दिन में तारे दिखा रहा डॉलर

Published at :23 Aug 2013 4:04 AM (IST)
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दिन में तारे दिखा रहा डॉलर

।।अरविंद मोहन।।(वरिष्ठ पत्रकार)डॉलर गुरुवार को जैसे ही 65 रुपये के भी पार चला गया, कई लोगों को विवादास्पद एवं चौंकानेवाले सुझावों के लिए चर्चित अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला याद आये, जिन्होंने हाल में ही कहा था कि पिछले दो महीनों में सरकार और रिजर्व बैंक ने रुपये की गिरावट को थामने के लिए जितने कदम उठाये […]

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।।अरविंद मोहन।।(वरिष्ठ पत्रकार)
डॉलर गुरुवार को जैसे ही 65 रुपये के भी पार चला गया, कई लोगों को विवादास्पद एवं चौंकानेवाले सुझावों के लिए चर्चित अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला याद आये, जिन्होंने हाल में ही कहा था कि पिछले दो महीनों में सरकार और रिजर्व बैंक ने रुपये की गिरावट को थामने के लिए जितने कदम उठाये हैं, उन सबको एक बार में वापस ले लेने की जरूरत है. इन्हें वापस लेने से ही डॉलर-रुपये का विनिमय दर अपने सामान्य स्तर पर आयेगा. गिनने बैठें तो इस क्रम में सोने पर सीमा शुल्क बढ़ाना, कई लक्जरी आइटमों का आयात रोकना, विदेशों में निवेश पर कई तरह की पाबंदियां लगाना और बाजार से रुपये की आपूर्ति कम करने व डॉलर की आपूर्ति बढ़ाने जैसे कई कदम सामने आयेंगे.

फिर यह समझना मुश्किल होगा कि इन कदमों से क्या फायदा हुआ है, क्योंकि इन फैसलों के अगले दिन बाजार ने और उल्टी प्रतिक्रिया दी. प्रोफेसर भल्ला की बात अपनी जगह है, पर यह सोच कर देखना चाहिए कि अगर ये कदम नहीं उठाये गये होते तो क्या होता. अब यह अनुमान लगाने का फायदा नहीं है कि तब डॉलर कहां पहुंचता और अब डॉलर कहां तक जा सकता है, लेकिन हालत बहुत खराब है और इसे सिर्फ एक्सचेंज दर का मामला मानना या हालिया कदमों से हालत सुधर जाने की उम्मीद पालना गलत होगा. मुद्रा किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का हाल बताने के साथ ही उसके मान-अपमान का सामान भी होती है.

हमारी हालत विदेश व्यापार के चालू खाते का घाटा बढ़ने से ज्यादा खराब हुई है. पिछले साल यह जीडीपी के 4.8 फीसदी तक पहुंच गयी थी, जिसे अब वित्त मंत्री 3.7 फीसदी पर लाने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं. पर बीच में एक तिमाही यह छह फीसदी तक घूम आया है. दूसरी सच्चाई यह है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था सुधार की राह पर है, इसलिए वह पूंजी को फिर से आकर्षित करने लगी है. उसने मंदी से निपटने के लिए उठाये कदमों को भी वापस लेना शुरू किया है. यह भी दिखने लगा है कि यूरोप के कई देश भी वापस स्वस्थ स्थिति में आने लगे हैं. संभव है इससे हमारी चीजों की मांग बढ़े, जो डॉलर की महंगाई से वैसे ही सस्ते हो गये हैं. यह भी हो सकता है कि उनके यहां कामकाज बढ़ने से हमारे बीपीओ उद्योग को ज्यादा ऑर्डर मिलने लगे और हमारी निर्यात की कमाई कुछ बढ़े. महंगा आयात हमारी मांग को कम करेगा और शायद चिदंबरम साहब का लक्ष्य उनके बिना कुछ खास किये-धरे या भल्ला साहब के सुझाव से ही हासिल हो जाये. पर डॉलर की मजबूती और साथ में हमारी अर्थव्यवस्था की दुर्गति का यह कोई इलाज नहीं है.

इलाज तो शायद वह भी नहीं है जो वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक टुकड़ों-टुकड़ों में घोषित करते रहे हैं, क्योंकि चालू खाते का घाटा कोई एक दिन में और बिना बताये नहीं आया है. निर्यात न बढ़ने की वजह कारखानों से उत्पादन में एकदम कमी होते जाना है, जो अब निगेटिव ग्रोथ रेट में दिखने लगा है. अर्थव्यवस्था की गिरावट का दूसरा इलाका खनन है, जिसमें उदारीकरण के पूरे दौर में एकदम लूट रही है या एकदम कंगाली. जब से कोयला, बॉक्साइट, अल्युमिनियम के खनन और लाइसेंस आवंटन में घोटाले का पदार्फाश हुआ है, सारा काम लगभग ठप है. दुनिया में सबसे बड़ा कोयला भंडार रख कर भी हम आज कोयले के लिए आयात पर निर्भर हो गये हैं. कोई कोयला खोदने में डरता है, कोई लाइसेंस देने में, तो कोई फाइल आगे बढ़ाने में. बाहर की मंदी ने हमारे सामान और श्रम की मांग कम कर दी थी, पर पेट्रोलियम, खाद्य तेल और तैयार मशीनरी आयात कर यहां माल बना कर बेचने की हमारी लत में कमी की गुंजाइश ही नहीं दिखी. जो थोड़ा-बहुत तेल-गैस देश में पैदा होता था, वह नीतिगत प्राथमिकताओं से बाहर हो गया है.

