फुटपाथ पर सोने के सपने ने ही डरा दिया

।।शैलेश कुमार।।(प्रभात खबर, पटना)हर रात जब काम के बाद घर लौटता हूं, तो फुटपाथ व रोड डिवाइडर पर सो रहे लोगों पर निगाहें अटक जाती हैं. एक दिन उन्हें देख कर कुछ माह पहले आयी हिंदी फिल्म जॉली एलएलबी का वह दृश्य याद आ गया, जिसमें बोमन ईरानी हिट एंड रन केस में फंसे अपने […]
।।शैलेश कुमार।।
(प्रभात खबर, पटना)
हर रात जब काम के बाद घर लौटता हूं, तो फुटपाथ व रोड डिवाइडर पर सो रहे लोगों पर निगाहें अटक जाती हैं. एक दिन उन्हें देख कर कुछ माह पहले आयी हिंदी फिल्म जॉली एलएलबी का वह दृश्य याद आ गया, जिसमें बोमन ईरानी हिट एंड रन केस में फंसे अपने मुवक्किल के बचाव में अदालत में दलील देते हुए कहते हैं कि फुटपाथ सोने के लिए नहीं होते. उसी दिन मैंने अखबार में पढ़ा था कि मुंबई सेशन कोर्ट ने 11 साल पहले फुटपाथ पर सो रहे लोगों पर गाड़ी चढ़ाने के मामले में अभिनेता सलमान खान के खिलाफ सुनवाई पांच सितंबर के लिए टाल दी है. दिमाग में यह भी चल रहा था कि फुटपाथ पर लोग आखिर कैसे सो लेते हैं? यदि मैं एक दिन वहां सो कर देखूं, तो कैसा अनुभव होगा?
उसी रात सपने में खुद को सड़क के डिवाइडर पर सोते देखा. न बिछाने के लिए चादर थी और न ओढ़ने के लिए. फटे-पुराने कपड़ों में किसी तरह बदन ढका था. जमीन बहुत ठंडी थी. रात बढ़ने के साथ शीत गिरने लगी. ठंड और बढ़ने लगी. शरीर कांप रहा था. अगल-बगल से सरसराती हुई गाड़ियां निकलती थीं. दूर से आती गाड़ियों को देख कर लगता था कि अब मुझ पर ही चढ़ जायेगी. दिल की धड़कन बढ़ गयी थी. फिर भी सोने के लिए बस वही एक जगह बची थी. न तो अपना घर था और न ही सरकार की ओर से उपलब्ध करायी गयी कोई जगह, जहां रात में सो सकें.
तभी एक गाड़ी तेज रफ्तार में इधर-उधर मुड़ती हुई मेरी ओर आती दिखी और इससे पहले कुछ समझ पाता, मैं गाड़ी के नीचे दब चुका था. दर्द से कराह ही रहा था कि नींद खुल गयी. तब एहसास हुआ कि यह एक भयानक सपना था. भले ही, मेरे साथ जो हुआ, वह महज एक सपना था, लेकिन हमारे आसपास ही ऐसे हजारों लोग रहते हैं, जिनके साथ आये दिन ऐसे हादसे होते हैं. ये इतने गरीब हैं कि किसी तरह से पेट भर लें, वहीं बहुत है. ऐसे में आशियाना तो दूर की बात है. खुले आसमान के नीचे इनकी हर रात गुजरती है. इनसान हैं, तो दिल तो धक-धक करता ही होगा. ठंड से शरीर अकड़ ही जाता होगा. तभी तो पैरों को पेट में डाल सिकुड़ कर सोते हैं. खास कर जब औरतें और बच्चे इस तरह से सोते नजर आते हैं, तो मन खिन्न हो जाता है.
तब मन में कई सवाल उठते हैं कि विकास का दावा करनेवाली सरकार क्या इनके लिए रात में आशियाने का इंतजाम भी नहीं कर सकती? होटलों व पार्क में सेमिनार व कार्यक्रमों का आयोजन कर मीडिया में पब्लिसिटी हासिल करनेवाले एनजीओ क्या इन लोगों के लिए कुछ नहीं कर सकते? हां मैंने सोचा है कि अपने स्तर पर इसके लिए सरकार पर दबाव बनाऊंगा. एनजीओ व जागरूक जनों को उनकी मदद के लिए प्रेरित करूंगा. क्या आप भी कुछ करेंगे?
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