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  • Nov 2 2017 4:15PM
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पढ़ें, मशहूर साहित्यकार और पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी ध्रुव गुप्त से विशेष बातचीत

पढ़ें, मशहूर साहित्यकार और पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी ध्रुव गुप्त से विशेष बातचीत

कविता हृदय से हृदय का संवाद है : ध्रुव गुप्त

-रजनीश आनंद-

ध्रुव गुप्त साहित्य जगत की ऐसी शख्सीयत हैं, जो अपने नाम के अनुसार ही अपनी लेखन क्षमता के बल पर साहित्य जगत के आकाश में ध्रुव तारे की मानिंद अपनी चमक बिखेर रहे हैं. 67 वर्षीय ध्रुव गुप्त की अबतक छह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनके नाम हैं ‘कहीं बिल्कुल पास तुम्हारे, ‘जंगल जहां खत्म होता है’, ‘मौसम जो कभी नहीं आता’(कविता संग्रह), ‘मुठभेड़ (कहानी संग्रह)’, एक जरा सा आसमां, ‘मौसम के बहाने’ और मुझमें कुछ है जो आईना सा है (गजल संग्रह). ध्रुव जी के बारे में जो बात सर्वाधिक आकर्षित करती है, वह है उनका पेशा. ध्रुव गुप्त भारतीय पुलिस सेवा के अधिकारी रहे हैं, बावजूद इसके इन्होंने अपने अंदर एक संजीदा कवि और लेखक को जीवित रखा. साहित्य जगत में इन्हें कवि, ग़ज़लगो, कथाकार और लेखक के रूप में जाना जाता है. आज उन्होंने प्रभात खबर डॉट कॉम से बातचीत की और बताया कि किस तरह पुलिस सेवा में होते हुए भी उन्होंने अपने अंदर एक संजीदा और भावुक लेखक को जीवित रखा. 

 
आप भारतीय पुलिस सेवा में रहे, आमतौर पर पुलिस अधिकारियों की छवि एक कड़क इंसान की होती है, ऐसे में कैसे आपने अपने अंदर एक संजीदा लेखक और कवि को जिंदा रखा?
मैं यह कहना चाहता हूं कि पुलिस के बारे में लोगों की धारणा गलत है. लोग यह मानकर चलते हैं कि पुलिस वाले को कड़क, मजबूत शरीर का इंसान होना चाहिए. जबकि सच्चाई यह है कि एक पुलिस अधिकारी के पास कई ऐसे साधन हैं, शक्तियां हैं, जिनके जरिये वह अपराध पर अंकुश लगा सकता है, केवल कड़क छवि से अपराध पर अंकुश नहीं लगता. पुलिस अधिकारी तो आम जनता से जुड़ा होता है, इसलिए उसके अंदर संवेदना का होना बहुत जरूरी है. अगर पुलिस अधिकारी संवेदनशील नहीं होगा तो लाठी और बंदूक का गलत प्रयोग होगा.

 
एक पुलिस अधिकारी की जो छवि समाज में है उसपर आप क्या कहना चाहेंगे?
मेरा ऐसा मानना है कि पुलिस विभाग में भरती के लिए जो तरीका अपनाया जाता है वह सही नहीं है.  पुराने समय से यही प्रक्रिया चल रही है जिसमें शारीरिक बल के परीक्षण पर विशेष जोर होता है, जिसके कारण सही लोग चयनित होकर नहीं आ पाते. अधिकारियों की बात छोड़ दें, तो जिन पुलिसवालों से आम आदमी  का रोज ‘इंट्रेक्शन’ होता है, उनका व्यवहार आम आदमी के प्रति बहुत ही कठोर है, इस बात से मैं इनकार नहीं कर सकता. इसमें बदलाव के लिए चयन प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत है.
 
आप हिंदी साहित्य के विद्यार्थी रहे हैं, लेखन के प्रति आपका रुझान कब से हुआ?
मैंने हिंदी साहित्य में एमए किया है. बिहार यूनिवर्सिटी से. जहां तक बात लेखन के प्रति रुझान की है, तो मैं छात्र जीवन से ही लिखता हूं. उस वक्त आर्यावर्त्त और प्रदीप जैसे अखबारों में मेरी रचनाएं प्रकाशित होती थीं. मैंने लिखना कैसे शुरू किया, यह मैं खुद नहीं जानता. रचनाएं दिमाग में पनपने लगीं और मैं उन्हें कागज पर उकेरता गया यह कह सकता हूं. 

