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अब कांग्रेस कब चेतेगी?

Updated at : 05 Jan 2015 5:40 AM (IST)
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अब कांग्रेस कब चेतेगी?

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार क्या मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाना कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी? विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का मौन भी कांग्रेस के लिए अहितकर हुआ.. आत्मचिंतन कांग्रेस के डीएनए में नहीं है. आंदोलन विमुखता उसके ह्रास का लक्षण है. पिछला वर्ष भाजपा का विजय-वर्ष था. सर्वत्र मोदी-लहर थी. झारखंड […]

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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
क्या मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाना कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी? विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का मौन भी कांग्रेस के लिए अहितकर हुआ.. आत्मचिंतन कांग्रेस के डीएनए में नहीं है. आंदोलन विमुखता उसके ह्रास का लक्षण है.
पिछला वर्ष भाजपा का विजय-वर्ष था. सर्वत्र मोदी-लहर थी.
झारखंड और जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में यह लहर कुछ हद तक थमी. दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी इसके थमे रहने के आसार हैं. लेकिन, कांग्रेस लोकसभा चुनाव के परिणाम के बाद से आइसीयू में संज्ञा-शून्य पड़ी हुई है. लोकतंत्र में जिनकी आस्था है, वे सब कांग्रेस के स्वस्थ होने की मंगलकामना करेंगे. ‘कांग्रेसमुक्त भारत’ भारतीय लोकतंत्र के पक्ष में नहीं होगा. सामान्य वार्ड में लौटने और चंगा होने के अभी अवसर हैं. नादानी करके पछताना कांग्रेस का स्वभाव बन चुका है.
महाराष्ट्र में राकांपा का साथ छोड़ने के बाद झारखंड में उसने झामुमो और जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस का साथ छोड़ा. एक सौ तीस वर्ष पुरानी पार्टी राज्यों में तीसरे-चौथे स्थान पर सिमट रही है.
तो क्या सचमुच 2019 तक किसी प्रमुख राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं रहेगी? फिलहाल वह कर्नाटक, केरल, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और उत्तर-पूर्वी राज्यों में सिमटी हुई है. देश में कांग्रेस के कुल विधायक 949 और भाजपा के 1,058 हैं. कांग्रेस के प्रति मतदाताओं का ऐसा अविश्वास कभी नहीं था. ‘शाइनिंग इंडिया’ का चमकीला नारा 2004 के चुनाव में काम नहीं कर पाया. तब भाजपा की विकास-नीतियों से असहमत भारत की जनता जिस विश्वास से कांग्रेस के समीप आयी थी, उस विश्वास की रक्षा यूपीए2 में नहीं हुई. नवउदारवादी अर्थव्यवस्था कांग्रेस ने शुरू की थी. विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की शर्ते उसने लगभग आंख मूंद कर स्वीकारी थीं. पहली बार एक प्रधानमंत्री का नाम एक दलाल से जुड़ा- नरसिम्हा राव का नाम हर्षद मेहता से. अब हथियारों के सौदों के दलालों को भाजपा मान दे चुकी है.
क्या मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाना कांग्रेस की सबसे बड़ी राजनीतिक भूल थी? विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रधानमंत्री का मौन भी कांग्रेस के लिए अहितकर हुआ. भ्रष्टाचार और घोटाले के कारण राजीव गांधी की सरकार गयी थी. बोफोर्स कांड की तुलना में कहीं अधिक बड़े-बड़े हुए घोटालों की झड़ी लगी. भ्रष्टाचार बेकाबू हुआ. कांग्रेस का जाना तय था. आत्मचिंतन कांग्रेस के डीएनए में नहीं है. कांग्रेस जैसी आंदोलन-धर्मी पार्टी की आंदोलन विमुखता उसके ह्रास का लक्षण है. इंदिरा गांधी ने राजनीति को चुनाव का पर्याय बना कर बहुत कुछ नष्ट किया, राजनीति का स्वरूप बदला. इंदिरा ने अध्यादेश लाकर ही इमरजेंसी लगायी थी. सात महीने की मोदी सरकार में अब तक छह अध्यादेश आ चुके हैं. मनमोहन सिंह ने इंग्लैंड में डॉक्टर की उपाधि ग्रहण करते हुए अंगरेजी शासन की प्रशंसा की थी- उस शासन की, जिसके विरुद्ध राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन हुआ था. अंगरेजी शासन की प्रशंसा कांग्रेस का प्रधानमंत्री कर रहा था. गांधी-नेहरू की कांग्रेस का यह अध:पतन था. कांग्रेस मोदी के कारण नहीं, बल्कि अपने कारण हारी.
