकाई को कह दिया है कि हमने चुनाव लड़ा और पहले स्थान पर आये, पर राज्य में नेतृत्व नीतीश कुमार का रहेगा. आरसीपी सिंह को कैबिनेट में लेकर बिहार और झारखंड में जातिगत समीकरण को साधने का उद्देश्य भी दिख रहा है. इसमें अगर आप उत्तर प्रदेश से अनुप्रिया पटेल के शामिल करने को जोड़ लें, तो एक बड़े मतदाता समूह को अपने पाले में लामबंद करने की जोरदार कोशिश की गयी है.

अब सवाल यह उठता है कि इतने समीकरणों के बाद मंडल समर्थक सोशलिस्ट पार्टियों के पास क्या उपाय रह जाता है? इस सूची में रामनाथ ठाकुर भी हैं, सो कर्पूरी ठाकुर के पुत्र इस सरकार के साथ हैं. ऐसे में बिहार में विपक्ष के पास मंडल राजनीति के साथ कोई दांव चलने का बहुत विकल्प नहीं रह जाता है. जातीय राजनीति करने वाला बाकी वोट कहां से जुटा सकेगा, जब इन नेताओं के साथ पशुपति पारस भी इधर हैं? यही स्थिति पूर्वी उत्तर प्रदेश में है.

झारखंड की अन्नपूर्णा देवी के रूप में एक और बड़ी नेता को भाजपा ने साधा है. यहां यह कहा जाना चाहिए कि जिस भी नेता ने किसी और पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा का दामन थामा है, उसे समुचित पुरस्कार मिला है. इसका मतलब है कि भाजपा अभी खुले दरवाजे की नीति पर चल रही है और यह अन्य दलों को संदेश है कि वे अपने बड़े नेताओं को बंद कर नहीं रख सकते. यहां हम राजनीतिक रूप से एक व्यापक सामाजिक ताना-बाना बनते हुए देख सकते हैं. इसे ये या वो टीम कहना ठीक नहीं है, बहुत सोच-विचार से प्रभावित करनेवाला प्रतिभाशाली मंत्रिपरिषद का गठन हुआ है.

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