सच जिसे हम अनदेखा करते हैं

Published at :06 Jul 2015 5:38 AM (IST)
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सच जिसे हम अनदेखा करते हैं

एमजे अकबर प्रवक्ता, भाजपा कहने का अर्थ यह नहीं है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने गरीबी से लड़ने के लिए कोई कोशिश नहीं की. उन्होंने प्रयास किया था. परंतु जो अंतर है, वह गरीबी घटाने और गरीबी मिटाने में त्वरा और स्तर का है. भूखे लोगों ने बहुत लंबा इंतजार किया है. आधा हिंदुस्तान भूख और […]

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एमजे अकबर
प्रवक्ता, भाजपा
कहने का अर्थ यह नहीं है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने गरीबी से लड़ने के लिए कोई कोशिश नहीं की. उन्होंने प्रयास किया था. परंतु जो अंतर है, वह गरीबी घटाने और गरीबी मिटाने में त्वरा और स्तर का है. भूखे लोगों ने बहुत लंबा इंतजार किया है.
आधा हिंदुस्तान भूख और भूखमरी के बीच फंसा हुआ है. आबादी का ऊपरी पांचवां हिस्सा आत्मसंतोष के बुलबुले के भीतर मस्त है. दोनों तरफ से दबा हुआ मध्य वर्ग भ्रमित और अनिश्चितता में है, तथा टीवी धारावाहिकों की खुराक पर जिंदा महत्वाकांक्षाओं और सड़क पर हो रहे विरोधों के बीच बुरी तरह झूल रहा है.
ये 2015 में भारत के सच हैं, जो सामाजिक-आर्थिक जनगणना से निकले हैं. हर तीन में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है : इसकी तुलना आप अफ्रीका के उप-सहारा क्षेत्र से करें, जहां हर पांच में से एक बच्चा कुपोषण का शिकार है. ग्रामीण परिवारों में से 92 फीसदी हिस्से की मासिक आय 10 हजार रु पये से कम है. यह परिवारों का आंकड़ा है, व्यक्तियों का नहीं. इस आंकड़े को और उघाड़ें : करीब 75 फीसदी परिवार पांच हजार रुपये मासिक से कम पर गुजारा करते हैं.
पूरे सर्वेक्षण में ऐसे आंकड़े भरे पड़े हैं. हर आंकड़ा दूसरे आंकड़े से अधिक विचिलत करनेवाला है. अगर आप चाहें तो पहले से तुलना कर झूठा भरोसा पा सकते हैं : हमें जानकारी दी जाती है कि बच्चों में कुपोषण कम हुआ है, यह 45.1 फीसदी से घट कर 30.7 फीसदी पर आ गया है, लेकिन उस हर तीसरे (कुपोषित) बच्चे के सामने यह एक मूर्खतापूर्ण संख्या है.
पिछले साल के आम चुनाव से पहले यूपीए सरकार ने बड़े जोशो-खरोश से यह झूठ परोसने की कोशिश की थी कि देश की महज 30 फीसदी आबादी अब गरीबी रेखा से नीचे रह गयी है. यह दावा चुनावी राजनीति में भुनाने के लिए किया गया हेर-फेर था क्योंकि दिखाने लायक आंकड़े बताने के लिए गरीबी रेखा में ही बदलाव कर दिया गया था.
हम किसी संकट के कगार पर नहीं, बल्कि तबाही के सामने खड़े हैं, अगर हम अपने देश के सामाजिक न्याय और आर्थिक स्वास्थ्य के मानकों की तुलना 1947 से न करके जहां से हमारी यात्रा शुरू हुई थी, वहां से करें जहां हमें 2015 में पहुंच जाना था. अपने अधिकारों के प्रति सजग लोग अब पीढ़ियों तक इंतजार नहीं करेंगे : भोजन और रोजगार आधुनिक लोकतंत्र की बुनियादी जरूरतें हैं.
