एक पत्रकार का सावन
Published by : Prabhat Khabar Digital Desk Updated At : 05 Jul 2018 1:06 AM
नाजमा खान पत्रकार nazmakhan786@gmail.com कांच की दीवार पर बारिश की पड़ती बूंदे बहुत खूबसूरत लग रही थीं. ऐसा लग रहा था कि वे बूंदे मेरे जेहन पर गिरकर रूह को तर कर रही थीं, कुछ एहसास अल्फाजों में बांधे नहीं जाते, वे सिर्फ महसूस करने के लिए बने होते हैं. मैं ऑफिस के एक कैबिन […]
नाजमा खान
पत्रकार
nazmakhan786@gmail.com
कांच की दीवार पर बारिश की पड़ती बूंदे बहुत खूबसूरत लग रही थीं. ऐसा लग रहा था कि वे बूंदे मेरे जेहन पर गिरकर रूह को तर कर रही थीं, कुछ एहसास अल्फाजों में बांधे नहीं जाते, वे सिर्फ महसूस करने के लिए बने होते हैं.
मैं ऑफिस के एक कैबिन में खड़ी कांच की दीवार पर अपनी हथेलियों को यूं रखे हुए थी, जैसे मेरी हथेलियों और बरसते पानी के दरम्यान कोई दीवार ही न हो. सावन-भादो का महीना कौन सा होता है, मैं नहीं जानती! मेरे लिए तो दिल्ली में जिस दिन मॉनसून दस्तक देता है, उसी दिन से सावन शुरू हो जाता है और बादलों के घिरने पर मुझे बैकग्राउंड म्यूजिक में बारिश के गाने और कजरी सुनायी देने लगती है.
मैं ऊपर खड़ी बरसते पानी को पत्तों पर गिरते, पेड़ों से टपकते और फूलों पर इठलाते देख रही थी कि तभी पीछे से आवाज आयी, जल्दी करो बुलेटिन (न्यूज) जाना है, तुम क्या टाइम बरबाद कर रही हो.
मैं पीछे मुड़ी और लगा सच में मैं कहां टाइम बरबाद कर रही हूं, मुझे तो बारिश में भीगना था, उसे अपनी हथेलियों में समेटने की वह प्यारी-सी नाकाम कोशिश करनी थी, जो मैं बचपन से करती आ रही थी. मैं रुआंसी-सी बारिश से दूर जा रही थी, लेकिन मेरे जेहन में फिल्म ‘रोटी कपड़ा और मकान’ का वह गाना बजने लगा, जिसमें जीनत अमान बारिश के सामने नौकरी को दो टके का बताकर लाखों के सावन के जाने की दुहाई दे रही थी…
ठीक ऐसे ही मैं भी लाखों के बरसते सावन को ललचाई नजरों से देखते हुए उसे हथेलियों पर मसहूस कर लेने की ख्वाहिश को कीबोर्ड के मामूली शोर में गुम होते देख खामोश हो जाती हूं.
वैसे बारिश में न भीगने पर ही नहीं, बल्कि हर उस त्योहार पर भी रोना आता है, जब पूरी दुनिया खुशियों में शरीक होती है और हम (पत्रकार) खबरों से दो-चार हो रहे होते हैं. जिंदगी जीने के लिए सैलरी तो बैंक अकाउंट में आ जाती है, लेकिन वे खुशियां दूर हो जाती हैं, जिनके लिए हम ख्वाहिशमंद रहते हैं.
आहिस्ता-आहिस्ता जिंदगी तमाम होती रहती है और हम इस गुरूर में रहते हैं कि तरक्की कर रहे हैं, आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन जब पीछे पलटकर देखते हैं, तो तमाम हुई उम्र, खाक हुए एहसास, दम तोड़ चुकी ख्वाहिशें और टूटे हुए रिश्ते ही नजर आते हैं, जिन्हें फिर कुछ भी खर्च करके लौटा पाना किसी के बस की बात नहीं रहती.
सावन तो फिर अगले बरस आता है, लेकिन तब तक बहुत कुछ गुजरे साल के साथ बह चुका होता है. हर साल खुद से वादा करती हूं कि मैं ऐसी जिंदगी से जल्द-से-जल्द निकल जाऊं, लेकिन बरसते पानी को देखकर हर साल टूटी उम्मीद के साथ किसी ‘शानदार’ से ऑफिस में ‘बड़े’ लोगों के बीच खुद को कैद पाती हूं और किसी दिन ऑफिस से घर से जाते वक्त ‘मजबूरी’ में अगर भीगना पड़ जाये, तो उन अश्कों को छुपाने का अच्छा जरिया मिल जाता है, जो मेरे खुद से किये वादे के टूटने पर दिल से निकलकर झमाझम आसमान से गिरते पानी में जाकर मिल जाते हैं और मिट्टी में जज्ब हो जाते हैं.
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