कांग्रेस के पास ‘थिंक टैक’ की कमी है. वह भाजपा का मुकाबला नहीं कर सकती. वह ‘डाल-डाल’ भी नहीं चल रही और भाजपा ‘पात-पात’ चल रही है. मनमोहन सिंह ने ‘एनिमल स्पिरिट’ की बात कही थी. यह स्पिरिट मोदी में सर्वाधिक है. मोदी ‘दिग्गजों’ को भी सोचने का मौका नहीं दे रहे हैं. ‘साइकी’ बदलने और बनाने में वह अकेले हैं. कम्युनिस्ट उसके सामने कुछ नहीं हैं.
अस्सी के दशक में जब भारत एक ‘नयी’ दिशा में आगे बढ़ रहा था, मनुष्य को पहली बार एक ‘संसाधन’ के रूप में देखा गया. अब मोहन भागवत मनुष्य को ‘माल’ कह रहे हैं. 20 दिसंबर, 2014 को कोलकाता के भाषण में उन्होंने चोर पकड़े जाने की बात कही- ‘भूले-भटके जो भी गये हैं, उनको वापस लायेंगे. वो लोग अपने आप नहीं गये. उनको लूट कर, लालच देकर ले गये. अभी चोर पकड़ा गया है और ये दुनिया जानती है. मैं अपना माल वापस लूंगा. यह कौन-सी बड़ी बात है?’ वित्तीय, मार्केट, कॉरपोरेट और फिरंट पूंजी मनुष्य को ‘माल’ ही समझती है. धर्मातरण और ‘घर वापसी’ की बात करनेवाले यह भूल जाते हैं कि ईसाई मिशनरियों ने जहां आरंभ से शिक्षा और स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी, वहीं मोदी सरकार ने इन दोनों पर अब तक ध्यान नहीं दिया है. इसलाम में जहां समानता पर बल है, वहीं हिंदू धर्म में भेदभाव प्रबल है. वर्ण-व्यवस्था अब तक बहुत गहरे मौजूद है.
कांग्रेस के पास कोई दिशा-दृष्टि नहीं है. उसका ध्यान अधिक से अधिक चुनाव पर है. कांग्रेस में मूक-मुखर नेता अलग-अलग थे. मनमोहन सिंह मूक थे, दिग्विजय सिंह मुखर. मोदी एक साथ मूक-मुखर हैं. संसद में मूक, बाहर मुखर. बाहर का संबंध निजी छवि और वोट से है. उनके यहां ‘मन की बात’ प्रमुख है. नित नये मुद्दे उठा कर सोचने का मौका न देना उनकी राजनीति का एक अहम पक्ष है. मुख्य मुद्दों से ध्यान हटाने, मानस-अपवर्तन (डायवर्ट) में संघ परिवार माहिर है. भूमि अधिग्रहण अध्यादेश से दिमाग मोड़ने के लिए ‘पीके’ फिल्म पर बवाल मचाया गया. मोदी सरकार का आरंभ ही अध्यादेश (ट्राई के नियमों में संशोधन अध्यादेश) से हुआ है.
बीमा क्षेत्र में विदेशी निवेश से संबंधित अध्यादेश, कोयला खदानों की नीलामी से संबंधित अध्यादेश, भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन से संबंधित अध्यादेश से कहीं अधिक चर्चा ‘घर वापसी,’ ‘स्वच्छता अभियान’ और ‘पीके’ फिल्म की रही. मोदी के यहां तिथि-महत्व अकारण नहीं है. महत्वपूर्ण तारीखों के जरिये नयी तवारीख बनाने की कोशिशें हैं. 2 अक्तूबर संयुक्त राष्ट्र के लिए ‘अहिंसा दिवस’ है, जिसे मोदी ‘स्वच्छता दिवस’ रिडय़ूस कर देते हैं. क्रिसमस का दिन उनके यहां ‘सुशासन दिवस’ बनता है.
विधायी शक्तियां कांग्रेस के लिए भी कम महत्वपूर्ण थीं. अरुण जेटली ने अध्यादेश लाने को ‘विधायी’ शक्तियों का ‘अपमान’ कहा था.
भाजपा विधायी शक्तियों का क्या अपमान नहीं कर रही? किसानों-मजदूरों की चिंता न कांग्रेस को रही है, न भाजपा को. विदर्भ में पिछले दिनों 72 घंटों में 12 किसानों ने आत्महत्या की है. महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार है. कांग्रेस केवल ‘सेकुलरिज्म’ के जरिये चुनाव नहीं लड़ सकती. मुश्किल यह है, जैसा कि अभी अपने एक लेख-‘मिस्टर एंड मिस्टर मोदी’ (द इंडियन एक्सप्रेस, 31 दिसंबर, 2014) में अनिल धरकर ने लिखा है कि एक मोदी में एक साथ दो मोदी उपस्थित हैं. मोदी के इस अंतर्विरोध को, भाजपा की ही नहीं, संघ परिवार की कार्यपद्धतियों पर सुस्पष्ट योजनाओं को देखने के बाद ही कांग्रेस कुछ कर सकती है. भारत हिंदू राष्ट्र न बने, नाथूराम गोडसे की मूर्तियां न लगें, अध्यादेशों के जरिये कॉरपोरेट हित में बड़े फैसले न लिये जायें, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में न रहे- कांग्रेस का क्या इस ओर ध्यान है? इस वर्ष क्या कांग्रेस आइसीयू से सामान्य वार्ड में लौट पायेगी?
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