यादगार रहेगा मॉनसून सत्र

Published at :30 Aug 2013 2:05 AM (IST)
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यादगार रहेगा मॉनसून सत्र

।।पुष्पेश पंत।।(वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)हाल के दिनों में हमारी संसद की कार्यवाही लगातार इस तरह बाधित होती रही है कि लोग यह पूछने को बाध्य होने लगे हैं कि क्या हमारा संसदीय जनतंत्र वास्तव में जनतंत्र है भी या नहीं? कभी वरिष्ठ पत्रकार गिरिलाल जैन ने सुझाया था कि भारत का जनतंत्र इस मायने में अनूठा […]

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।।पुष्पेश पंत।।
(वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक)
हाल के दिनों में हमारी संसद की कार्यवाही लगातार इस तरह बाधित होती रही है कि लोग यह पूछने को बाध्य होने लगे हैं कि क्या हमारा संसदीय जनतंत्र वास्तव में जनतंत्र है भी या नहीं? कभी वरिष्ठ पत्रकार गिरिलाल जैन ने सुझाया था कि भारत का जनतंत्र इस मायने में अनूठा है, क्योंकि उसका बुनियादी स्वरूप वंशवादी/ कुनबापरस्त है. उस वक्त यह आलोचना मात्र नेहरू-गांधी परिवार के प्रति पूर्वाग्रह ग्रस्त लगती थी. लेकिन आज इसे नकारना बेहद कठिन हो गया है. केंद्र में ही नहीं, कई राज्यों में भी राजनीति पर चंद कुलीन पारंपरिक मान्यताप्राप्त शासक परिवारों का एकाधिकार है. यह प्रवृत्ति अपने आप में जनतंत्र की आत्मा के प्रतिकूल कही जा सकती है, पर इस घड़ी जो सवाल हमारे सामने खड़ा है, वह मात्र इस विकृति के कारण नहीं पैदा हुआ है.

पहले यह याद रखने की जरूरत है कि संसदीय जनतंत्र में जनता द्वारा निर्वाचित प्रतिनिधि ही सदन की ‘संप्रभुता’ सत्ता को मूर्तिमान करते हैं. सिर्फ सत्ताधारी पक्ष की सरकार ही नहीं, विपक्षी-विरोधी दलों के सदस्य भी सदन का अभिन्न अंग होते हैं. सदन में व्यवधान की जिम्मेवारी न तो अकेले विपक्ष की है और न सरकार की. पर तब भी ईमानदारी का तकाजा है कि यह बात कबूल की जाये कि इस बार सरकार की अहंकारी लापरवाही और अपने ऊपर लगे गंभीर आरोपों को सीनाजोरी से दबाने की नाजायज व असंवैधानिक गतिविधियों ने विपक्ष के सामने दूसरा कोई विकल्प छोड़ा ही नहीं.

यदि शोरगुल व हंगामे के कारण सदन की कार्यवाही को लगभग हर रोज स्थगित करना पड़ता है, तो फिर यह भरम पालना असंभव है कि जनतंत्र जीवंत है अथवा सार्थक या वास्तविक. पिछले साल भर से संसद का कोई भी सत्र अबाध रूप से काम करने में असमर्थ रहा है. कुछ विद्वान भारत के जनतंत्र को ‘स्थगित जनतंत्र’ तक कहने लगे हैं. इसी संदर्भ में यह पड़ताल जरूरी है कि संसद के मॉनसून सत्र में हमने क्या खोया या पाया?

अकसर सत्ता पक्ष यह आरोप लगाता है कि जब-जब सदन की कार्यवाही में विघ्न पड़ता है, तब देश के संसाधनों की बेशुमार फिजूलखर्ची होती है. इसके अलावा संसद का जो मुख्य काम है, कानून बनाना, उसमें विलंब होता है. एक तरफ विपक्ष सरकार को इस बात के लिए कटघरे में खड़ा करता है कि वह लकवाग्रस्त है, फैसले नहीं कर सकती और दूसरी तरफ उसे काम भी नहीं करने देता. अगर मॉनसून सत्र का कीमती समय एक बार फिर बरबाद हुआ है, तो इसके लिए विपक्ष को दोष देना चाहिए, जिसकी मंशा राजनीति को जनतांत्रिक बनाने की नहीं, वरन अराजकता को प्रोत्साहित करने की है. हालांकि यहां हम इस बहस में नहीं उलझना चाहते, लेकिन यह रेखांकित करना जरूरी है कि संसद का काम मात्र विधेयक पारित करना नहीं. जनतंत्र में भले ही बहुमत हासिल करने या जुटानेवाला ही सरकार बना सकता है, लेकिन उस सरकार पर अंकुश लगाने के लिए विपक्ष की जगह निरापद रखना भी जनतांत्रिक व्यवस्था की अनिवार्य शर्त है. यह सरकार जो मतदान के संदर्भ में उपयोगी अल्पसंख्यक समुदाय की हित रक्षा में हर समय मुस्तैद रहती है, सदन में मौजूद अल्पसंख्यक विपक्षी दलों की संवैधानिक या जनतांत्रिक परंपरा-सम्मत भूमिका की अवहेलना करती रही है. पीएसी हो या कोई अन्य संसदीय समिति, उनका क्रियाकलाप और शुद्ध बहुमत के दबाव में मनमानी करने का हठ सदन की कार्यवाही को पटरी से उतारता रहा है. इसलिए यह सरकारी शिकायत कि इस सत्र में बहुत कम काम हो सका है, मक्कारी का बहाना ही लगता है.

