बरबाद हुआ सत्र

Published at :14 Aug 2015 4:51 AM (IST)
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बरबाद हुआ सत्र

मॉनसून सत्र की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो चुकी है. विपक्षी पार्टी कांग्रेस और राजग सरकार के बीच तनातनी और हंगामे के कारण इस सत्र में न तो महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतियों पर चर्चा हो सकी और न ही सामान्य कार्यो को ठीक से अंजाम दिया जा सका. कांग्रेस ने शुरू में ही साफ […]

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मॉनसून सत्र की कार्यवाही अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो चुकी है. विपक्षी पार्टी कांग्रेस और राजग सरकार के बीच तनातनी और हंगामे के कारण इस सत्र में न तो महत्वपूर्ण विधेयकों और नीतियों पर चर्चा हो सकी और न ही सामान्य कार्यो को ठीक से अंजाम दिया जा सका.
कांग्रेस ने शुरू में ही साफ कर दिया था कि जब तक ललित मोदी को कथित रूप से मदद करने के आरोप में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया तथा व्यापमं घोटाले में आरोपों से घिरे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपने पदों से इस्तीफा नहीं देते, संसद में उसका विरोध जारी रहेगा. कांग्रेस की जिद के चलते सरकार के तेवर भी तल्ख हो गये, जिसका एक नतीजा सांसदों के निलंबन के रूप में सामने आया. कई दिनों के हंगामे से परेशान होकर लोकसभा स्पीकर सुमित्र महाजन ने 25 कांग्रेसी सांसदों को पांच दिन के लिए निलंबित भी किया.
हालांकि इससे कांग्रेस के विरोध पर असर नहीं पड़ा, बल्कि उसे विपक्ष की कुछ अन्य पार्टियों का भी समर्थन मिल गया. दूसरी ओर सरकार ने बार-बार बयान दिया कि वह विवादित मसलों पर बहस के लिए तैयार है. इस स्थिति से ऊब कर सपा नेता मुलायम सिंह यादव ने भी कांग्रेस के रवैये की आलोचना की और कुछ अन्य पार्टियों ने भी परोक्ष रूप से असंतोष जताया.
अंतत: सत्रवसान से एक दिन पूर्व कांग्रेस ने ललित मोदी मामले पर बहस में हिस्सा लिया और सरकार ने भी उसके आरोपों का जमकर जवाब दिया. लेकिन, शायद ही कोई यह कह सकता है कि इस बहस से मूल मुद्दे पर कोई नयी बात या जानकारी सामने आयी. पूरी बहस आरोप-प्रत्यारोपों तक सिमट कर रह गयी.
तथ्यों के बिना सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और शोर-गुल से कोई भी बहस कभी सार्थक नहीं होती. दोनों तरफ से कुछ ऐसी टिप्पणियां भी की गयीं, जिन्हें संसदीय मर्यादाओं के अनुकूल नहीं माना जा सकता है. गौरतलब है कि इस महत्वपूर्ण सत्र में वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) विधेयक पर चर्चा होनी थी. वस्तुओं तथा सेवाओं पर लगनेवाले करों को एकरूपता देकर आर्थिक सुधारों की गति तेज करने के लिए यह एक अहम व्यवस्था है.
सरकार पिछले वर्ष से ही इसे संसद से पारित कराने की कोशिश में लगी है. इसी कारण संसद के इस सत्र को फिर से बुलाने की चर्चा भी हो रही है. संविधान के अनुच्छेद 85(2) की व्यवस्था के तहत राष्ट्रपति को ऐसी अनुमति देने का अधिकार है.
संसद नीति-निर्धारण की सर्वोच्च संस्था है. राज्यसभा में सत्ता पक्ष को बहुमत नहीं है. ऐसे में किसी भी विधेयक को पारित कराने के लिए उसे विपक्ष पर निर्भर रहना है. पहले बीमा में निवेश और खनन विधेयक इसी साङोदारी से पारित हो सके थे.
विपक्ष के विरोध के कारण ही उसे भूमि अधिग्रहण विधेयक पर अपने पैर पीछे खींचने पड़े हैं. पर, अर्थव्यवस्था में बेहतरी के लिए बनाये जा रहे कानूनों से जुड़े बिंदुओं पर बहस न करके, इतर कारणों से संसद में अवरोध पैदा करने की कांग्रेस की रणनीति देश के विकास के दावों और संभावनाओं को अस्थिर कर सकती है.
अगर इस सत्र से पहले के आंकड़ों को देखें, तो प्रमुख देशों की समकक्ष संस्थाओं की तुलना में भारतीय संसद की बहुत कम बैठकें होती हैं. अमेरिकी सीनेट वर्ष में औसतन 180 दिन और कांग्रेस 126 दिन चलती हैं.
ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमंस 130 बैठकें, जबकि फ्रांस की नेशनल एसेंबली 149 बैठकें करती हैं. इन जनप्रतिनिधि संस्थाओं की तुलना में भारतीय संसद की बैठकों का सालाना औसत 80 दिनों का ही है. ऐसे में हंगामे के कारण एक समूचे सत्र का बर्बाद हो जाना विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता की बात है.
कांग्रेस का यह कहना ठीक है कि भाजपा भी बतौर विपक्ष संसद के कामकाज को लंबे समय तक बाधित करती रही है. लेकिन जब कांग्रेस विपक्ष में है, तब क्या उसे भी वही रवैया अपनाना चाहिए? विपक्ष का जो तौर-तरीका पहले अनुचित है, वही व्यवहार आज सही कैसे हो सकता है?
देश के हितों की कीमत पर अपना राजनीतिक स्वार्थ साधने की कांग्रेस की कोशिश खुद उसके राजनीतिक भविष्य के लिए भी ठीक नहीं है. जरूरी है कि कांग्रेस नेतृत्व अपनी रणनीति की गंभीरता से समीक्षा करे और समुचित आत्मालोचना कर सकारात्मक एवं रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाये. जनादेश ने उसे यही जिम्मेवारी दी है.
संसद न चलने देने से देश का जो अहित होना है, वह तो अपनी जगह है, परंतु यदि कांग्रेस ऐसे ही गैर-जिम्मेवाराना तेवर के साथ अपनी राजनीति करती रही और उसे अपने व्यवहार में सुधार से परहेज रहा, तो वह हाशिये से रसातल तक पहुंच सकती है. सरकार के कामकाज पर जनता की नजर है, तो विपक्ष के रूप में कांग्रेस को भी वह परख रही है.
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