खेती का खेल निराला मेरे भइया

Published at :04 Aug 2015 11:28 PM (IST)
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खेती का खेल निराला मेरे भइया

राजेंद्र तिवारी कॉरपोरेट एडिटर प्रभात खबर देश के करीब 75 फीसदी परिवार कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं. देश की लगभग 70 प्रतिशत गरीब आबादी (विश्व बैंक के मुताबिक 77 करोड़ लोग) गांव में बसती है. लेकिन देश के जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगातार गिरता जा रहा है. 50 के दशक में कृषि की हिस्सेदारी […]

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राजेंद्र तिवारी
कॉरपोरेट एडिटर
प्रभात खबर
देश के करीब 75 फीसदी परिवार कृषि क्षेत्र पर निर्भर हैं. देश की लगभग 70 प्रतिशत गरीब आबादी (विश्व बैंक के मुताबिक 77 करोड़ लोग) गांव में बसती है. लेकिन देश के जीडीपी में कृषि का हिस्सा लगातार गिरता जा रहा है.
50 के दशक में कृषि की हिस्सेदारी हमारी जीडीपी में 50 फीसदी से ज्यादा थी, 90 के दशक में यह 20 से 30 फीसदी रह गया और 2013-14 में यह हिस्सेदारी मात्र 13.9 फीसदी रह गयी.
90 के दशक में नयी थ्योरी अपने देश में प्रस्तुत की गयी कि जीडीपी में कृषि का योगदान जितना कम होगा, अर्थव्यवस्था उतनी ही उन्नत कही जायेगी.
नतीजा यह हुआ कि आज सर्विस सेक्टर का योगदान जीडीपी में 50 फीसदी से ज्यादा है, कृषि का हिस्सा 14 फीसदी से भी कम. मैं यहां ये आंकड़े क्यों दे रहा हूं, इसे समझने के लिए जरूरी है कि पहले हम यह जानें कि जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद है क्या.
यदि आम आदमी की भाषा में कहा जाये, तो देश में जितने पैसे का आदान-प्रदान होता है, उसे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) कहा जाता है. इस समय हमारा जीडीपी है 125.41 लाख करोड़ रुपये. इसमें कृषि की हिस्सेदारी है मात्र 17.43 लाख करोड़ रुपये.
यानी 75 फीसदी आबादी का जीडीपी में योगदान है 17.43 लाख करोड़ रुपये और 25 फीसदी आबादी (गैर-कृषि आधारित) का योगदान है 107.98 लाख करोड़ रुपये. साथ ही 2014-15 में जीडीपी की विकास दर रही 7.4 फीसदी, जबकि कृषि क्षेत्र की विकास दर सवा तीन फीसदी के आसपास.
यानी देश की करीब 75 फीसदी आबादी का आर्थिक विकास सवा तीन फीसदी की सालाना दर से हो रहा है, जबकि बाकी 25 फीसदी का आर्थिक विकास 10 फीसदी से भी ज्यादा की दर से हो रहा है.
विकास दर के अंतर को देखा जाये, तो कृषि पर आधारित आबादी आर्थिक उन्नयन के मामले में बाकी आबादी से तेजी से पिछड़ती जा रही है. शायद यही वजह है कि खेती के काम में लगा परिवार अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर शहर भेज देना चाहता है, जिससे कि वह खेती छोड़ कर कोई और काम करे.
सवाल यह है यदि देश की 75 फीसदी आबादी बाकी 25 फीसदी की तुलना में तेजी से पिछड़ती जायेगी, तो क्या देश को तेजी से आर्थिक प्रगति करनेवाला माना जाना चाहिए?
पटना में 25 जुलाई को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कृषि क्षेत्र पर विशेष चिंता जाहिर की और प्रति हेक्टेयर फसल की उपज बढ़ाने की जरूरत पर जोर दिया.
उन्होंने कृषि क्षेत्र में होनेवाली बरबादी पर चिंता जतायी. किसानों की आय को बढ़ाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन की बात कही. उन्होंने वैज्ञानिकों से कहा कि देश को अन्न आयात की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए.
