सत्ता की अकूत ताकत तले ढहते संस्थान

Published at :27 Jun 2015 5:36 AM (IST)
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सत्ता की अकूत ताकत तले ढहते संस्थान

पुण्य प्रसून वाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार मौजूदा वक्त भारतीय राजनीति के लिए इसलिए नायाब है, क्योंकि जनादेश के घोड़े पर सवार मोदी सरकार ने अपना कद हर उस साथी को दबा कर बड़ा करने की कवायद से शुरू की, जो जनादेश दिलाने में साथ रहा. एक वक्त सीबीआइ, सीवीसी और सीएजी सरीखे संवैधानिक संस्थानों की साख […]

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पुण्य प्रसून वाजपेयी
वरिष्ठ पत्रकार
मौजूदा वक्त भारतीय राजनीति के लिए इसलिए नायाब है, क्योंकि जनादेश के घोड़े पर सवार मोदी सरकार ने अपना कद हर उस साथी को दबा कर बड़ा करने की कवायद से शुरू की, जो जनादेश दिलाने में साथ रहा.
एक वक्त सीबीआइ, सीवीसी और सीएजी सरीखे संवैधानिक संस्थानों की साख को लेकर आवाज उठी थी. वह दौर मनमोहन सिंह का था और आवाज उठानेवाले बीजेपी के वही नेता थे जो आज सत्ता में हैं. और अब प्रधानमंत्री मोदी की सत्ता के आगे नतमस्तक होते तमाम संस्थानों की साख को लेकर कांग्रेस समेत समूचा विपक्ष ही सवाल उठा रहा है.
तो क्या आपातकाल के 40 बरस बाद संस्थानों के ढहने और राजनीतिक सत्ता की अकूत ताकत के आगे लोकतंत्र की परिभाषा भी बदल रही है? देश में राजनीतिक सत्ता की अकूत ताकत के आगे क्यों कोई संस्था काम कर नहीं सकती? क्योंकि इसी दौर में भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को लेकर संसद की स्टैंडिंग कमेटी बेमानी साबित की जानी लगी. संसद के ऊपरी सदन को सरकार के कामकाज में बाधा माना जाने लगा.
कॉरपोरेट पूंजी के आसरे हर संस्थान को विकास से जोड़ कर एक नयी परिभाषा तय की जाने लगी. कामगार यूनियनें बेमानी करार दे दी गयीं. किसानों से जुड़े सवाल विकास की योजनाओं के सामने कैसे खारिज हो सकते हैं, यह आर्थिक सुधार के नाम पर खुल कर उभरा. सत्ताधारी के सामने नौकरशाही चूहे में बदलती दिखी.
यह सब झटके में हो गया, ऐसा भी नहीं है. बल्कि आर्थिक सुधार के बाद देश को जिस रास्ते पर लाने का प्रयास किया गया, उसमें भारत की विवधता को पूंजी के धागे में कुछ इस तरह पिरोने की कोशिश शुरू हुई कि देश के विकास या उसके बौद्धिक होने तक को मुनाफा से जोड़ा जाने लगा.
असर इसी का है कि विदेशी पूंजी के बगैर भारत में कोई उत्पाद बन नहीं सकता है- यह संदेश जोर-शोर से दिया जाने लगा. लेकिन संकट तो इसके भी आगे का है. भारत को लेकर जो समझ संविधान या राष्ट्रगीत या राष्ट्रगान तक में झलकती है, उसे सत्ता ने अपने अनुकूल विचारधारा के जरिये हड़पने की समझ भी विकसित कर ली और बाजारवाद की विचारधारा ने विकास के नाम पर संस्थानों के दरवाजे बंद कर दिये. जनादेश के आसरे सत्ता पानेवालों ने खुद को ही लोकतंत्र मान लिया और हर दरवाजे अपने लिए खोल कर साफ संकेत देने की कोशिश शुरू की कि पांच बरस तक सत्ता की हर पहल देश के लिए है.
सत्ता जिस विचारधारा से निकली उसे राष्ट्रीय धारा मान कर राष्ट्रवाद की परिकल्पना भी सियासी विचारधारा के मातहत ही परिभाषित करने की कोशिश शुरू हुई. इसी का असर नये तरीके से शुरू हुआ कि हर क्षेत्र में सत्ता की मातृ विचारधारा को ही राष्ट्र की विचारधारा मान कर संविधान की उस डोर को ही खत्म करने की पहल होने लगी, जिसमें नागरिक के अधिकार राजनीतिक सत्ता से जुड़े बगैर मिल नहीं सकते. इस तरह हर संस्थान के बोर्ड में संघ के पंसदीदा की नियुक्तियां होने लगीं. गुड गवर्नेस झटके में सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के आईने में कैसे उतारा गया, यह किसी को पता भी नहीं चला या कहें कि सबको पता चला, लेकिन इसे सत्ता का अधिकार मान लिया गया.
