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दो महीने बाद शाहीन बाग

Updated at : 18 Feb 2020 6:01 AM (IST)
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दो महीने बाद शाहीन बाग

रविभूषण वरिष्ठ साहित्यकार delhi@prabhatkhabar.in दिसंबर के मध्य से आरंभ हुए दिल्ली के शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन के दो महीने पूरे हो चुके हैं. इस अल्पावधि में यह एक स्थान-विशेष न रहकर एक प्रतीक (राष्ट्रीय बिंब भी) बन चुका है. शाहीन बाग, शाहीन बाग में नहीं है. देश के कई हिस्सों में इसकी तर्ज पर […]

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रविभूषण
वरिष्ठ साहित्यकार
delhi@prabhatkhabar.in
दिसंबर के मध्य से आरंभ हुए दिल्ली के शाहीन बाग के विरोध प्रदर्शन के दो महीने पूरे हो चुके हैं. इस अल्पावधि में यह एक स्थान-विशेष न रहकर एक प्रतीक (राष्ट्रीय बिंब भी) बन चुका है. शाहीन बाग, शाहीन बाग में नहीं है. देश के कई हिस्सों में इसकी तर्ज पर महिलाएं एकजुट होकर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन कर रही हैं. भारत के आधुनिक इतिहास में संभवत: पहली बार इतनी जगहों पर महिलाएं किसी सरकारी कानून का विरोध कर रही हैं और पहली बार मुस्लिम महिलाएं घर की चारदीवारी से बाहर आकर एक बड़े समूह में अपनी आवाजें बुलंद कर रही हैं.
यह विरोध नागरिकता संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एनआरसी) एवं राष्ट्रीय जनसंख्या पंजी (एनपीआर) को लेकर है.
अभी तक संविधान की शपथ विधायक, सांसद, मंत्री आदि लेते रहे हैं. अब संविधान की ‘प्रस्तावना’ सामूहिक रूप से पढ़कर उसकी रक्षा की शपथ लाखों की संख्या में प्रदर्शनकारी महिलाओं और उनके साथियों ने ली है. स्वतंत्र भारत में पहली बार इतनी बड़ी संख्या में और व्यापक स्तर पर संविधान की ‘प्रस्तावना’ का पाठ किया जा रहा है.
भारतीय संविधान किसी भी प्रकार के भेदभाव से रहित सभी नागरिकों को एक समान अधिकार प्रदान करता है. ‘प्रस्तावना’ के आरंभिक शब्द ‘हम भारत के लोग’(‘वी द पीपल ऑफ इंडिया’) सबसे अधिक मूल्यवान है. भारतीय नागरिक को अभिव्यक्ति की आजादी संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त है. सीएए से प्रदर्शनकारियों की सबसे बड़ी आपत्ति का कारण इसका धार्मिक आधार है. प्रदर्शनकारी महिलाएं संविधान विशेषज्ञ नहीं हैं, पर उन्होंने उसकी सांस में अपनी सांसें मिला दी हैं. इन प्रदर्शनों से एक बड़ा सवाल छन कर यह आ रहा है कि सत्ता-व्यवस्था और सरकार संविधान के विरुद्ध है और प्रदर्शनकारी महिलाएं संविधान की रक्षा के लिए एकजुट हैं.
वे जानती हैं कि संविधान धर्म के आधार पर अपने नागरिकों में किसी प्रकार का विभाजन नहीं करता, जबकि सरकार ऐसा कर रही है. संविधान में ‘लोकतांत्रिक’(डेमोक्रटिक) और ‘भ्रातृत्व’(फ्रैटरनिटी) का उल्लेख है और यहां यह लिखना आवश्यक है कि 13 दिसंबर, 1946 को जब पंडित जवाहरलाल नेहरू ने संविधान सभा के समक्ष ‘ऑब्जेक्टिव रिजोल्यूशन’ प्रस्तुत किया था, उसमें ये दोनों पद नहीं थे. इन दो पदों को संविधान सभा की ‘ड्राफ्टिंग कमिटी’ ने जोड़ा था.
