सादगी की प्रतिमूर्ति

Published at :29 Jul 2015 12:10 AM (IST)
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सादगी की प्रतिमूर्ति

रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक मशहूर कविता है ‘स्टॉपिंग बाय वुड्स ऑन ए स्नोवी इवनिंग’. कहते हैं पंडित नेहरू के निधन के बाद उनकी मेज पर कांच के नीचे इस कविता की अंतिम चारपंक्तियां लिखी मिली थीं. इन पंक्तियों का हरिवंश राय बच्चन का किया अनुवाद आज भी लोगों की जुबान से सुनने को मिल जाता […]

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रॉबर्ट फ्रॉस्ट की एक मशहूर कविता है ‘स्टॉपिंग बाय वुड्स ऑन ए स्नोवी इवनिंग’. कहते हैं पंडित नेहरू के निधन के बाद उनकी मेज पर कांच के नीचे इस कविता की अंतिम चारपंक्तियां लिखी मिली थीं. इन पंक्तियों का हरिवंश राय बच्चन का किया अनुवाद आज भी लोगों की जुबान से सुनने को मिल जाता है.
‘सुघन, मनोहर, सुंदर तरुवर, अक्सर मुङो बुलाते हैं/किंतु किये जो वादे मैंने, याद मुङो आ जाते हैं/अभी कहां आराम बदा, यह मूक निमंत्रण छलना है/और अभी तो मीलों मुझको, मीलों मुझको चलना है.’ नेहरू की तरह डॉक्टर एपीजे अब्दुल कलाम को राबर्ट फ्रास्ट की यह कविता पसंद थी या नहीं, यह तो दावे के साथ नहीं कहा जा सकता, लेकिन एक बात बेखटके कही जा सकती है. तेज कदमों से चलने के अभ्यस्त नेहरू जैसे अपनी तेज चाल से समय की रफ्तार को मात देना चाहते थे और निरंतर भारत-निर्माण के अपने स्वप्न के पीछे दौड़ते थे, कलाम साहब का जीवन भी वैसी ही मिसाल है.
एक मंजिल के बाद कोई दूसरी मंजिल लगातार उन्हें बुलाती रही. विश्रम उन्हें भी नहीं बदा था, मीलों उन्हें भी चलना था और आखिरी वक्त तक कलाम साहब काल से होड़ लेते हुए अपने स्वप्न के पीछे भागते रहे.
देश के सर्वोच्च पद से रिटायर होने के बाद के पहले साल का उनका रिकार्ड सार्वजनिक महत्व के पद पर बैठे किसी हस्ती के लिए ही नहीं, आम नागरिक तक के लिए अपने आप में नजीर है. राष्ट्रपति के पदभार से मुक्त होकर शुरुआती 227 दिनों में कलाम साहब ने 180 सभाओं को संबोधित किया, 11 राज्यों के दौरे पर गये और अमेरिका, ब्रिटेन तथा इजरायल सहित कुल छह मुल्कों में अलग-अलग विषयों पर व्याख्यान दिये.
इस दौरान उनका कर्मक्षेत्र शैक्षिक संस्थानों तक सीमित नहीं रहा, उसके दायरे में जहां नास्कॉम और स्पेस सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस को संबोधित करना शामिल था, वहीं कन्या भ्रूणहत्या व स्पेशल इकोनॉमिक जोन जैसे विषयों पर विशेषज्ञों और आम नागरिकों को जागरूक करना भी. शिलांग में ऐन व्याख्यान के बीच हृदयघात की क्रूर चपेट में आने से पहले तक का लम्हा गवाह है कि कलाम साहब की यह सक्रियता आमरण बनी रही.
अनथक जीवन और विविध-विशाल कर्मक्षेत्र में सक्रियता उन्हीं लोगों को हासिल हो पाती है, जो जीवन की विविधता का समाहार किसी एकता में करना जानते हों. कलाम साहब के लिए जीवन की विविधता के बीच एकता स्थापित करने का सूत्र विज्ञान था.
धर्म-ज्ञान की पुस्तकों को पढ़ने और वीणा बजाने जैसा गहन एकांत का क्षण हो या फिर दुनिया की जहीन हस्तियों के बीच विश्व की समस्याओं पर राय रखने और समाधान विचारने का शोरगुल से भरा सार्वजनिक क्षण, कलाम साहब के अंतरतम में एक वैज्ञानिक हमेशा जागते रहता था.
एक वैज्ञानिक, जिसके भीतर जगत के लिए करुणा भरी थी. यह वैज्ञानिक जानता था कि विचार को कोई आवरण या लिबास पसंद नहीं होता और इस वैज्ञानिक को यह भी पता था कि भीतर की लय सध गयी हो तो बाहर की कोई भी बेतरतीबी सहज ही सध जाती है.
शायद इसी कारण इस मीडियामुखी समय में जब सार्वजनिक जीवन का सारा जोर छवियों को रचने और चमकाने पर केंद्रित है, कलाम साहब को हम प्रभाव जमाने की जीवनशैली के अनुरूप धारण की जानेवाली वेशभूषा या विशिष्ट भावमुद्रा के कारण नहीं, बल्कि हमेशा मुस्कान बिखेरती, सादगी की एक प्रतिमूर्ति के रूप में याद कर पा रहे हैं.
ऐसी सादगी, जो बच्चों और विशेषज्ञों का दिल समान रूप से जीत लेती थी और अपने ऊपर विशिष्टता के इस गर्व को हावी नहीं होने देती थी कि देश ने उसे ‘मिसाइल मैन’ और ‘भारत-रत्न’ जैसा तमगा पहना रखा है.
कलाम साहब की सादगी के सैकड़ों किस्से मशहूर हैं और ये सारे किस्से बस एक ही बात कहते हैं कि निजी जीवन की ऊंचाइयां चढ़ते हुए सारी दुनिया को बराबरी के भाव से देखना वे कभी नहीं भूले. बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के एक समारोह में वे मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित थे.
मंच पर कलाम साहब अपनी कुर्सी पर नहीं बैठे, क्योंकि वह बाकी कुर्सियों से बड़ी थी. उनकी सादगी के बारे में एक किस्सा यह भी है कि राष्ट्रपति बनने के बाद जब वे केरल के अपने पहले दौरे पर वहां के राजभवन पहुंचे, तो त्रिवेंद्रम (तिरुअनंतपुरम) की एक सड़क के किनारे बैठनेवाले एक मोची और एक साधारण से ढाबे के मालिक को अपने अतिथि के तौर पर राजभवन बुलाया.
उन्होंने याद रखा था कि बतौर वैज्ञानिक त्रिवेंद्रम में काम करते हुए उनके निजी जीवन और जरूरतों की पूर्ति में ये दोनों कभी मददगार रहे थे. शायद उनकी यह सादगी सत्तावर्ग के लिए एक संदेश थी कि अभाव और गरीबी का जीवन जीनेवाला व्यक्ति भी अपनी गरिमा में सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति के बराबर है.
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