भूख क्रोध का सबसे ताकतवर कारण है. दुनिया उप-सहारा अफ्रीका को गरीबी का पैमाना मानती है. यह भ्रम है. हमारा दक्षिण एशियाई उपमहाद्वीप गरीबी का सांचा है. हमें दूसरों के यहां झांकना पसंद है. पर हमें आईना देखने की जरूरत है.
इससे असुविधा होगी, और अगर आपमें चेतना है, तो आप क्रोधित होंगे. लेकिन आश्वस्त होने के दो कारण हैं. इन आंकड़ों को संवाददाता सम्मेलन में प्रस्तुत करते हुए वित्त मंत्री अरु ण जेटली ने तथ्यों पर किसी बहानेबाजी से इनकार कर दिया. किसी समस्या के समाधान की पहली सीढ़ी उसका होना स्वीकार करना है. यह देखना भी सुखद रहा कि तथ्यों को नाटक बना कर पेश करने की आरोपित मीडिया ने इस सच के आयामों को समझा. अखबारों ने पहले पन्ने पर इसे मुख्य खबर बनाया.
जिस दिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने सर्वेक्षण से जुड़ी कई खबरें छापीं, उसी दिन अंदर के एक पन्ने पर खबर लगायी, भारतीय किशोरों में मोटापा बढ़ा. विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, पिछले पांच वर्षो में मोटे किशोरों की संख्या 13 से बढ़ कर 29 फीसदी हो गयी है. मैं रिपोर्ट से दो पंक्तियां दे रहा हूं : शहरी भारत में डेढ़ करोड़ से अधिक बच्चों का वजन सामान्य से अधिक है. हालांकि ग्रामीण भारत में स्थिति बहुत नीचे है. इस पर बहुत सोचने की आवश्यकता नहीं है कि ऐसा क्यों है. ग्रामीण भारत के पास फाजिल पैसा नहीं है कि वह शहरों की तरह हैमबर्गर खा सके.
गरीबी ऐसी समस्या नहीं है जो बतकही को जवाब मान ले, वह समाधान मांगती है. तीन कार्यक्रम ऐसे हैं, जिनसे उम्मीद बनती है : व्यापक स्तर पर आवास, शहरी पुनरुद्धार और स्मार्ट शहरों की परियोजनाएं. ये सिर्फ देश के शहरी मानचित्र को फिर से डिजाइन करने की कोशिशें नहीं हैं. इनसे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होगा क्योंकि कंस्ट्रक्शन गरीबों के लिए सबसे बड़ा रोजगार प्रदाता है.
बीमा योजनाएं, जिनमें 12 रु पया तक प्रीमियम है, राज्य की ओर से की गयी सकारात्मक पहलें हैं. शौचालय बनाने जैसी सम्मान योजनाएं जीवन स्तर को तुरंत बदलने की क्षमता रखती हैं. भारतीय राज्य अब तक या तो उदासीन रहा है या फिर अनुचित रूप से दखल देनेवाला. इसे समावेशी बनना होगा.
कहने का अर्थ यह नहीं है कि पूर्ववर्ती सरकारों ने गरीबी से लड़ने के लिए कोई कोशिश नहीं की. उन्होंने प्रयास किया था. परंतु जो अंतर है, वह गरीबी घटाने और गरीबी मिटाने में त्वरा और स्तर का है.
भूखे लोगों ने बहुत लंबा इंतजार किया है, मुट्ठी भर अभिजात्यों के हाथों में धन का संग्रहण क्रोध- विद्रोह की बेचैनी को जन्म दे रहा है. संचार के व्यापक विस्तार के युग में आप विषमता व पक्षपात छुपा कर नहीं रख सकते हैं. गरीब इतिहास के प्रतीक्षालय में बहुत दिन रह चुका है. उसे रोजगार, शिक्षा, न्याय, सम्मान चाहिए, अन्यथा उसका क्रोध बिफर पड़ेगा.
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