फिर यह भी हुआ है कि बीते काफी समय से मुल्क ऊंचे दर की मुद्रास्फीति ङोल रहा है. मुद्रास्फीति का मतलब है मुद्रा की क्रयशक्ति में गिरावट. छह मुद्राओं की टोकरी के साङो औसत मूल्य से आज हमारी मुद्रा की क्रय शक्ति 2004-2005 की तुलना में 8.5 फीसदी और 2009-2010 की तुलना में 6.65 फीसदी कम हो गयी है. 36 मुद्राओं के बास्केट के आधार पर भी यही गिरावट है. यह स्थिति हमारे विदेश व्यपार को भी प्रभावित कर रही थी. चालू खाते का घाटा इसी चलते बढ़ता जा रहा था. सो एक स्वाभाविक क्रम में रुपया कमजोर होकर हिसाब को संतुलित करने की तरफ बढ़ा है. निर्यात में सॉफ्टवेयर ही नहीं, मैन्युफैक्चरिंग में भी भारी गिरावट आयी है. हमारे उद्योग-धंधे देशी के साथ-साथ विदेशी मांग में कमी से भी पस्त हो रहे हैं. दूसरी ओर हमारा देश विदेशी गाड़ियों की प्रयोगशाला बना हुआ है. इनके सहारे हमारे यहां ऑटो क्रांति हो रही है. नतीजा है कि तेल का आयात बेरोक-टोक बढ़ता गया है. अब तो सरकार भी तेल की कीमतों और उस पर भारी टैक्स से खजाना भरने में लगी है और कीमत को बाजार के हवाले कर दिया गया है.

जो निवेशक हैं और जिन संस्थाओं के माध्यम से निवेश आता है, वे भी हवा का रुख और सरकारी फैसलों के असमंजस को देख-समझ रहे थे. उन्होंने भी जब नीतियों में टिकाऊपन न देखा, पॉलिसी पैरालिसिस देखी, घोटालों से सरकार और संसद को थमते देखा, तो अपना पैसा वापस निकालने लगे. मई काफी समय बाद ऐसा पहला महीना बना जब निवेशकों ने अपनी पूंजी वापस ली.

अपना पैसा निकाल कर बाहर जानेवाले संस्थागत निवेशकों ने डॉलर की मांग सबसे ज्यादा बढ़ायी है. एफडीआइ पर सारी सरकारी कवायद के बावजूद हाल के महीनों में संस्थागत निवेश में कमी आयी है और फंड वापस लेनेवालों ने तो मुल्क की नाक में दम ही कर दिया है. रिजर्व बैंक और सरकार द्वारा उठाये कदमों से बांड का स्टॉक तो चुक गया, लेकिन डॉलर नीचे नहीं आया. उनकी खरीद के साथ ही तेल कंपनियों ने भी डॉलर का स्टाक बनाना शुरू किया, क्योंकि जब भरोसा न हो कि डॉलर कितना बढ़ेगा और मुल्क की जरूरत का 70 फीसदी तेल खरीदना ही हो, तो बटुआ भर कर रखने में ही होशियारी है. फिर सट्टेबाजी मुद्रा बाजार का आम चलन ही है. सो जब एक मुद्रा टूटने लगती है तो उस पर सट्टेबाजी शुरू होना अचरज की बात नहीं है.

हमारी यह स्थिति इसलिए है कि उचित समय पर सही फैसले नहीं हुए, वक्त रहते नयी जरूरतों के अनुरूप कानूनों में बदलाव नहीं हुए, मुद्रास्फीति/महंगाई थामने का सही उपाय नहीं किया जा सका. मनमोहन-चिदंबरम और सोनिया मंडली के बीच नीतियों पर नजरिये का अंतर है, पक्ष व प्रतिपक्ष आर्थिक जरूरतों से बेपरवाह हो गये लगते हैं. आज सात लाख करोड़ रुपये की योजनाएं मंजूर होकर लटकी पड़ी हैं, क्योंकि किसी को जमीन खरीदने में मुश्किल आ रही है तो किसी को पर्यावरण का क्लियरेंस नहीं मिल रहा है. 116 बिल संसद में लटके पड़े हैं. जब हाउस चल रहा हो तो दोनों लड़ते हैं, जब न चल रहा हो तो विशेष सत्र बुलाने की मांग की जाती है. ऐसे में अगर डॉलर हमें और सरकार को आईना दिखा रहा है, तो इसे अच्छा ही मानना चाहिए!

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