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विवेकानंद जयंती पर विशेष : युवा संन्यासी का पुण्य स्मरण

By Prabhat Khabar Print Desk
Updated Date
विवेकानंद जयंती पर विशेष
विवेकानंद जयंती पर विशेष

स्वामी शांतआत्मानंद, सचिव, रामकृष्ण मिशन, दिल्ली

आज से 130 साल से भी पहले स्वामी विवेकानंद ने पूरे देश की पैदल परिक्रमा की थी और वे समाज में व्याप्त गरीबी, निरक्षरता और अंधविश्वास को देखकर बहुत दुखी हुए थे. उन्होंने कहा था कि शिक्षा ही सभी बुराइयों का समाधान है. आज हमारे पास शिक्षा है, लेकिन क्या यह उचित शिक्षा है? क्या यह हमें अन्वेषक बनने के लिए प्रोत्साहित करती है या मात्र अनुकरण करना सिखाती है?

बड़ी संख्या में छात्र विद्यालय, कक्षा या शिक्षक से जुड़ा हुआ महसूस नहीं करते. जो छात्र पढ़ने-लिखने में अच्छे हैं, केवल उन्हें ही प्रोत्साहित किया जाता है और उनकी ही प्रशंसा होती है. हमें ऐसी शिक्षा प्रणाली की जरूरत है, जो छात्रों में मौलिक विचार पैदा करे, उन्हें समाज से बेहतर ढंग से जोड़े, उनमें भरोसा पैदा करे तथा उन्हें समाधान उन्मुख बनाये.

हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर छात्र शिक्षा से लाभान्वित हो, यह केवल करियर बनाने का साधन न हो, बल्कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए मार्गदर्शन करे और किसी भी स्थिति में छात्रों को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक बनाये. स्वामी विवेकानंद भारतीयों को ऐसी शिक्षा ग्रहण करने के पैरोकार थे, जो उनमें मजबूत आत्मश्रद्धा (आत्मविश्वास) का भाव भरे. एक आत्मविश्वासी छात्र कभी भी किसी अन्य छात्र से स्वयं को कम नहीं समझेगा. उसे पता होगा कि उसमें बहुत संभावनाएं हैं और उचित जागरूकता एवं प्रयास से वह अपने भविष्य को गढ़ सकता है. स्वामी जी ने कहा था कि शिक्षा छात्र में पहले से मौजूद पूर्णता की अभिव्यक्ति है.

जीवन परिचय

मूल नाम : नरेंद्रनाथ दत्त

जन्म : 12 जनवरी, 1863 को कोलकाता में.

मृत्यु : 4 जुलाई, 1902 को रामकृष्ण मठ, बेलूर.

गुरु : रामकृष्ण परमहंस

कर्मक्षेत्र : दार्शनिक, धर्म प्रवर्तक और संत.

विषय : साहित्य, दर्शन और इतिहास

विदेश यात्रा : अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, रूस और पूर्वी यूरोप में अनेक व्याख्यान.

वेदांत के संदेश का दुनियाभर में प्रचार.

हम समझते हैं कि शिक्षा शिक्षक से छात्र तक प्रवाहित होती है और शिक्षक ज्ञान का भंडार है, जिसे वह छात्र को प्रदत करता है. यह समझ इंगित करती है कि ज्ञान बाहर से भीतर आता है. लेकिन स्वामी जी का जोर था कि ज्ञान भीतर है और इसे सही मार्गदर्शन से बाहर लाने की जरूरत है. यदि एक गणित शिक्षक सालभर पचास छात्रों को पढ़ाता है, तो वह एक ही समय में एक ही ज्ञान सभी छात्रों को दे रहा होता है.

यदि ज्ञान शिक्षक से छात्रों को प्रवाहित होता है, तो साल के अंत में सभी छात्रों को एक जैसे अंक आने चाहिए. लेकिन हम देखते हैं कि छात्रों के प्राप्तांक शून्य से सौ तक हैं. जिन छात्रों में ज्ञान बीज रूप में था, शिक्षक ने उनकी अभिव्यक्ति को प्रेरित किया और उचित प्रयास कर उन छात्रों ने अच्छा प्रदर्शन किया. भीतर से बाहर की ओर शिक्षा का विचार सीखने की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल देता है.

