डॉलर के एकाधिकार से पैदा हुआ संकट
Published by :Prabhat Khabar Digital Desk
Published at :03 Jul 2015 5:43 AM (IST)
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मोहन गुरुस्वामी अर्थशास्त्री विलासिता और फिजूलखर्ची का पूंजीवाद हमारा निर्देशक सिद्धांत नहीं हो सकता है. जितनी जल्दी हो सके, इसे छोड़ कर एक ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए, जो ज्यादा संवेदनशील और बुद्धिमान हो और जो सभी देशों के लिए अनुकूल हो.लंदन में एक संबोधन में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने चेतावनी दी कि […]
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मोहन गुरुस्वामी
अर्थशास्त्री
विलासिता और फिजूलखर्ची का पूंजीवाद हमारा निर्देशक सिद्धांत नहीं हो सकता है. जितनी जल्दी हो सके, इसे छोड़ कर एक ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए, जो ज्यादा संवेदनशील और बुद्धिमान हो और जो सभी देशों के लिए अनुकूल हो.लंदन में एक संबोधन में रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन ने चेतावनी दी कि वैश्विक अर्थव्यवस्था ‘धीरे-धीरे’ 1930 के दशक में अमेरिका और यूरोप में छायी महामंदी जैसी समस्याओं की ओर बढ़ रही है.
राजन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुख्य अर्थशास्त्री रह चुके हैं और वे उन कुछ लोगों में एक हैं, जिन्होंने 2007 के आर्थिक संकट की सटीक भविष्यवाणी की थी, जिसकी अनदेखी कर अमेरिका ने भारी कीमत चुकायी. उनके विचारों के प्रतिवाद में आइएमएफ द्वारा निकाले गये दस्तावेज में कहा गया है कि केवल मौद्रिक नीति में ढील को ही वित्तीय अस्थिरता के लिए जिम्मेवार नहीं माना जा सकता और 2007-09 समेत पूर्व की सभी वैश्विक मंदी की बड़ी वजह ‘एक ऐसे विनियामक ढांचे की कमी थी, जो वित्तीय स्थिरता कायम रख सके.’ राजन तथा आइएमएफ दोनों एक गौण मसले पर केंद्रित हैं.
आइए, हम एक द्वीप पर रह रहे ऐसे छोटे समूह के सदस्य के रूप में खुद की कल्पना करें, जिसके सदस्यों को विभिन्न काम सौंपे गये हैं. चूंकि इस व्यवस्था में हर कोई अपनी इच्छा से उत्पादन कर सकता है, इसलिए रुपये छापनेवाला सबसे सुखी रहेगा, क्योंकि वह व्यक्ति मनचाही चीज हासिल कर सकता है, क्योंकि वह उनके बदले रुपये दे सकता है.
अब हम इसे थोड़ा आगे ले चलें.जिन निर्माताओं के पास जरूरत से ज्यादा कागज हैं, वे भंडारण के लिए उसे उस व्यक्ति के पास छोड़ने लगते हैं, जो उन पर छपाई करता है. वर्ष 1900 में वैश्विक जीडीपी केवल 1.01 ट्रिलियन डॉलर था, जिसे चार गुना होने में आधी सदी का समय लगा. किंतु, 1971 के बाद तब इसने बड़ी छलांग लगायी, जब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने डॉलर को अंतरराष्ट्रीय स्वर्णमानक से अलग करने की एकतरफा घोषणा कर दी.
वर्ष 2013 में 37.7 ट्रिलियन डॉलर के कुल विश्व व्यापार में हांगकांग समेत चीन का हिस्सा सबसे बड़ा, यानी 5.31 ट्रिलियन डॉलर का रहा. पांच सबसे बड़े व्यापारी देशों का इसके आधे हिस्से पर कब्जा रहा और अमेरिका, जर्मनी तथा जापान ने मिल कर इसके एक चौथाई हिस्से का व्यापार किया. यदि अमेरिका और यूरोपियन यूनियन को लें, तो इन दोनों का भी इस व्यापार के चौथे हिस्से पर अधिकार रहा.
वर्ष 2014 की दूसरी तिमाही में विश्व का कुल सुरक्षित कोष 12 ट्रिलियन डॉलर का था, जिसमें 60.7 फीसदी अमेरिकी डॉलर में, 24.2 फीसदी यूरो में, 4 फीसदी येन में और 3.9 फीसदी ब्रिटिश पाउंड में था. लगभग यह कोष विभिन्न देशों द्वारा बांड्स में रखा जाता है, जिस पर कम ब्याज मिलता है.
अमेरिका का कुल सुरक्षित कोष 139 अरब डॉलर का है. इसकी तुलना भारत के 298 अरब डॉलर और चीन के 4,055 अरब डॉलर के सुरक्षित कोष से करें, तो समझ में आ जायेगा कि चीन का अमेरिका में कितना निवेश है और चीन के आपत्तिजनक व्यवहारों को अमेरिका द्वारा नियंत्रित कर पाने की संभावनाएं कितनी कम हैं.
