anya khel

  • Aug 26 2019 8:28PM
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खेल दिवस पर विशेष : खिलाड़ियों के लिए मिसाल हैं इंद्रजीत, 66 की उम्र में करेंगे भारत का प्रतिनिधित्व

खेल दिवस पर विशेष : खिलाड़ियों के लिए मिसाल हैं इंद्रजीत, 66 की उम्र में करेंगे भारत का प्रतिनिधित्व
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।। अरविंद मिश्रा ।।

रांची : रांची के अंतरराष्‍ट्रीय पावरलिफ्टर सरदार इंद्रजीत सिंह कनाडा में 15 सितंबर से 21 सितंबर तक होनेवाली कॉमनवेल्थ पॉवरलिफ्टिंग एंड बेंचप्रेस प्रतियोगिता में एक बार फिर भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे. प्रतियोगिता कनाडा के सेंट जॉन्‍स न्‍यूफाउंडलैंड शहर में होगी.
 
कॉमनवेल्‍थ में उनकी प्रतियोगिता 17 सितंबर को है. इस बार वे मास्‍टर कैटेगरी में 83 किलोग्राम ग्रुप में भारत की अगुवाई करेंगे. 66 साल के इंद्रजीत के साथ गढ़वा के मुकेश सिंह भी कनाडा जाने वाले हैं. मुकेश सिंह जूनियर कैटेगरी में 96 किलोग्राम ग्रुप प्रतियोगिता में भारत का प्रतिनिधत्‍व करेंगे. कॉमनवेल्‍थ गेम में हिस्‍सा लेने के लिए इंद्रजीत और मुकेश सितंबर के पहले सप्‍ताह में कनाडा के लिए रवाना होंगे.
 

* इंद्रजीत ने अब तक देश- दुनिया में 50 से ज्यादा मेडल जीते

रांची के इंद्रजीत सिंह ने अब तक देश-विदेश में कुल 50 से भी अधिक मैडल जीते हैं. पिछली बार दक्षिण अफ्रीका में हुए कॉमनवेल्‍थ पॉवरलिफ्टिंग एंड बेंचप्रेस प्रतियोगिता में उन्‍होंने गोल्‍ड मैडल जीता था. 

सरदार इंद्रजीत सिंह सबसे पहले 1975 में भारत में चैंपियन हुए थे, तब से अब तक वो लगातार 11 वर्षों से चैंपियन होते आ रहे हैं. एशिया चैंपियनशिप में उन्‍हें दो बार गोल्‍ड मैडल मिला और दो बार वर्ल्‍ड चैंपियन भी रहे.

इसके अलावा इंद्रजीत 1978 में स्ट्रॉन्गेस्ट मैन ऑफ इंडिया, 1986 में आउटस्टैंडिंग यंग पर्सन ऑफ इंडिया, 2006 में हर्क्यूलिस ऑफ इंडिया और 2016 में बेस्ट लिफ्टर ऑफ इंडिया भी चुने गये. 

* कड़ी मेहनत ने इंद्रजीत को बनाया चैंपियन

सरदार इंद्रजीत सिंह युवा खिलाड़ियों के लिए मिसाल हैं. 66 साल की उम्र में भी वो रोज सुबह 4:30 बजे से 6:30 बजे तक अभ्‍यास करते हैं. यह दिनचर्या जब वो 14 साल के थे उस समय से लगातार चलता आ रहा है. सबसे बड़ी बात है कि इंद्रजीत ने अब तक किसी से न तो कोई प्रशिक्षण लिया और न ही उनके कोई ट्रेनर रहे हैं.

उन्‍होंने बताया दूसरे खिलाड़ी को देखकर वो प्रेरित हुए और लगातार अभ्‍यास से चैंपियन बने. उन्‍होंने बताया जब वो 14 साल के थे तब अपने घर के बगल में स्थित प्रसिद्ध मारवाड़ी व्यायामशाला में जाकर खिलाड़ियों को अभ्‍यास करते देखते थे. एक दिन वहां एक खिलाड़ी ने उनसे कहा कि, पापे.. तू रोज यहां आता है. कुछ खेलता क्यों नहीं. बस तभी से उन्होंने पॉवरलिफ्टिंग, वेटलिफ्टिंग और बॉडी बिल्डिंग तीनों शुरू कर दी. बातचीत में उन्‍होंने कहा, कड़ी मेहनत ने उन्‍हें आज चैंपियन बनाया है.

