सड़क पर भटकते बच्चों का संरक्षण

Published at :12 Jul 2015 11:12 PM (IST)
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सड़क पर भटकते बच्चों का संरक्षण

शहर के फुटपाथों से लेकर बस अड्डों, मंदिरों, चाय-पान की दुकानों, रेलवे स्टेश समेत कई प्रमुख सार्वजनिक स्थलों के आसपास हम अक्सर भीख मांगते, कचरा बीनते अर्धनग्न बच्चों को घूमते हुए देखते हैं. फटेहाल इन रात में बच्चों का आशियाना मंदिरों की चौखटों, झुग्गी-झोपड़ियों, रेल के प्लेटफॉर्म्स और रेल की पटरियों के आसपास होता है, […]

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शहर के फुटपाथों से लेकर बस अड्डों, मंदिरों, चाय-पान की दुकानों, रेलवे स्टेश समेत कई प्रमुख सार्वजनिक स्थलों के आसपास हम अक्सर भीख मांगते, कचरा बीनते अर्धनग्न बच्चों को घूमते हुए देखते हैं. फटेहाल इन रात में बच्चों का आशियाना मंदिरों की चौखटों, झुग्गी-झोपड़ियों, रेल के प्लेटफॉर्म्स और रेल की पटरियों के आसपास होता है, जबकि दिन में एक स्थान से दूसरे स्थान तक भटकना ही इनकी नियति है.
बीच सड़क या फिर चौराहों पर हाथ फैलाये भीख मांगने के लिए ये बच्चे खड़े हो जाते हैं, जिन्हें न जान जाने का भय सताता है और न ही धूप या ठंड की मार. कुछ बच्चे गलियों या सड़कों के किनारे कचरा बीनते नजर आते हैं.
जगह-जगह लगे सरकारी विभाग के नलों या चापानलों से इनकी प्यास बुझती है, तो भूख न जाने कैसे मिटती होगी. इन्हें देख कर मन में कई सवाल पैदा होते हैं. कौन हैं ये बच्चे, जो लोगों के आगे हाथ फैलाये खड़े रहते हैं? इस सवाल का एक ही जवाब मिलता है कि यही तो हैं गरीब भारत के अनमोल बच्चे.
गरीब अभिभावकों की परवरिश से महरूम ये बच्चे जीवन के पहले पायदान से ही अपना पेट भरने के लिए उन सड़कों, गलियों व रेलवे स्टेशनों आदि की खाक छानते नजर आते हैं, जहां पेट की ज्वाला शांत करने की उम्मीद की किरण दिखायी देती है.
पेट की धधकती आग को बुझाते-बुझाते ये बच्चे कब अपराध की दुनिया में कदम रख देते हैं, इसका पता खुद उन्हें भी नहीं चलता. मन में दोबारा सवाल पैदा होता है कि आखिर इन बच्चों के भविष्य का दोषी कौन है? पैदा करनेवाले अभिभावक, नियति, समाज या फिर सरकार? इन भटकते बच्चों को संरक्षण की दरकार है.
अनुराग मिश्र, पिस्का मोड़, रांची
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