खेतीबाड़ी की सुध

Updated at : 06 Jan 2016 6:12 AM (IST)
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खेतीबाड़ी की सुध

कहा तो अब भी जाता है कि ‘भारतमाता ग्रामवासिनी’ है और उसका ‘धूल भरा मैला-सा आंचल’ खेत-खलिहान के रूप में फैला है. लेकिन, अब ऐसा कहना राजनीति चमकाने के ख्याल से होता है. भारतमाता के ग्रामवासिनी होने के साक्ष्य आंकड़े नहीं देते. यह सच है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी अब भी जीविका […]

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कहा तो अब भी जाता है कि ‘भारतमाता ग्रामवासिनी’ है और उसका ‘धूल भरा मैला-सा आंचल’ खेत-खलिहान के रूप में फैला है. लेकिन, अब ऐसा कहना राजनीति चमकाने के ख्याल से होता है. भारतमाता के ग्रामवासिनी होने के साक्ष्य आंकड़े नहीं देते. यह सच है कि देश की आधी से ज्यादा आबादी अब भी जीविका के लिए खेतीबाड़ी और इससे जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है, लेकिन जीडीपी में खेतीबाड़ी का हिस्सा सिकुड़ कर 15 प्रतिशत से भी कम रह गया है.
यह सेवा-क्षेत्र के महाविस्तार का समय है. वर्ष 2014-15 में भारतीय सेवा-क्षेत्र का मूल्य 61.18 लाख करोड़ रुपये आंका गया, औद्योगिक क्षेत्र का मूल्य 34.67 लाख करोड़ रुपये, तो खेतीबाड़ी व सहायक गतिविधियों का मोल महज 19.65 लाख करोड़ रह गया है.
इसलिए, आज जब कोई ‘बढ़ते और विकास करते’ भारत की बात कहता है, तो उस ग्रामवासिनी भारतमाता की बात नहीं कहता, जिसका आंचल खेतों के रूप में पसरा है, बल्कि खेत-खलिहान के भारतीय महासमुद्र के भीतर सेवा-क्षेत्र के रूप में लगातार बढ़ते समृद्धि के उन टापुओं की बात करता है, जिसकी आर्थिक ताकत खेतीबाड़ी की तुलना में चार गुना ज्यादा बढ़ गयी है.
खेतीबाड़ी के विकास का आलम यह है कि देश में 1990 में कुल फसली इलाके का 34 प्रतिशत हिस्सा सिंचित था, तो बीस बरस बाद भी सिंचित इलाके में इतना विस्तार ना हो सका कि वह कुल फसली क्षेत्र का 50 प्रतिशत हिस्सा भी पार कर सके. देश की आधी आबादी के जीवन-जीविका का आधार कहलानेवाली खेतीबाड़ी का आधा से ज्यादा हिस्सा अब भी मॉनसून के मिजाज पर ही निर्भर है.
ऐसे सैकड़ों शोध-अध्ययन मौजूद हैं, जो बताते हैं कि औद्योगिक अथवा सेवा-क्षेत्र के उत्पादों की अपेक्षा खेतिहर सामानों का मूल्य बीते साठ सालों में लगातार कम हुआ है और कृषक परिवार गरीबी तथा कर्ज के भार से दबते गये हैं. देश में कर्जदार किसान परिवारों की संख्या बीते दस सालों (2003-2013) में 48.6 प्रतिशत से बढ़ कर 52 प्रतिशत हो गयी है और हर कर्जदार किसान परिवार पर औसतन 47 हजार रुपये का कर्ज है.
एक ऐसे समय में, जबकि किसान-आत्महत्या के ज्यादातर मामले कर्जदारी और गरीबी से संबंधित हैं, केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली का कृषि-क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने, खेती में निवेश बढ़ाने और खेतीबाड़ी को घेरनेवाली चुनौतियों से निबटने की बात कहना निश्चित रूप से प्रशंसनीय है. उम्मीद की जानी चाहिए कि अगले बजट में खेती पर कुछ वैसे ही ध्यान दिया जायेगा, जैसा कुछ शुरुआती पंचवर्षीय योजनाओं में दिया गया था.
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