संविधान की ‘प्रस्तावना’ का पहला शब्द ‘हम’ महानतम शब्द है. यह शब्द वास्तविक अर्थों में भारतीय पहचान और अस्मिता से जुड़ा हुआ है. यहां व्यक्ति नहीं, बल्कि समाज महत्वपूर्ण है, वह भारतीय समाज, जो न केवल हिंदू समाज है, न मुस्लिम समाज, न ईसाई समाज. यह सबका समाज है और यह देश सबका है. यह एक साझे का समाज है. यही वह बात है, जिससे ‘हस्ती’ मिटती नहीं हमारी.
शाहीन बाग की औरतों ने एक इतिहास रच डाला है. प्रदर्शनकारी हमेशा प्रदर्शन नहीं कर सकते, पर कुछ प्रदर्शन इतिहास में अपने लिए एक स्थायी स्थान बना डालते हैं. शाहीन बाग की आवाजें सामान्य आवाजें नहीं हैं.
इतिहासकार, समाजशास्त्री, पत्रकार, मीडिया विशेषज्ञ, कवि, लेखक, विचारक, बुद्धिजीवी, संस्कृतिकर्मी- कोई भी इन आवाजों की अनसुनी नहीं कर सकता. शाहीन बाग एक प्रेरणास्थल भी है, जिससे प्रेरित होकर कई स्थानों पर अलग-अलग शाहीन बाग बन गये हैं तथा इस फैलाव के जरिये इसने सबसे अधिक बिरादराना संबंध कायम कर लिया है.
संभव है, बाद में उन पर साहित्य-सृजन हो, कलात्मक फिल्में बनें, कलात्मक चित्रादि भी रचे जायें. इसने सृजन-संसार बनने व बनाने में भी पहल की है. अनेक कविताएं, जो अब तक किताबों के पन्नों पर थीं, वहां से निकलकर जुबानों पर आ गयी हैं. उनका पाठ हो रहा है, उन्हें गाया जा रहा है. यह विचार का विषय है कि किस प्रकार एक व्यापक सामूहिक प्रदर्शन और आंदोलन नये सृजन को साकार करता है और कई कविताओं का पुनर्जन्म भी होता है. इस प्रदर्शन ने बहुत सारे उदाहरण हमारे सामने रख दिया है.
यह प्रदर्शन उस समय हो रहा है, जब भारत पिछले एक वर्ष में ‘डेमोक्रसी इंडेक्स’ में दस स्थान नीचे गिर गया है. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को शाहीन बाग बुला रहा है, पुकार रहा है- कृपया शाहीन बाग आइये. प्रदर्शनकारी महिलाएं चाहती हैं कि उनसे सरकार बात करे, संवाद करे. उनका प्रश्न है कि सीएए किस प्रकार नागरिकता देने के लिए है? उन्हें शक है कि यह उनकी नागरिकता लेने के लिए है, वे इस कानून को संविधान विरोधी कह रही हैं.
उन्हें तार्किक ढंग से समझाना चाहिए कि किस प्रकार यह कानून संविधान विरोधी नहीं है? वे दो महीने बाद भी अड़ी और डटी हुई हैं. गृह मंत्री कह चुके हैं कि वे ‘एक इंच भी पीछे नहीं हटेंगे’. सरकार की ओर से बार-बार ऐसे ही बयान दिये गये हैं. ऐसे में यह प्रश्न भी बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि अंततः शाहीन बाग और ऐसे अनेक शांतिपूर्ण प्रतिरोधों का हश्र क्या होगा?
यह गतिरोध किस मोड़ पर जाकर समाप्त होगा? समाधान की संभावनाएं क्या हैं? लोकतांत्रिक व्यवस्था में संवाद प्रमुख है और दो महीने बाद भी शाहीन बाग की औरतें संवाद करने के लिए प्रधानमंत्री और गृह मंत्री को सादर आमंत्रित कर रही हैं, उनका आह्वान कर रही हैं.
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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