1995 में विश्व की अग्रणी आर्थिक शक्तियों के पास कुल विदेशी मुद्रा भंडार का 67 फीसदी था, जिसमें से 82 फीसदी आवंटित रूप से सुरक्षित था. 2011 तक यह पूरी तरह उलट गया और उभरती व विकासशील अर्थव्यवस्थाओं ने इस भंडार के 67 फीसदी हिस्से पर कब्जा कर लिया, जबकि इसका 39 फीसदी से भी कम ही आवंटित था.
ऐसे में सारी दुनिया इस उद्देश्य से अमेरिका में निवेश करती है कि इसके बदले वह ठाठ से खर्च कर सके. जब यह निवेश कुछ कम हो जाता है, तो वह कुछ और डॉलर छाप देता है, जिसे बाकी दुनिया खुशी से ले लेती है.
जब कभी अपने आंतरिक विरोधाभासों और आर्थिक कुप्रबंधन की वजह से अमेरिकी अर्थव्यवस्था रुग्ण होती है, तो पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था डगमगाने लगती है, क्योंकि अमेरिका सर्वाधिक आयात करनेवाला देश है और सारी दुनिया अपने पैसे वहीं रखती है.
यह व्यवस्था वास्तव में कैसे काम करती है? चीन और भारत जैसे देश कम लागत पर सामान व सेवाएं उत्पादित करते हैं, ताकि अमेरिका उनका उपभोग कर सके. अमेरिका इसके बदले उन्हें डॉलर में भुगतान करता है, जिसे वे वापस अमेरिका में ही निवेश कर देते हैं. चूंकि पैसा शांत बैठा नहीं रह सकता, इसलिए अमेरिकी बैंक यह पैसा अमेरिकी नागरिकों को ही कर्ज के रूप में देते हैं, जहां आज विश्व में प्रतिव्यक्ति कर्जखोरी की दर सबसे ज्यादा है.
अमेरिकी इसे निजी खर्च में उड़ाते हैं, जिन्हें हासिल करने की वास्तविक आर्थिक क्षमता उनके पास नहीं होती है. चीन, रूस, जापान, कुवैत, भारत एवं अन्य देश अमेरिकी प्रतिभूतियों में अपना निवेश करते ही रहते हैं, जिनमें उन्हें ज्यादातर 1-2 प्रतिशत का ब्याज मिला करता है. दुर्भाग्य से, ऐसा कोई विनियामक प्राधिकार नहीं रहा है, जो अमेरिका को सावधान या बदलने को बाध्य कर सके.
1944 में लार्ड कीन्स ने एक अंतरराष्ट्रीय सुरक्षित मुद्रा बनाने की सलाह दी थी, पर अमेरिका ने इसे होने नहीं दिया. तब अमेरिकी दूसरे विश्वयुद्ध के बाद मुद्रास्फीति के दबावों से ज्यादा चिंतित थे और उन्होंने व्यापार असंतुलन को केवल आर्थिक घाटा ङोल रहे देशों की समस्या के रूप में देखा. किंतु स्वयं दशकों तक सर्वाधिक आर्थिक घाटे का देश रहते हुए भी अमेरिका उससे बेपरवाह रहा, आइएमएफ के ध्यान से अछूता रहा. यही विश्व की सारी आर्थिक समस्याओं की जड़ है.
एक मानक तथा आइएमएफ के विनियामक क्रियाकलाप के अभाव के साथ रीगन तथा थैचर युग में बड़े निजी बैंकों को खुली छूट दे दी गयी, जिसके फल हम भुगत रहे हैं. अमेरिका तथा इसके नागरिकों की फिजूलखर्ची के लिए सस्ते ऋणों का लगभग अनंत भंडार है. अमेरिका का बढ़ता जाता वार्षिक व्यापार घाटा चीन तथा आसियान देशों जैसी बहुत-सी अर्थव्यवस्थाओं के लिए विकास के इंजन का काम करता है.
शीतयुद्ध के बाद ब्राजील, चीन और भारत जैसी कई आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों का उदय हुआ है. इनमें से हर एक देश आज प्रमुख आर्थिक भूमिका में है और कुछ का जीडीपी तो जी-7 के कई देशों से भी ज्यादा है.
चौथाई सदी बाद ब्रिक्स देश मिलकर जी-7 के सम्मिलित जीडीपी से आगे निकल जायेंगे. फिर भी विकास के इन्हीं पांच इंजनों पर यह भी निर्भर है कि वे विश्व आर्थिक प्रणाली में अधिक सुव्यवस्था ला सकें. विलासिता और फिजूलखर्ची का पूंजीवाद हमारा निर्देशक सिद्धांत नहीं हो सकता है.
जितनी जल्दी हो सके, इसे छोड़ कर एक ऐसी व्यवस्था अपनानी चाहिए, जो ज्यादा संवेदनशील और बुद्धिमान हो और जो केवल अमेरिका के लिए नहीं, बल्कि अन्य देशों के लिए भी अनुकूल हो. यही वक्त है, जब एक वैश्विक सुरक्षित मुद्रा के सृजन तथा उसके नियमन और प्रबंधन के लिए लार्ड कीन्स के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.
(अनुवाद : विजय नंदन)
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