नया जमाना, गिरने से क्या घबराना

।। अखिलेश्वर पांडेय ।। (प्रभात खबर, जमशेदपुर) सुबह उठते ही, चाय पीते वक्त दूध और चीनी की महंगाई याद आती है. दोपहर और रात को, भोजन करते वक्त सब्जी–आटा–चावल–दाल की महंगाई सताती है. तो क्या हुआ.. यह क्षणिक आवेग है जनाब! थोड़ा ठंड रखिए. गुस्सा पी जाइए. क्या हुआ जो टमाटर आपको लाल आंखें दिखा […]
।। अखिलेश्वर पांडेय ।।
(प्रभात खबर, जमशेदपुर)
सुबह उठते ही, चाय पीते वक्त दूध और चीनी की महंगाई याद आती है. दोपहर और रात को, भोजन करते वक्त सब्जी–आटा–चावल–दाल की महंगाई सताती है. तो क्या हुआ.. यह क्षणिक आवेग है जनाब! थोड़ा ठंड रखिए. गुस्सा पी जाइए.
क्या हुआ जो टमाटर आपको लाल आंखें दिखा रहा है, प्याज का दाम सुन कर ही आंसू आ रहे हैं? वह दिन दूर नहीं जब प्याज भी सेंसेक्स और रुपये की मंडली में शामिल हो जायेगा. फिलहाल तो आप ‘भारत निर्माण’ का विज्ञापन देखिए और देश में तरक्की का चढ़ता ग्राफ महसूस कीजिए.
हो सके तो उस ढाबे या होटल की तलाश कर लीजिए, जहां 12 या 5 रु पये का खाना मिल सके. वैसे परिवार को ढूंढ़ कर उसकी जीवनशैली अपनाइए जो 27 या 33 रु पये में गुजारा कर रहा है. केंद्रीय मंत्रियों और सत्तासीन पार्टी के नेताओं का यह दावा बस यूं ही नहीं है. आखिर वे जो कह रहे हैं उसका पुख्ता आधार होगा. उन पर ‘भरोसा’ कीजिए. ठीक उसी तरह जिस तरह पिछले दस साल से अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री पर भरोसा कर रहे हैं. इस उम्मीद के साथ कि आज नहीं, तो कल देश की अर्थव्यवस्था जरूर ठीक हो जायेगी. पर हो इसका उल्टा रहा है.
रुपया दिनोदिन रसातल में जा रहा है. दलाल पथ से लेकर राजपथ तक भयंकर गिरावट का दौर जारी है. दलाल पथ पर सेंसेक्स गिर रहा है, तो राजपथ पर नेता लोग. किसी को अपनी गिरावट पर ‘अफसोस’ नहीं है. पर इस गिरावट को आप हल्के में मत लीजिए. इसमें तमाम अंदरूनी रहस्य छिपे हैं. सेंसेक्स इसलिए गिर रहा है, ताकि निवेशकों के दिल मजबूत हों.
रुपया इसलिए गिर रहा है, ताकि लोग फिजूलखर्ची कम करें और अपना माल बचा कर निर्यात किया जाये. नेता इसलिए गिर रहे हैं, ताकि राजनीति के प्रतिमान कुछ बदल सकें.अगर आप समझ सकें तो असल बात यह है कि नेताओं के लिए देश की जनता और राजनीति दोनों ही मनोरंजन का सामान बन गयी हैं. इस मनोरंजन का लुत्फ वे अक्सर अपने बयानों में लेते रहते हैं.
गरीब, गरीबी और भूख तीनों में उन्हें मनोरंजन नजर आता है. स्त्री उन्हें ‘टंच माल’ दिखायी पड़ती है. उनकी जुबान और बयान का कोई भरोसा नहीं; कब, किसे, क्या कह–बना दें. दरअसल, यह अंतर भूखे पेट होने और पेट भरे होने के बीच का है. यह भरे पेट का ‘टंचत्व’ है. अगर खुद का पेट भरा हो, तो सब तरफ सुख–शांति और अमन–चैन ही नजर आता है. अमीरी–गरीबी में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. फर्क है तो सिर्फ गिरने में. कुछ लोग ऊंचाई पर पहुंचने के लिए गिर रहे हैं, तो कुछ लोग ऊंचाई पर पहुंचने के कारण गिर रहे हैं.
दरअसल, गिरना टैक्स और ब्याज से मुक्त है. पर उसका क्या जो हर गिरावट की मार खा कर बीच बाजार में खड़ा है. बाजार में खुद को औने–पौने दामों में बिकवा रहा है, ताकि किसी तरह अपना और अपने परिवार का पेट भर सके.
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