यदि केंद्र सरकार खेती-किसानी पर ध्यान दे रही है, तो यह अच्छी बात है, लेकिन क्या इतने से काम चल जायेगा? हर सरकार उपज बढ़ाने की बात करती है, खाद्य प्रसंस्करण और मूल्यवर्धन की बात करती है, किसानों की बेहतरी की बात करती है, किसानों को सस्ते दरों पर ऋण मुहैया कराने की बात करती है, सिंचाई सुविधाएं बढ़ाने की बात करती है, बिजली व डीजल सस्ते दरों पर देने की बात करती है, किसानों की ऋण माफी की बात करती है, फिर भी कृषि क्षेत्र पिछड़ता जा रहा है. ज्यादातर किसानों की हालत खराब होती जा रही है, गांव से शहरों की ओर पलायन बढ़ता ही जा रहा है.
क्यों?
क्योंकि फसलों, उन पर आनेवाली लागत, संभावित खपत, उनके बाजार मूल्य और किसान को मिलनेवाले रिटर्न पर न देश स्तर पर कोई प्लान होता है, न क्षेत्रीय स्तर पर और न ही जिला और ब्लॉक स्तर पर.
मौसम एडवाइजरी, जिलों के कृषि विज्ञान केंद्रों और कृषि विवि द्वारा उन्नत बीज दिये जाने तथा मृदा परीक्षण रिपोर्ट तैयार के अलावा किसानों को कोई ऐसी जानकारी नहीं मिलती है, जिसके आधार पर फसल प्लानिंग की जा सके.
गन्ने का उदाहरण लीजिए- दक्षिण अमेरिका में चीनी की लागत हमारे यहां से बहुत कम है, लिहाजा निर्यात बाजार में हमारी जगह नहीं है, फिर भी हमारे किसान गन्ना बोते रहते हैं, क्योंकि चीनी मिलों को चलाना है.
मिल मालिक इसी आधार पर कम दाम देते हैं और सरकार से मदद तक लेते हैं, लेकिन किसान एक-दो परसेंट के फायदे पर गन्ना बेचने को मजबूर रहता है. कहीं कोई सुनवाई तक नहीं होती.
गन्ने का सरकारी दाम लागत मूल्य के बराबर या उससे कम ही रहता है. आलू, टमाटर, गेहूं, धान आदि सबका यही हाल है. उत्पादन बंपर हुआ तो किसान को नुकसान और कम हुआ तो किसान को नुकसान. बंपर होने पर दाम गिर जाते हैं और कम होने पर लागत निकलनी मुश्किल हो जाती है. ऐसा किसी और क्षेत्र में सुना है क्या? अब ऐसे में प्रगति के सभी सपने बेमानी ही कहे जायेंगे.
..और अंत में
खेती-किसानी-गांव की बात हो रही है. मैथिली शरण गुप्त ने किसानों का बहुत अच्छा चित्रण अपनी कविता में किया है, जो 50 से ज्यादा साल गुजर जाने के बाद भी हमारे किसानों पर सटीक बैठता है-
हेमंत में बहुदा घनों से पूर्ण रहता व्योम है
पावस निशाओं में तथा हंसता शरद का सोम है
हो जाये अच्छी भी फसल, पर लाभ कृषकों को कहां
खाते, खवाई, बीज ऋण से हैं रंगे रक्खे जहां
आता महाजन के यहां वह अन्न सारा अंत में
अधपेट खाकर फिर उन्हें है कांपना हेमंत में
बरसा रहा है रवि अनल, भूतल तवा सा जल रहा है चल रहा सन-सन पवन, तन से पसीना बह रहा देखो कृषक शोषित, सुखाकर हल तथापि चला रहे
किस लोभ से इस आंच में, वे निज शरीर जला रहे
घनघोर वर्षा हो रही, है गगन गर्जन कर रहा
घर से निकलने को गरज कर, वज्र वर्जन कर रहा
तो भी कृषक मैदान में करते निरंतर काम हैं
किस लोभ से वे आज भी, लेते नहीं विश्रम हैं
बाहर निकलना मौत है, आधी अंधेरी रात है
शीत कैसा पड़ रहा, औ’ थरथराता गात है
तो भी कृषक ईंधन जलाकर, खेत पर हैं जागते
यह लाभ कैसा है, न जिसका मोह अब भी त्यागते
सम्प्रति कहां क्या हो रहा है, कुछ न उनको ज्ञान है वायु कैसी चल रही, इसका न कुछ भी ध्यान है
मानो भुवन से भिन्न उनका, दूसरा ही लोक है
शशि सूर्य हैं फिर भी कहीं, उनमें नहीं आलोक है.
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