 
आप यह बतायेंगे कि आपकी पहली रचना कौन सी थी?
पहली रचना... स्मरण में नहीं आ रही, लेकिन यह कह सकता हूं कि मैंने शुरुआत कविता और गीतों से की थी, तो यही मेरी पहली रचना होगी. लेकिन एकदम से यह नहीं बता पा रहा कि मेरी पहली रचना कौन सी थी.
 
आप पुलिस सेवा में थे, क्या आपकी शुरू से ही यह इच्छा थी कि आप इस सेवा में आयें?
नहीं ऐसा कुछ नहीं है. मैं जिस फैमिली बैकग्राउंड से था, वहां नौकरी करना बहुत अहम था. एक नौकरी पास में होनी चाहिए थी, जीवन सुरक्षित करने के लिए. ज्वाइस सेकेंडरी चीज थी हमारे लिए. इसी उद्देश्य से मैंने पुलिस सेवा की परीक्षा दी और पास किया. बस इतना ही है.
 
अपने परिवार के बारे में कुछ बतायें?
मैं एक गरीब परिवार से आता हूं. मेरे पिता छोटा-मोटा व्यवसाय करते थे. मां गृहिणी थीं. अब दोनों इस दुनिया में नहीं हैं. परिवार में पत्नी हैं और दो लड़के हैं. बड़ा लड़का दिल्ली में रहता है और छोटा यहीं मेरे साथ पटना में रहता है. 
 
आप एक पुलिस अधिकारी थे क्या कभी काम के दबाव में ऐसा लगा कि आपके अंदर का लेखक मर रहा है?
मैं पुलिस सेवा में जरूर रहा, लेकिन मैंने कभी खुद पर दबाव महसूस नहीं किया. मैंने हमेशा लेखन जारी रखा. मेरा जो कहानी संग्रह है ‘मुठभेड़’ उसमें व्यवस्था के प्रति बहुत कुछ लिखा गया है, लेकिन जब यह संग्रह आया तो मुझे कोई परेशानी नहीं हुई. मैंने कभी भी दबाव महसूस नहीं किया. हां कई बार ऐसा होता है कि आपको अपनी रचनाओं के लिए अनुमोदन करवाना पड़ता है, लेकिन मैंने नहीं करवाया और अपना लेखन जारी रखा, कभी कोई दबाव महसूस नहीं किया.
 
आप लेखक हैं, संजीदा इंसान हैं, क्या सेवा के दौरान कभी आपको ऐसा लगा कि आप बिलकुल मजबूर हो गये हैं और कुछ भी नहीं कर पा रहे और आपके सामने गलत हो रहा है?
जी, कई बार हमारा सामना ऐसी परिस्थितियों से हुआ. हम-आप सभी जानते हैं कि हमारे देश में कानून सबूतों पर चलता है. हम अच्छी तरह जानते थे कि इस आदमी ने अपराध किया है, लेकिन सबूत और गवाह हमारे साथ नहीं थे और वह बच निकला. हमने निर्दोषों को सबूतों और गवाहों के आधार पर दोषी सिद्ध होते देखा . उस वक्त खुद को बहुत मजबूर महसूस करता था.


 
आजकल साहित्य जगत में जिस तरह के विवाद हो रहे हैं मसलन मैत्रेयी पुष्पा का सिंदूर प्रकरण और अनामिका जी पर भारत भूषण सम्मान को लेकर जिस तरह की टिप्पणी हुई उसपर आपकी क्या राय है?
मैत्रेयी पुष्पा जी ने जो कहा, उसमें कुछ भी गलत नहीं है, लेकिन उनके कहने का तरीका, लहजा सही नहीं था. साथ ही उनकी टाइमिंग भी सही नहीं थी. जो परंपराएं हमारे समाज में वर्षों से हैं उन्हें बदलना है तो आपको शब्दों का सही चयन करना होगा, साथ ही प्यार से समझाना होगा. जहां तक बात अनामिका जी पर कमेंट की है, तो वह बहुत ही गलत टिप्पणी थी. मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति ही इस तरह की टिप्पणी कर सकता है. एक भद्र महिला पर ऐसी टिप्पणी नहीं होनी चाहिए. इसके साथ ही मैं यह भी कहना चाहूंगा कि इस तरह के विवादों से साहित्य जगत को दूर रहना चाहिए. किसी के निजी जीवन पर टिप्पणी से बचना चाहिए.
 