* कूल्हे की हड्डी टूटने से 3 साल तक रहे पॉवरलिफ्टिंग से दूर 

इंद्रजीत सिंह के करियर में एक दौर ऐसा भी आया जब उन्‍हें चोटिल होने के कारण 3 साल तक पॉवरलिफ्टिंग से बाहर रहना पड़ा, लेकिन इसके बावजूद उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी और जोरदार वापसी करते हुए चैंपियन बने. 

दरअसल 1971 में पटना में राष्ट्रीय पॉवरलिफ्टिंग प्रतियोगिता के दौरान डेडलिफ्ट में 207 किलो उठाने के दौरान उनके कूल्हे की हड्डी अचानक टूट गई और वह बेहोश होकर गिर गए. डॉक्टरों ने कहा कि अब आपको पॉवरलिफ्टिंग नहीं करनी चाहिए, नहीं तो यह बेहद खतरनाक साबित होगी.

भार उठाना तो दूर, अब आप पूरे जीवन में कभी किसी जिम का रुख भी मत करना. उन्‍होंने बताया डॉक्‍टर के कहने से निराशा तो हुई, लेकिन उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी और निरंतर अभ्‍यास में जुटे रहे. 

इंद्रजीत सिंह ने इस दौरान एथलेटिक्स में हिस्‍सा लिया. उन्‍होंने शॉटपुट और डिस्कस थ्रो जैसे गेम में हाथ आजमाया और सफल भी रहे. इन दोनों खेलों में भी उन्‍होंने राज्‍य का प्रतिनिधित्‍व किया, लेकिन उनका पहला और आखिरी प्‍यार पॉवरलिफ्टिंग था. आखिर उससे कब तक दूर रह सकते थे. तीन साल बाद फिर से जिम पहुंच गए और उसके बाद टूटे कूल्‍हे के साथ ही अभ्‍यास करना शुरू किया और फिर से चैंपियन हुए. 

* तैयार कर रहे खिलाड़ियों की फौज

इंद्रजीत सिंह अपने पूरे जीवन को खेल के नाम कर दिया. उनके दिन की शुरुआत जिम में अभ्‍यास के साथ होती है और रात खेल के समान बेचने के साथ होती है. खेल को समर्पित इंद्रजीत सिंह खुद तो वर्ल्‍ड चैंपियन हैं, लेकिन अपने पीछे खिलाड़ियों की फौज भी तैयार करते जा रहे हैं. उनके जिम से अब तक 20 से 25 राष्‍ट्र‍ीय स्‍तर के खिलाड़ी निकल चुके हैं. 2017 में दक्षिण अफ्रीका में हुए कॉमवेल्‍थ गेम में मनीषा ने शानदार प्रदर्शन करते हुए गोल्‍ड जीता था. ऐसे कई खिलाड़ी हैं जो इंद्रजीत सिंह से ट्रेनिंग लेकर आज राष्‍ट्रीय फलक पर चमक रहे हैं.

* आर्थिक तंगी के बावजूद खेलना जारी रखा

इंद्रजीत अपना जिम चलाते हैं, जहां खुद अभ्‍यास करते हैं और नये खिलाड़ियों को तैयार करते हैं. जिम के अलावा 1990 से स्पोर्ट्स का दुकान भी चला रहे हैं. उनके जीवन में एक दौर ऐसा भी आया, जब उनके पास खेल जारी रखने के लिए पैसे भी नहीं थे, लेकिन उन्‍होंने हिम्‍मत नहीं हारी.

उन्‍होंने बताया आज भी चैंपियनशिप में हिस्‍सा लेने के लिए उन्‍हें खुद के खर्च से दौरा करना पड़ता है. सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती है. उनका मानना है, जिस तरह से अन्‍य खेलों पर सरकार ध्‍यान दे रही है उसी तरह पॉवरलिफ्टिंग पर भी ध्‍यान दे तो मेरे जैसे कई चैंपियन खिलाड़ी निकलकर आएंगे.

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