राष्ट्रवाद की इस सोच से ओत-प्रोत होकर तमाम संस्थानों में वैसे ही लोग निर्णय लेनेवाली जगह पर नियुक्त होने लगे, जो भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के नजदीक रहे. दरअसल, सत्ता के चापलूस या दरबारियों को ही संस्थानों में नियुक्त कर अधिकार दे दिये गये, जो सत्ता या संघ का नाम जपते हुए दिखे. यानी पदों पर बैठे महानुभाव अगर सत्ता या संघ का पाठ अविरल करते रहेंगे, तो संघ का विस्तार होगा और सत्ता ताकतवर होगी, यह सोच नये तरीके से विचारधारा के नाम पर विकसित हुई, जिसने उन संस्थानों की नींव को ही खोखला करना शुरू कर दिया, जिनकी पहचान दुनिया में रही.
आइसीसीआर हो या पुणो का एफटीआइआइ या फिर सेंसर बोर्ड हो या सीवीसी सरीखे संस्थान, हर जगह जिन हाथों में बागडोर दी गयी, उनके काम के अनुभव या बौद्धिक विस्तार का दायरा उन्हें संस्थान से ही अभी ज्ञान अर्जित करने को कहता है. अब आनेवाली पीढ़ियो को जब वे ज्ञान बांटेगें, तो निश्चित ही वही समझ सामने होगी, जिसकी वजह से उन्हें पद मिला है. तो फिर आनेवाला वक्त होगा कैसा? आनेवाले वक्त में जिस युवा पीढ़ी के कंधों पर देश का भविष्य है, अगर उसे ही लंबे वक्त तक सत्ता अपनी मौजूदगी को श्रेष्ठ बतानेवाले शिक्षकों की नियुक्ती हर जगह कर देती है, तो फिर बचेगा क्या.
यह सवाल इसलिए बड़ा हो चला है कि राजनीतिक सत्ता यह मान कर चल रही है कि उसकी दुनिया के अनुरूप ही देश को ढलना होगा. यानी मौजूदा वक्त बार-बार एक ऐसी लकीर खींच रहा है, जिसमें सत्ताधारी राजनीतिक दल या उसके संगठनों के साथ अगर कोई जुड़ाव आपका नहीं रहा, तो आप किसी काबिल नहीं हैं. मुश्किल तो यह है कि समझ का यह आधार अब आइएएस और आइपीएस तक को प्रभावित करने लगा है. भाजपा शासित राज्यो में डीएम, एसपी तक संघ के पदाधिकारियों के निर्देश पर चलने लगे हैं. ना चलें तो नौकरी मुश्किल और चलें तो सारे काम संघ के विस्तार और सत्ता के करीबियों को बचाने के लिए. तो क्या चुनी हुई सत्ता ही लोकतंत्र की सही पहचान है?
ध्यान दें तो मोदी सरकार को सिर्फ 31 फिसदी वोट ही मिले. वहीं जिन संवैधानिक संस्थानों को लेकर मनमोहन सिंह के दौर में सवाल उठे थे, तब कांग्रेस को भी 70 करोड़ वोटरों में से महज साढ़े ग्यारह करोड़ ही वोट मिले थे. बावजूद इसके कांग्रेस की सत्ता से जब अन्ना और बाबा रामदेव टकराये, तो कांग्रेस ने खुले तौर पर हर किसी को चेतावनी भरे लहजे में वैसे ही कहा था कि चुनाव लड़ कर जीत लें तभी झुकेंगे.
मौजूदा वक्त भारतीय राजनीति के लिए इसलिए नायाब है, क्योंकि जनादेश के घोड़े पर सवार मोदी सरकार ने अपना कद हर उस साथी को दबा कर बड़ा करने की कवायद से शुरू की, जो जनादेश दिलाने में साथ रहा. जो सवाल कांग्रेस के दौर में भाजपा ने उठाये उन्हीं सवालों को मौजूदा सत्ता ने दबाने की शुरुआत की.
दरअसल, पहली बार सवाल यह नहीं है कि कौन गलत है या कौन सही. सवाल यह है कि क्या गलत-सही को परिभाषित करने की काबिलियत राजनीतिक सत्ता के पास ही होती है, और संवैधानिक संस्थानों का कोई मतलब नहीं है, क्योंकि विकास की अवधारणा उस पूंजी पर जा टिकी है, जो देश में है नहीं और विदेश से लाने के लिए किसान-मजदूर से लेकर उद्योगपतियों और देसी कॉरपोरेट तक को दरकिनार किया जा सकता है.
तो सत्ता के बदलने से उठते सवाल बदलते नजरिये भर का नहीं है, बल्कि सत्ता के अधीन संस्थानों को भी सत्ता की ताकत बनाये रखने के लिए कहीं ढाल तो कहीं हथियार बनाया जा सकता है. और इसे खामोशी से हर किसी को जनादेश की ताकत माननी होगी, क्योंकि यह आपातकाल नहीं है.
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