यात्रा से उम्मीदें

Published at :06 Jul 2015 5:35 AM (IST)
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यात्रा से उम्मीदें

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस और पांच देशों की आठ दिवसीय यात्रा कई अर्थों में महत्वपूर्ण है. इस यात्रा से इन देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों की बेहतरी के साथ मध्य एशिया से भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी प्रगाढ़ होने की उम्मीद है. रूस और भारत लंबे समय से सबसे भरोसेमंद सहयोगी […]

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस और पांच देशों की आठ दिवसीय यात्रा कई अर्थों में महत्वपूर्ण है. इस यात्रा से इन देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों की बेहतरी के साथ मध्य एशिया से भारत के राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक जुड़ाव भी प्रगाढ़ होने की उम्मीद है.
रूस और भारत लंबे समय से सबसे भरोसेमंद सहयोगी रहे हैं, परंतु दोनों देशों के बीच सात बिलियन डॉलर का व्यापार अपेक्षाओं और संभावनाओं की दृष्टि से बहुत ही कम है. यही बात आठ बिलियन डॉलर के परस्पर निवेश के साथ भी है.
इसकी तुलना में भारत का व्यापार और निवेश उन देशों के साथ अधिक है जिनके साथ हमारे राजनीतिक और राजनयिक रिश्ते रूस के बरक्स जटिल और तनावपूर्ण रहे हैं. ऐसे देशों में अमेरिका, चीन और जापान शामिल हैं. उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्केमेनिस्तान, किर्गिजस्तान व ताजिकिस्तान के साथ भारत के सदियों पुराने सांस्कृतिक संबंध हैं और इन देशों में भारत का बड़ा सम्मान है.
लेकिन आर्थिक मोर्चे पर मौजूदा रिश्ते निराशाजनक हैं. इन देशों और भारत के बीच व्यापारिक संबंध का आंकड़ा करीब 1.5 बिलियन डॉलर है. प्रधानमंत्री की यात्रा के दौरान रूस के भारतीय रक्षा क्षेत्र में बड़े निवेश की उम्मीद है जिसका आधार रक्षा क्षेत्र में 49 फीसदी के विदेशी निवेश का निर्णय है.
मध्य एशिया के इन पांच देशों के साथ भारत प्राकृतिक गैस, खनिज, धातु, कृषि उत्पाद, दवाइयों, वस्त्र व रसायन जैसे क्षेत्र में नये व्यापारिक अवसरों की तलाश कर सकता है. कई वर्षों से उत्तर-दक्षिण यातायात गलियारा बनाने के प्रयास हो रहे हैं. करीब 5,600 किमी लंबे रास्ते से जल मार्ग, रेल और सड़क के द्वारा भारत, ईरान, अजरबैजान और रूस के बीच माल ढुलाई की जा सकती है. इन देशों के बड़े व्यापारिक शहरों व बंदरगाहों को जोड़ने की इस योजना पर भी महत्वपूर्ण घोषणाओं की संभावना है.
मध्य एशिया भारतीय दृष्टिकोण से इसलिए और अधिक जरूरी हो जाता है कि पिछले एक दशक में ही चीन ने इस क्षेत्र में करीब 33 बिलियन डॉलर का निवेश किया है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति व अर्थव्यवस्था में भारत की उपस्थिति को मजबूत करने के लिए इस क्षेत्र पर ध्यान देना जरूरी है. वर्ष 1991 में स्वतंत्र हुए इन देशों की एक साथ होनेवाली भारतीय प्रधानमंत्री की यह पहली यात्रा इस बात का संकेत है कि भारत इस स्थिति के प्रति गंभीर है.
इस यात्रा की छोटी उपलब्धियां भी खास होंगी क्योंकि यह तो बस एक शुरु आत ही है. इस यात्रा के दौरान मोदी ब्रिक्स सम्मेलन और शंघाई को-ऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन की बैठक में भी भाग लेंगे. ऐसे में इस यात्रा से सकारात्मक परिणामों की उम्मीद की जा सकती है.
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