वो गालिब की हवेली

Updated at : 25 Jul 2017 6:45 AM (IST)
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वो गालिब की हवेली

नाजमा खान पत्रकार सड़क पर तेज शोर के बावजूद मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. मैं इस शोर में गुम उस माजी को सुनने की कोशिश कर रही थी, जो वक्त के साथ भुला दिया गया था. रिक्शा बल्लीमारान की गली कासिम जान में दाखिल हुआ, तो बंद पड़े मेरे कानों में अचानक ही […]

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नाजमा खान
पत्रकार
सड़क पर तेज शोर के बावजूद मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था. मैं इस शोर में गुम उस माजी को सुनने की कोशिश कर रही थी, जो वक्त के साथ भुला दिया गया था. रिक्शा बल्लीमारान की गली कासिम जान में दाखिल हुआ, तो बंद पड़े मेरे कानों में अचानक ही तेज आवाजें गूंजने लगीं. जैसे-जैसे मिर्जा गालिब की हवेली करीब आ रही थी, ये आवाजें बढ़ती जा रही थीं.
तभी किसी ने पीछे से आवाज दी- ‘नौशा मिर्जा घर पर हैं?’ मैं हवेली के दरवाजे पर जाकर खड़ी हुई ही थी कि तभी कई मंजर मेरी आंखों से सामने तैर गये. पल में ही उस भीड़ वाली गली से सारे रिक्शे गायब हो गये, और बेहद नजाकत के साथ लोग अदब से पेश आने लगे. लगा कि खुद को चिकोटी काट कर मौजूदा वक्त में वापस खींच लाऊं, लेकिन दिल ने इजाजत नहीं दी.
हवेली की दहलीज पर खड़ी मैं जाने क्यों बेहद उदास सी हो गयी. जिस जगह को हसरतों से देखने की ख्वाहिशमंद थी, वहां खड़ा होकर मेरा दिल डूबा जा रहा था. मैं आगे बढ़ी, लेकिन हवेली के सहन में घुसने से पहले ठिठक गयी. अंदर से आवाज आयी- ‘प्लीज कम, वी हैव टू टेक सम मोर सेल्फीज.’
मेरी नजर आंगन के ऊपर खुले आसमान को तलाशने लगी. तभी ऊपर से एक चेहरा झांकता नजर आया, कुछ बुजुर्गियत लिये. उस संजीदा से चेहरे पर एक मासूम मुस्कुराहट थी, जो किसी और से मुखातिब होकर ऊपर के कमरे में कुछ सामान मंगवाने की पुकार लगा रहा था. मैं चौंक गयी और खुद से बोलने लगी कि क्या ये मिर्जा थे?
अब तो सच में खुद को झकझोर देने का मन किया. तभी 20-22 साल के लड़के-लड़कियां अपने स्मार्ट फोन में सेल्फी एप पर एक के बाद एक तस्वीरें क्लिक करने लगे. मेरी आंखों के आगे एक और मंजर तैरने लगा. देखती हूं कि मिर्जा गालिब अपनी चौकड़ी जमाये कह रहे थे, ‘मोहब्बत में हारा जुए में जरूर जीतता है’.
शाम अब हवेली में उतर रही थी. हवेली की दीवारों पर गालिब के अशआर अपनी महफिल जमाये हुए थे.उन अशआर में गालिब की तन्हाई, रुसवाई के साथ ही हर वो एहसास शामिल थे, जिनसे मिला कर बननेवाली शख्सियत को तलाशते हुए मैं गली कासिम जान पहुंची थी. इन्हीं में से एक था- ‘हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहुत अच्छे, कहते हैं कि गालिब का है अंदाज-ए-बयां और.’ इस शेर को पढ़ते हुए आगे बढ़ी ही थी कि अगली दीवार पर किसी अंगरेज ने लिखा था कि अगर गालिब अंगरेजी में शायरी करते, तो दुनिया के तमाम शायरों में सबसे अला जर्फ होते.
गालिब को चाहनेवाले पूरी दुनिया में हैं. मेरे पास तो वो अल्फाज ही नहीं हैं, जिन्हें मैं मिर्जा गालिब जैसे सुखनवर की तारीफ में इस्तेमाल कर सकूं. गालिब की हवेली देख कर दिल गालिब हुआ जा रहा है. सच्ची!
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