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  • Mar 16 2018 7:40AM
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महेंदर मिसिर : पुरबिया उस्ताद

चंदन तिवारी

लोक गायिका

आज महेंदर मिसिर की जयंती है. वे पुरबी इलाके के अद्भुत और अपने तरीके के अनोखे रचनाकार थे. उनके एकाध गीतों को करीब दस-बारह सालों से छिटपुट गाती रही थी. जब पुरबिया तान सीरीज की शुरुआत की, तो उनके ही गीतों से की. अब तक मैंने करीब 16 अलग-अलग गीत गाये हैं. जैसे-जैसे एक-एक कर उनके गीत गाती रही, उनके गीतों में और उनके व्यक्तित्व में रुचि और बढ़ती गयी. 

रामनाथ पांडेय ने उन पर पहला उपन्यास लिखा था- 'महेंदर मिसिर' और पांडेय कपिल के कालजयी उपन्यास 'फुलसुंघी', इन दोनों को पढ़ा. जौहर ​शफियाबादी ने भोजपुरी में उनकी जीवनी लिखी है- 'पुरबी के धाह'. उसे देखी. इसी तरह कई जगहों से जानकारी जुटाती रही. एक-एक कर उनके गीत भी मिलते गये. उनके गीतों को उलट-पुलट कर देखती हूं, तो चकित रहती हूं कि जितने बड़े फलक पर वे अपने समय में गीतों को रच रहे थे, उस समय में या उसके बाद भी उस तरह का रचनाकार कोई नहीं ही हुआ होगा. 

वे अपनी रचनाओं में प्रेम को जितने बड़े स्तर पर रखते हैं या स्त्रियों की प्रेम की आजादी के लिए जितनी रचनाएं करते हैं, वह चकित करनेवाला है. चाहे वह सीधे-सहज पति-पत्नी के प्रेम के गीतों के जरिये हो, प्रेमी-प्रेमिका के गीतों के जरिये हो, राधा-कृष्ण के गीतों के जरिये हो या फिर रावण-मंदोदरी के ही प्रेम का गीत क्यों न हो.

वे छपरा के एक गांव मिसरवलिया में पैदा हुए एक ऐसे रचनाकार थे, जिन्हें कहा तो पुरबिया उस्ताद जाता है, लेकिन जिनके दीवाने दुनिया के कोने-कोने में फैले हुए हैं. इसका एहसास विगत माह तब हुआ, जब मुझे नीदरलैंड में बुलाया गया. 

नीदरलैंड का आमंत्रण विशेष तौर पर महेंदर मिसिर के लिखे राधा-कृष्ण के प्रेमगीत को गाने के लिए था. इस शानदार गीत में भगवान कृष्ण एक स्त्री का रूप बनाकर, गोदनहरीन बनकर राधा से मिलने पहुंचते हैं.

महेंदर मिसिर के गीतों में प्रेम अपने उच्चतम स्तर पर मिलता है. वे अपूर्व रामायण में मंदोदरी का एक प्रसंग लाते हैं. जब रावण मार दिया जाता है, तो मंदोदरी विलाप करती है. 

उसमें भी प्रेम अपने उच्चतम रूप में दिखता है. जब वे बारहमासा रचते हैं, तो उसकी पंक्तियों से गुजरते हुए अविश्वसनीय लगता है कि कोई पुरुष एक स्त्री के मन की इच्छा-आकांक्षा को इतने सुक्ष्मतम स्तर पर जाकर कैसे अभिव्यक्त कर सकता है. 

महेंदर मिसिर जब निरगुण रचते हैं, तो वे प्रेम को महत्व देते हैं. लिखते हैं- सखी हो प्रेम नगरिया छूटल जात बा... लेकिन, उनके प्रेम गीतों में महज रोमांस नहीं रहता, स्त्री का देह नहीं होता, बल्कि सदियों से स्त्री की दबी इच्छा-आकांक्षा का स्वर होता है.

अपने को पूरा-पूरा पा लेने का स्वर. यही बात उनमें सबसे खास लगती है. वह स्त्री प्रधान रचनाकार थे. स्त्री मन के प्रेम-विरह को राग देनेवाले. सोचती हूं कि कितना कठिन रहा होगा उनके लिए! किस तरह वे स्त्री मन के अंदर की बातों को, एकदम सटीक शब्दों में उतारते होंगे! कितनी गहराई में डूब जाते होंगे! वे स्त्री ही तो बन जाते होंगे, लिखते समय...

 

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