इस समय सबसे ज्यादा शोर खाद्य सुरक्षा विधेयक को पारित करानेवाली यूपीए की ‘सफलता’ का है. यह ‘उपलब्धि’ एक मरीचिका भर है, जिसका घातक परिणाम सामने आते देर नहीं लगनेवाला है. चुनावी लोकलुभावन राजनीति के खुदगर्ज इस्तेमाल ने अर्थव्यवस्था को चौपट कर डाला है. सोनिया जी की प्रबल इच्छा थी कि दिवंगत राजीव गांधी के जन्मदिन पर अध्यादेश को विधेयक का रूप दिया जा सके. सर्वसहमति के अभाव में ऐसा नहीं हो सका. जिन परिस्थितियों में मुलायम, माया, डीएमके, तथा शरद पवार तक ने गंभीर आशंकाएं व्यक्त कर अपनी आपत्तियां दर्ज कराते हुए इसके पक्ष में मत दिया, उससे यही लगता है कि किसी भी कीमत पर, समर्थन की एवज में कुछ भी देकर या भयादोहन का सहारा लेकर इस विधेयक को पास कराना सरकार की प्राथमिकता बन चुकी थी. विपक्ष की मजबूरी यह थी कि चुनाव के पहले वह अपनी छवि को वंचितों के विरुद्ध नहीं प्रकट कर सकती थी. इतने महत्वपूर्ण विधेयक को जितनी तेजी और अपारदर्शिता से पारित कराया गया, उससे भारतीय जनतंत्र का कड़वा सच ही जगजाहिर होता है, उसकी शक्ति नहीं.

बचे-खुचे समय में अन्य अटके हुए विधेयक ऐसी ही हड़बड़ी में बिना गंभीर बहस या वास्तव में असरदार संशोधनों पर विचार किये ही पारित हो जायेंगे. भूमि संबंधी विधेयक हो या पेंशन वाला, जाब्ता फौजदारी के कुछ प्रावधानों में बदलाव का प्रश्न हो या कंपनी कानून में समय के साथ बदलाव की दरकार, हमारी समझ में विधेयक पारित कराना ही सब कुछ नहीं. इसके मसौदे पर पारदर्शी सार्वजनिक बहस भी अहम मुद्दा है. यदि ऐसा नहीं होगा, तो इसका सूचना प्रौद्योगिकी कानून जैसा हश्र हो सकता है. नागरिक को लाभ होने के स्थान पर उसके बुनियादी अधिकार ही संकटग्रस्त हो सकते हैं. बलात्कार पीड़ितों को न्याय दिलानेवाले कानून की सिफारिशें ठंडे बस्ते में ही धरी रह जाती हैं, किशोरों के लिए अलग न्यायिक प्रणाली के भारतीय परिवेश में दुरुपयोग को रोकने के लिए इसके अंतर्विरोधों के निवारण की चर्चा सदन में नहीं होती.

कुछ और कानून बनाने में सदन में हंगामा कभी रुकावट नहीं बनता. सदस्यों के वेतन-भत्ते में इजाफा हो या विशेषाधिकारों को और भी व्यापक बनाना, इन पर सर्वदलीय सहमति तत्काल हो जाती है. उन्हें आरटीआइ के दायरे से बाहर रखना हो या गंभीर जघन्य अपराधों में दंडित आरोपियों की सदस्यता को निरापद रखना हो, सभी सदस्य अपने आपसी मतभेद (व्यक्तिगत- सैद्धांतिक) भुलाना आसान समझते हैं. इन सभी विषयों पर सदन में गतिरोध से कोई व्यवधान पड़ता नहीं नजर आया. असल सवाल यह है कि क्या इस तरह के विधेयकों का पारित होना या इनकी गिनती जनतांत्रिक उपलब्धि कही जा सकती है?

हमारा मानना है कि तमाम बाधाओं के बावजूद इस सत्र ने एक अहम जनातांत्रिक भूमिका निभायी है. निरंतर स्थगनों ने नागरिकों को यह सोचने को विवश किया है कि उसके निर्वाचित प्रतिनिधि अपना शासनाधिकार अब जन्म-सिद्ध समझने लगे हैं और बहस कितनी भी अभद्र क्यों न हो, वह नूरा-कुश्ती ही है. मौजूदा जमात की छुट्टी की सुगबुगाहट महसूस की जाने लगी है. यह सत्र इसीलिए यादगार रहेगा.

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