आपके प्रिय कवि या साहित्यकार कौन हैं?
मेरे प्रिय कवि केदारनाथ और कुंवर नारायण हैं. मैं इन दोनों के लेखन से प्रभावित था. केदारनाथ जी गोपालगंज आते थे तो मैं अपनी रचनाएं उन्हें दिखाता था और उनसे सीखता था. समकालीन कवियों में वे मेरे प्रिय कवि हैं और मैं उनसे प्रभावित हूं. पुराने कवियों में मैं निराला, बच्चन और गिरिजा कुमार माथुर से प्रभावित हूं.
 
आपको अपनी कौन सी रचना सर्वप्रिय है? या यूं कहें कि किस रचना से आपको सर्वाधिक संतुष्टि मिली?
यह जरा कठिन सवाल है. यह तो वो बात हो गयी कि आपको अपनी कौन सी संतान सर्वप्रिय है, फिर भी इधर मैंने एक कविता लिखी ‘प्रेम तो मैंने किया ही नहीं’ और ‘कल के अखबारों के लिए’ इन रचनाओं से मुझे बहुत संतोष मिला. 
 
आप एक कवि हैं, कविता को किस तरह परिभाषित करेंगे?
मेरा ऐसा मानना है कि कविता लेखन से दुनिया नहीं बदलती बल्कि यह हमारे अंदर दुनिया बदलने की संवेदना पैदा करती है. लोग मुझसे कहते हैं आप मुलायम कविताएं क्यों लिखते हैं, तो मेरा यह कहना है कि कविता हृदय से हृदय का संवाद है. आजकल लोग कविता में गुस्सा भी व्यक्त करते हैं, लेकिन मैं इस धारा के साथ नहीं चल रहा है, मैं रूमानी कविताएं लिखता हूं संवेदना से परिपूर्ण कविताएं लिखता हूं और इससे मुझसे संतुष्टि मिलती है. 
 
आपका नाम ध्रुव है, तो क्या आपके अंदर भी बालक ध्रुव की तरह किसी चीज को पा लेने का जुनून है?

ध्रुव मेरा नाम है, लेकिन मुझे लगता है कि जितना मुझे हासिल है वह बहुत है, इससे ज्यादा का मैं अधिकारी नहीं हूं. किसी चीज को पा लेने का जुनून मेरे अंदर नहीं है. 



ध्रुव गुप्त की एक कविता

एक छोटी-सी प्रेमकथा  
 
पिछली रात मैं बहुत थका था 
कमरे में गर्मी बहुत थी
और बिजली गायब 
मैंने खिड़की खोल दी और 
जमीन पर चादर बिछाकर 
गहरी नींद सो गया
आधी रात जब नींद खुली 
तो आश्चर्य से देखा मैंने 
खिड़की के रास्ते चलकर चांदनी 
मेरे बिल्कुल बगल में आकर 
चुपचाप लेट गई थी 
शांत, सौम्य, शीतल 
और थोड़ी-सी उदास 
मैंने हाथों से छूकर देखा उसे 
और आहिस्ता से पूछा - 
कुछ कहना है ?
चांदनी ने कुछ नहीं कहा 
वह कुछ और पास खिसक आई मेरे 
मैं भावुक था 
उसे बांहों में समेट लिया 
और धीरे-धीरे हम दोनों सो गए
रात के आखिरी पहर 
मैंने आधी नींद में ही उसे टटोला 
तो वह जा चुकी थी
मैं घबड़ाया-सा उठ बैठा
बेचैन और पसीने से तर-ब-तर
बाहर तेज हवा चल रही थी 
कमरे में सन्नाटा पसरा था 
और दूर पूरब दिशा में क्षितिज 
धीरे-धीरे पीला पड़ने लगा था !
 
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