अब इलाज सोचना नहीं, करना होगा

By Prabhat Khabar Digital Desk
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आलोक जोशी

पूर्व संपादक, सीएनबीसी

alok.222@gmail.com

भेड़िया आया, भेड़िया आया की तर्ज पर बार-बार मंदी आयी, मंदी आयी का शोर होता था और सरकार उसे गलत बता देती थी. लेकिन, अब यह कहना मुश्किल ही नहीं, नामुमकिन है कि मंदी की बात मत करो.

एक के बाद एक आंकड़े आ रहे हैं और चिंता बढ़ा रहे हैं. बीते हफ्ते ही औद्योगिक उत्पादन में गिरावट की खबर आयी, गिरावट यानी बढ़त या ग्रोथ में कमी नहीं, उत्पादन में ही कमी. यह बहुत गंभीर चिंता का मामला है. इसका सीधा अर्थ है कि विकास की गाड़ी आगे बढ़ने की बजाय ढलान पर पीछे लुढ़क रही है. और उस पर ब्रेक लगा सके, इसका कोई इंतजाम नजर में नहीं है.

दूसरी परेशानी की खबर आयी है कंपनियों के तिमाही नतीजों में. सरकार ने कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती कर दी, इससे शेयर बाजार झूम रहा है और कंपनियों का मुनाफा बढ़ा हुआ दिख रहा है, क्योंकि उन्हें टैक्स में बचत हुई है. असल समस्या यह है कि उनकी कमाई नहीं बढ़ रही है.

नौ तिमाही में पहली बार कंपनियों के कुल कारोबार या टर्नओवर में गिरावट दर्ज हुई है. वजह, बाजार में मांग नहीं थी और तैयार माल जमा होता गया. बड़ी कंपनियों को इस तिमाही में उनके इतिहास का सबसे बड़ा घाटा देखने को मिला है. जुलाई से सितंबर की तिमाही का यह हाल है.

देश की अर्थव्यवस्था पर नजर रखनेवाली संस्था एनसीएईआर ने बतया कि बिजनेस कॉन्फिडेंस यानी उद्योग व्यापार चलानेवाले लोगों का आत्मविश्वास छह साल में सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है.

आरबीआई की पिछले महीने की रिपोर्ट में भी यही बात कही गयी थी और उसकी वजह बतायी गयी थी बेरोजगारी, आमदनी की चिंता और लोगों का खर्च के मामले में हाथ खींच लेना. इसी चिंता को आगे बढ़ानेवाली एक और जानकारी रिजर्व बैंक से ही आयी. फैक्ट्रियां चलानेवाले और दफ्तरों से बिजनेस करनेवाले सभी तरह के व्यापारी कर्ज नहीं ले रहे हैं.

यानी उन्हें आगे धंधा बेहतर होने की उम्मीद नहीं दिख रही है. मार्च के मुकाबले सितंबर में बैकों से कुल कर्ज तो करीब करीब उतना ही है. लेकिन इसकी वजह सिर्फ पर्सनल लोन में आयी छह प्रतिशत की वृद्धि है. वरना फैक्ट्री वाले उद्योगों के कर्ज में 3.85 प्रतिशत और सर्विस सेक्टर में 2.22 प्रतिशत की गिरावट आयी है.

यह सब देखकर अब अर्थशास्त्रियों की पूरी जमात चिंता में है. उनका कहना है कि पिछली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ की दर अब सवा चार से पौने पांच प्रतिशत के बीच ही आने की उम्मीद है.

लेकिन इससे ज्यादा चिंता की बात उनकी नजर में यह है कि निकट भविष्य में इसमें सुधार के भी आसार नहीं दिखते. वजह यह है कि अब तक विकास दर में सुधार की सारी उम्मीदें इस बात पर टिकी थीं कि जुलाई से सितंबर का समय कुछ ठीक होगा और यहां से सुधार शुरू हो जायेगा. लेकिन अब उन उम्मीदों पर पानी फिर चुका है.

एक और चिंताजनक आंकड़ा है, जो भारत सरकार की सबसे बड़ी सर्वे एजेंसी एनएसएसओ से निकला है. इसके हिसाब से लोगों ने अपने घरेलू खर्च में कटौती कर दी है. ऐसा चालीस साल में पहली बार हो रहा है.

इससे पहले एनएसएसओ ने ही यह आंकड़ा भी दिया था कि रोजगार 45 साल में सबसे निचले स्तर पर है. उस पर काफी विवाद हो चुका है. मगर ताजा रिपोर्ट में चिंताजनक खबर यह है कि गांवों में यह खर्च करीब नौ प्रतिशत गिर गया है. यह सर्वे पिछले साल हुआ था. इसमें अनाज, चीनी, नमक, मसाले और सब्जी जैसी चीजों पर खर्च में शहरों और गांवों दोनों जगह तेजी से कमी हुई है.

एक राहत देनेवाली खबर है थोक महंगाई का आंकड़ा. अक्तूबर में वह गिरकर तीन साल के सबसे नीचे स्तर पर पहुंच गया है- 0.2 प्रतिशत पर.

हालांकि, इसी वक्त रिटेल यानी खुदरा महंगाई का आंकड़ा फिर आसमान की तरफ देख रहा है, वह 4.6 प्रतिशत पर है और उसमें भी खानेपीने की चीजों का इंडेक्स 7.9 प्रतिशत पर है.

हालांकि, उम्मीद रहती है कि थोक बाजार में यानी मंडियों में महंगाई गिरेगी, तो जल्दी ही रिटेल में यानी हमारी आपकी खरीदारी पर भी इसका असर दिखेगा, क्योंकि दाम गिरेंगे. मगर उसमें भी बुरी खबर यह है कि थोक में भी खाने-पीने की चीजों की महंगाई दर 9.8 प्रतिशत पर है. यानी जहां तकलीफ है, वहां राहत के आसार बिलकुल नहीं दिख रहे.

शायद यही वजह है कि अब अर्थशास्त्री कहने लगे हैं कि अर्थव्यवस्था में सुस्ती, मंदी या संकुचन अगले साल यानी मार्च तक भी खत्म नहीं होनेवाला. उन्हें लग रहा है कि अगला वित्त वर्ष भी परेशानी भरा रहेगा. मार्च 2021 तक खिंच सकती है अर्थव्यवस्था की तकलीफ. सरकार ने इस बीच कई कदम उठाये हैं, मगर वे असर नहीं कर रहे.

अब एक उम्मीद है कि सरकार बड़ा खर्च करे, बाजार में पैसा डाले, जिससे लोगों की जेब तक पैसा पहुंचे और वे खर्च करें. लेकिन उसमें भी एक दिक्कत है. टैक्स कटौती के बाद सरकार की कमाई कम होने का डर है. खबर है कि आयकर विभाग सरकार से मांगनेवाला है कि टैक्स वसूली का लक्ष्य घटाया जाये. ऐसे में खर्च बढ़ाना आसान नहीं होगा. और होगा भी, तो उसका असर जमीन पर आते-आते वक्त लगेगा.

इसलिए अब समस्या गंभीर है. अब सरकार भी मान रही है. तो अब इलाज सोचना नहीं, करना होगा और जल्दी ही करना होगा. क्या करना होगा, यह तो मैं नहीं बता सकता. मगर देश में बहुत से जानकार हैं, जो बता सकते हैं, बता भी रहे हैं. सरकार को उनकी सुननी होगी.

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