यदि छात्रों को सचेत किया जाये कि उनमें असीमित शक्ति, ज्ञान और अच्छाई निहित हैं, जो बाहर आने के लिए प्रतिक्षित हैं, तो शिक्षा, विद्यालय और शिक्षक को लेकर उनकी पूरी सोच में क्रांतिकारी बदलाव आयेगा. हर छात्र ऊर्जा का पुंज होगा, वह आशाओं, सकारात्मकता और उत्साह से भरा होगा, भले ही उसकी अकादमिक क्षमता जो भी हो. छात्र विद्यालय आना और शिक्षकों के साहचर्य को पसंद करेगा. उसे यह सिखाया जायेगा कि कैसे सोचना है, न कि क्या सोचना है.

प्रेरणा के अभाव से शिक्षकों में उदासीन पाठन की प्रवृत्ति पनपती है. प्राचीन गुरुकुल प्रणाली में छात्र शिक्षकों के साथ ही रहते थे और उन्हें केवल अकादमिक ज्ञान ही नहीं दिया जाता था, बल्कि अच्छे चरित्र के गुण भी भरे जाते थे, ताकि वे आदर्श नागरिक बन सकें. आज शिक्षकों से छात्रों का संपर्क अत्यंत कम है.

बहुत से शिक्षक अन्य अवसरों के अभाव में शिक्षण के कार्य से जुड़ते हैं, जिसके कारण उनमें बच्चों के अतिसंवेदनशील मस्तिष्क को वास्तव में प्रभावित करने का उत्साह कम होता है. तंत्र उन्हें अकादमिक परिणामों के लिए पुरस्कृत करता है और वे किसी अतिरिक्त कार्य को बोझ समझते हैं. इसलिए शिक्षा प्रणाली में व्यापक बुनियादी बदलावों की जरूरत है.

रामकृष्ण मिशन की दिल्ली इकाई ने मध्य विद्यालय के छात्रों के लिए जागृत नागरिक कार्यक्रम नामक एक कार्यक्रम विकसित किया है. निशुल्क उपलब्ध इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों में निहित असीम ज्ञान, शक्ति और अच्छाई को उभारना है. इसे देशभर में 54 सौ से अधिक विद्यालयों ने अपनाया है. इसके साथ ही 41 हजार से अधिक शिक्षकों को प्रशिक्षित किया गया है और इस कार्यक्रम ने अब तक दस लाख से अधिक छात्रों के जीवन को छुआ है.

अभी जब शिक्षा सुधारों की चर्चा है, तो पठन-पाठन का एक ज्ञानात्मक कार्यक्रम, जो शिक्षा में मूल्यों की मजबूत नींव रखे, बेहद महत्वपूर्ण है. तभी स्वामी विवेकानंद के नये भारत का सपना साकार हो सकेगा, जहां भारतीय अपनी खोयी हुई वैयक्तिकता को पा सकेंगे तथा अपने पूर्वजों के गौरवशाली उपलब्धियों से भी आगे जा सकेंगे.

कुछ कम जाने गये तथ्य

कुछ प्रकाशित स्रोतों के अनुसार स्वामी जी 31 बीमारियों से ग्रस्त रहे थे. अपने उपचार के लिए उन्होंने विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों को अपनाया था. उल्लेखनीय है कि अपने संदेशों में उन्होंने शारीरिक शक्ति और स्वास्थ्य पर बहुत बल दिया है.

पिता की मृत्यु के बाद उनका परिवार आर्थिक तंगी से घिर गया था. अन्य सदस्यों को भोजन ठीक से मिल सके, इसके लिए वे किसी के घर भोजन के आमंत्रण का झूठा बहाना बनाकर बाहर निकल जाते थे और खुद भूखे रहते थे.

इंटरमीडिएट आर्ट्स में स्वामी विवेकानंद को मात्र 46 प्रतिशत अंक मिले थे, जबकि विश्वविद्यालय प्रवेश परीक्षा में उनके 47 प्रतिशत अंक थे. स्नातक होने के बाद भी उन्हें बेरोजगार रहना पड़ा था.

वे हमेशा आध्यात्मिक नहीं थे और ईश्वर के

अस्तित्व पर भी संदेह करते थे. एक बार उन्होंने श्री रामकृष्ण से सीधे पूछ लिया था कि क्या उन्होंने ईश्वर को देखा है.

वे आश्रम के नियमों के कठोर पालन के आग्रही थे. उन्होंने एक नियम यह बनाया था कि आश्रम में कोई स्त्री प्रवेश नहीं करेगी. एक बार उनके बीमार पड़ने पर शिष्यों ने उनकी माता को बुला लिया था. इस पर वे बड़े क्रोधित हुए और कहा कि मैंने ही यह नियम बनाया था और इसे मेरे लिए ही तोड़ दिया गया.

Posted by: Pritish Sahay

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